प्राकृतिक रंगाईः परम्परा एवं वर्तमान

Submitted by editorial on Wed, 03/20/2019 - 12:02
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Source
पहाड़, पिथौरागढ़-चम्पावत अंक (पुस्तक), 2010

रंग का विचार मन में आते ही अनुभूति होती है हर्ष एवं उल्लास की अभिव्यक्ति की। हो भी क्यों नहीं क्योंकि रंग एवं रंगाई सदियों से हमारे जीवन का अतंरंग हिस्सा होेने के साथ हमारी रचनात्मक सोच की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी रहे हैं।

प्राकृतिक रंगों का त्योहारों उत्सवों एवं धार्मिक अनुष्ठानों के साथ भी गहरा जुड़ाव रहा है। उदाहरण के लिए बसन्त पंचमी के अवसर पर रुमाल को तथा रक्षाबन्धन के दिन यज्ञोपवीत एवं रक्षा के धागे को रंगने हेतु हल्दी का प्रयोगा किया जाता था। धार्मिक अनुष्ठानों एवं शुभ अवसरों में प्राकृतिक रंगों के प्रयोग का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक कुमकुम (पिठया) है जिसके निर्माण मेें हल्दी एवं नीबू का प्रयोग किया जाता रहा है।

हमारे दैनिक जीवन में कपड़े की रंगाई एवं घरों की लिपाई-पुताई में भी प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं का प्रयोग होता था। कपड़े की रंगाई हेतु सामान्य रूप से हल्दी, अखरोट के गाल, श्याम पत्ती, डोलू, टाटरी एवं दाड़िम छिलका आदि का प्रयोग होता था। दूसरी ओर घर की पुताई हेतु कमेट एवं दरवाजों पर अल्पना हेतु चावल का लेप किया जाता था।

लेखन एवं कागज में रंगाई हेतु हरड़ा, हल्दी एवं जौ की पत्ती की स्याही एवं रंगों का प्रयोग प्राचीन काल से ही किया जाता रहा है। इन प्राकृतिक रंगों एवं स्याही से हस्तलिखित पुस्तकें एवं जन्म कुंडली आदि की वर्तमान में भी विद्यमानता प्राकृतिक रंगों की समृद्धि को दर्शाती है।

स्पष्ट है कि हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्राकृतिक रंगाई का गहरा समावेश था। इसके पीछे हमारे पूर्वजों की वृहत संरक्षणवादी एवं स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील सोच विद्यमान रही है। प्राकृतिक रंगों के निर्माण में प्रयोग होने वाली समस्त सामग्री में भरपूर औषधीय गुण विद्यमान हैं तथा आयुर्वेद में इनकी विस्तृत व्याख्या की गई है। इन्ही औषधीय गुणों के कारण इनके प्रयोग की परम्परा थी ताकि रंगों का उद्देश्य भी पूरा हो एवं शरीर पर कोई दुष्प्रभाव भी न पड़े घरों की पुताई हेतु कमेट एवं अल्पना हेतु चावल के लेप का प्रयोग प्राकृतिक रंगों के फायदों के प्रति जागरुकता प्रदर्शित करता है।

प्राकृतिक रंगों का जैव विविधता से भी गहरा रिश्ता था। तथा जन समुदाय संरक्षण एवं पौधारोपण हेतु भी समर्पित था। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि वर्तमान की तथाकथित विकसित एवं पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने इसके प्रति ऐसी उदासीनता दिखाई कि यह परम्परा विलुप्ति की कगार पर पहुँच गई है।

वर्तमान में हमने प्राकृतिक के स्थान पर रासायनिक रंगों के प्रयोग से त्योहारों एवं प्रकृति के बीच सामंजस्य की भावना को गहरा आघात पहुँचाया है। त्योहारों एवं उत्सवों के पीछे की भावना एवं प्रकृति प्रेम सिरे से गायब है। आजकल बसन्त पंचमी एवं रक्षाबन्धन पर हल्दी के स्थान पर बाजार में उपलब्ध रासायनिक रंगों का प्रयोग होता है। जिस हरड़े एवं जौ की पत्तियों का प्रयोग स्याही एवं रंग बनाने हेतु किया जाता था, आज के स्कूल जाने वाले बच्चे हरड़ एवं जौ के पौधों के पहचानने में भी असमर्थ हैं। कमेट की जगह बाजार में उपलब्ध रेडीमेड डिस्टेम्पर ने ले ली है तथा चावल के लेप की अल्पना की जगह प्लास्टिक शीट पर निर्मित पेंट के डिजाइन ने ले ली है जो ऐसा कचरा पैदा करते हैं जिसका निस्तारण प्रयोग करने वाले के जीवन में तो क्या उसकी अगली पीढ़ी के जीवन काल में भी नहीं होे पाता।

अब प्रश्न यह उठता है कि हमारी समृद्ध परम्परा एवं संस्कृति का यह ह्रास क्यों हुआ। आधुनिक दिखने की चाह में हम मान बैठे कि परम्पराओं एवं विरासत को छोड़ना ही आधुनिकता है। इस चाह में हम उस विरासत को भी छोड़ने लगे हैं जिससे हमारा अस्तित्व एवं भावनाएँ जुड़ी हैं। प्राकृतिक रंगाई भी उनमें से एक ऐसी धुरी है जिसके साथ कला का संरक्षण, प्राकृतिक सौहार्द, जैवविविधता संरक्षण एवं स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता के आयाम जुड़े हैं। ये समस्त आयाम हमारे जीवन के लिए निर्विवाद रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। अतः प्राकृतिक रंगाई की इस अवधारणा को पुनर्स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है।

इस सम्बन्ध में अवनि संस्था ने सार्थक पहल की है। संस्था विगत 10 वर्षों से जनपद पिथौरागढ़ एवं बागेश्वर के गाँवों में उपयुक्त तकनीकी के प्रचार-प्रसार एवं हस्तशिल्प के विकास के माध्यम से रोजगार सृजन के अवसर विकसित करने की दिशा में कार्यरत है। प्राकृतिक रंगाई इस रोजगारपरक कार्यक्रम का महत्त्वपूर्ण पहलू है। प्राकृतिक रंगों के प्रयोग की परम्परा को पुनः प्रचलित करने हेतु अवनि ने दो स्तरों पर प्रयास किए हैं। प्रथम, वहाँ से पुनः शुरुआत की है जहाँ उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया था। पर्यावरण संरक्षण का विशेष ध्यान रखते हुए केवल पेड़ से गिरे हुए फलों, फूलों एवं निष्प्रयोज्य पदार्थ जैसे अखरोट का गाल एवं प्याज के छिलके आदि का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा रंगाई पौधों की खेती को भी प्रोत्साहित किया गया है। हरड़ एवं अखरोट के निष्प्रयोज्य भाग के रंगाई में प्रयोग से ग्रामीण जनता इसके संरक्षण एवं वृक्षारोपण हेतु भी प्रोत्साहित हुई है। जिससे अन्ततोगत्वा जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है।

दूसरे स्तर पर अवनि ने निरन्तर नए प्रयोगों को जारी रखा है। रंगाई हेतु पौधों का प्रयोग करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि उनका अतिदोहन न हो तथा उन्ही पौधों का प्रयोग किया गया है जो आसानी से उपलब्ध हैं। गिरे हुए फलों, पत्तों एवं छिलकों को ग्रामीणों द्वारा एकत्रित किया जाता है। साथ ही एक ऐसी जंगली घास का प्रयोग किया जा रहा है जो कि अन्य वनस्पतियों को उगने नहीं देती तथा अत्यधिक मात्रा में विद्यमान है नेपाल में इसे वनमारा (वनों का विनाशक) के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह अपने आस-पास अन्य प्रजातियों को उगने नहीं देती। इस पौधे से हरे एवं सुनहरे रंग के चार शेड प्राप्त होेते हैं। इस पौधे का उपयोग और कोई नहीं है।

वर्तमान में अवनि के हस्तशिल्प कार्यक्रम में प्रयुक्त होने वाले समस्त तागे की रंगाई प्राकृतिक रंगों में की जा रही है। तागे एवं कपड़े की रंगाई में सफल प्रयोग के बाद प्राकृतिक पेंटिग रंग एवं प्राकृतिक कुमकुम (पिठा) बनाने कि कला को भी पुनर्जीवित किया है। हरड़, अखरोट के गाल, हल्दी एवं दाड़िम के छिलके से पेंटिग रंग बनाकर उन्हें बाजार में बिक्री हेतु प्रस्तुत किया गया है।

प्राकृतिक रंगों के उस प्रत्येक पहलू को पुनर्जीवित करने की कोशिश हो रही है जिसका प्रयोग पूर्वजों द्वारा किया जाता था। इस क्रम में कमेट से मिलते जुलते एक अन्य पदार्थ की खोज की गई है जो घर की पुताई हेतु रासायनिक रंगों का विकल्प बन सकता है। इस पदार्थ का सफलता पूर्वक प्रयोग अवनि की कार्यशाला में किया गया है जो कि अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के कारण आकर्षण का केन्द्र बना है।

इससे हमारी समृृद्ध परम्परा को नई पहचान मिली है तथा राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक रंगों में रंगे उत्पादों के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया रही है। प्राकृतिक रंगों के विशुद्ध प्रयोग के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ की शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक परिषद (यूनिसेफ) द्वारा अवनि के उत्पादों को विगत दो वर्षों से उत्तम गुणवत्ता का प्रमाणपत्र प्रदान किया गया है।