हरिद्वार की झिलमिल झील के प्राकृतिक स्रोत हुए जिंदा

Submitted by UrbanWater on Wed, 05/08/2019 - 12:48
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आज स्वच्छ जल की कमी का खतरा पूरे विश्व पर मंडरा रहा है। स्वच्छ जल न मिलने के कारण हर रोज हजारों लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। वन संपदा का लगातार दोहन करने के कारण जंगलों में तक वन्यजीवों के लिए जरूरत के अनुरूप पानी उपलब्ध नहीं है। जिससे भारत के कई इलाकों में वन्य जीव पानी की तलाश में आबादी वाले इलाकों का रुख कर रहे हैं। जिससे पता चल रहा है कि स्वच्छ जल की कमी केवल इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि वन्यजीवों के लिए भी  एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है। स्वच्छ पेयजल की समस्या के निदान के लिए हर देश की सरकार हर साल करोड़ों रुपए खर्च करती है लेकिन इसके बावजूद भी स्वच्छ जल की उपलब्धता का स्तर हर साल घटता जा रहा है। इसके लिए केवल शासन और प्रशासन ही नहीं बल्कि आम जनता में जागरूकता का अभाव जिम्मेदार है, लेकिन हरिद्वार वन प्रभाग केदारनाथ आपदा में विलुप्त हो चुके 4 प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर पूरे विश्व के लिए मिसाल बन गया है।

2013 में हो गये थे लुप्त

हरिद्वार में झिलमिल झील कंजर्वेशन रिजर्व का दलदलीय इलाका 148 हेक्टेयर में फैला हुआ है। ये क्षेत्र दलदलीय बारहसिंघों के प्रवास स्थल के रूप में जाना जाता है। 2013 में जब उत्तराखंड में केदारनाथ आपदा आई थी, तो वो अपने साथ खूब तबाही भी लाई थी। उस वर्ष पूरे उत्तराखंड में भारी वर्षा हुई थी जिसकी वजह से उन क्षेत्रों में भी नुकसान हुआ था जहां केदारनाथ की तबाही नहीं पहुंची थी। उसी तबाही में हरिद्वार के रसियाबड़ स्थित झिलमिल झील कंजर्वेशन रिजर्व के क्षेत्र में सिल्ट जमा हो गई थी। जिससे जल के 4 प्राकृतिक स्रोत विलुप्त हो गए थे और पानी की कमी के कारण वेटलैंड क्षेत्र लगातार सूख रहा था। सूखने के कारण कई बार क्षेत्र में आग भी लगी जिससे वन्यजीवों पर खतरा मंडराने लगा था। वन्यजीवों और वन संपदा की सुरक्षा को देखते हुए हरिद्वार बन विभाग ने बीते वर्ष एक योजना बनाई। जिसके अंतर्गत झिलमिल झील कंजर्वेशन रिजर्व से अनावश्यक झाड़ियों को साफ किया गया।

वेटलैंड एरिया में जमा सिल्ट को निकाला गया। इसका परिणाम यह निकला कि सिल्ट जमा होने के कारण विलुप्त हो चुके 4 प्राकृतिक जल स्रोत पुनर्जीवित हो गए। जिससे पानी की उपलब्धता होने के सूखा पड़ चुका 50 हेक्टेयर क्षेत्र फिर से दलदलीय हो गया और यहां अब खूब पानी है। पानी की उपलब्धता बढ़ने के कारण घास के क्षेत्र का भी फैसला होने लगा। साथ ही उसका सकारात्मक प्रभाव पक्षियों पर भी पड़ा और यहां पक्षियों की प्रजातियों में भी काफी इजाफा देखा गया।

अपने आप बन रहे छोटे तालाब

हरिद्वार वन प्रभाग के डीएफओ आकाश वर्मा ने बताया कि 4 प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के अलावा झिलमिल झील को भी पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। पानी के ठहराव के लिए जगह-जगह बंदे बनाकर पानी को एक जगह रोका जा रहा है ताकि झील में पानी निरंतर रूप से बना रहे। साथ ही झील तक पानी पहुंचाने के लिए अन्य व्यवस्था भी की जा रही है ताकि वन्य जीवों को पानी के संकट से जूझना न पडे।

4 प्राकृतिक जल स्रोत पुनर्जीवित होने से उन पर आर्टिफिशियल वेल बनाये गए हैं। जिससे पूरे वेटलैंड क्षेत्र में पानी का सैलाब हो रहा है और अपने आप ही छोटे-छोटे तालाब बन रहे हैं। वन विभाग द्वारा इन तालाबों को आपस में इंटर लिंक (जोड़ा जा रहा है) भी किया जा रहा है। ताकि पानी अनावश्यक रूप से एक जगह एकत्रित ना हो और पूरे क्षेत्र में फैले और बारहसिंगा को पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सके।
 

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