संकट में है सुजान गंगा

Submitted by admin on Mon, 05/17/2010 - 08:22
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राजस्थान के भरतपुर जिले में एक सुजान गंगा है. ऐतिहासिक महत्व की ये नहर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष के साथ लोगों के लिए मुसीबत बन गई है. अब एक बार फिर न्यायालय ने सुजान गंगा के उद्धार के लिए हस्तक्षेप किया है. देखना ये है कि कोर्ट की फटकार के बाद सरकारी अमला कुछ करता है या फिर वो ही ढाक के तीन पात वाली बात होकर रह जायेगी.

भरतपुर क्षेत्र पवित्र ब्रज भूमि का अंग माना जाता है.यह ट्रांस यमुना मैदान के अन्तर्गत आता है. जाटों के निवास के समय 17 वीं सदी में यह जटवाडा के रूप में विख्यात था. बरसाती नदियों वाणगंगा, रूपारेल, गंभीर और कांकुद के द्वारा यहाँ बाढ क्षेत्रों और दलदलों का निर्माण हुआ और स्थानीय वनस्पति के जंगलों का विकास होता चला गया. इन्हीं जंगलों को काटकर तथा दलदलों को सुखाकर जाटों ने कृषि योग्य भूमि का विकास किया. साथ अपनी सुरक्षा के लिए मिटटी के किलों का निमार्ण किया.इतिहास में भरतपुर ‘लोहागढ’ के नाम से प्रसिद्व है. यहाँ का किला अभेध माना गया है. 19 वीं सदी में जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद अपने चरम पर था, मराठों के अतिरिक्त सब उनकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे. छोटी सी भरतपुर रियासत ने ही कंपनी सरकार को चुनौती दी थी. 1805 में लडे गये आंग्ल-जाट युद्व में अंग्रेजों को मुँह की खानी पडी. इसकी इस अभेद्यता में इसके चारों और बनी ‘सुजान गंगा’ नहर का अपना योगदान रहा. जिसे पार कर कोई दुश्मन किले तक पहुँच ही नहीं पाया. अंग्रेज भी नहीं.

भरतपुर की जीवनदायिनी मानी जाने वाली ये नहर आज इसी शहर के लिए एक प्रकार से अभिशाप बन कर सामने आ रही है. एक ओर जिंदगी की परेशानियों से दुखी लोग इसमें कूद कर अपनी जान दे देते है. तो नवजात शिशुओं, कन्या भ्रूणों को भी इसकी गहराई में समा जाते है. इतना ही नहीं इसका प्रदूषण अब आस-पास रहने वालों के साथ ही शहर भर को अपनी चपेट में ले रहा है. दुख का विषय ये है कि इसकी सफाई और पर्यटन महत्व का बनाने के नाम पर कई बार करोडों रूपये खर्च भी हो चुके है मगर हालात बद से बदतर ही हुये है. इतना ही नहीं हाल ही में राजस्थान उच्च न्यायालय तक को तमाम अफसरों को कड़ी फटकार लगानी पडी है. रियासत के वारिशों ने भी अपने पुरखों की बनाई इस अदभुत धरोहर को लेकर कभी कोई गंभीरता नहीं दिखाई है जबकि राजनैतिक दृष्टि से भरतपुर अधिकांश समय उनके ही अधीन रहता चला आ रहा है. कांग्रेस में नेहरू खानदान के खासमखास विदेशमंत्री रहे नटवर सिंह का यह गृह जिला है.

1743 से 1751 के बीच राजा सूरजमल ने भरतपुर में किले का निर्माण करवाया. कच्ची मिटटी के बने पारित दुर्ग के चारों ओर करीब 5 किलोमीटर लंबाई की सुजान गंगा नहर बनबाई. 250 फीट चौडाई वाली नहर की गहराई को लेकर को लेकर कई प्रकार की बातें कहते है. कुछ का मानना है कि गहराई का कोई पता नहीं. वही कुछ लोग कहते है कि 10 से अधिक हाथियों की लंबाई के बराबर है. इतिहास के प्राध्यापक डां आलोक खन्ना की मानें तो सुजान गंगा नहर 50 से 60 फीट गहरी है. इस नहर की अपनी अद्भुत विशेषताएं हैं जिनकी पकड़ आज के इंजीनियर नहीं खोज पाए हैं. नहर में पानी के भरने और गंदे पानी के निकास के लिए जमीन के अंदर से व्यवस्थाएं थी. शहर से 10 किलोमीटर दूर स्थित अजान बाँध के पानी से नहर को भरा जाता था. आज दोनों ही व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है. इसके साथ ही शहर भर की गंदगी अब नहर के हवाले की जाने लग गई है. इस गंदगी को रोकने के लिए 3 करोड़ की लागत से एक नाला भी चारों ओर बनाया जा चुका है जो पूरी तरह से बेकार पडा हुआ है.

बुजुर्गों की माने तो पूरा शहर नहर के घाटों पर नहाने आता था. खिरनी घाट पर तो माने मेले के जैसा माहोल रहता था. नहर के सीमा क्षेत्र में सैकडों कुऐं थे जिनके मीठे पानी से शहर भर की प्यास बुझती थी. आज अस्तित्व के रूप में सुजान गंगा तो है मगर उसके घाटों पर अब कोई नहाने नहीं जाता, कुएं भी अपना अस्तित्व खो चुके है. शहर में पीने योग्य मीठे पानी का अकाल है. भरतपुर के लिए पीने का पानी 50 किलोमीटर दूर के बांध वारैठा बाँध से आता है. भविष्य के संकट के लिए अरबों रुपयों की लागत से चम्बल नदी से पानी लाने की योजना पर काम चल रहा है. जबकि शहर भर के लिए पानी की आपूर्ति करने वाली सुजान गंगा अब इस शहर के लिए एक अभिशाप बन गई है..

स्वंयसेवी संस्था देव जन कल्याण संस्थान के निदेशक मधुवन सिंह गुर्जर का इस संबंध में कहना था कि सरकारें प्रदेश में पानी के लिए हायतौवा तो कर रही है लेकिन किसी का भी ध्यान पारम्परिक जलस्त्रोतों की ओर नहीं है. भरतपुर शहर में आने वाले दिन पीने के पानी की दृष्टि से बहुत बुरे दिन आने वाले है. सुजान गंगा नहर इसका बेहतर विकल्प हो सकती है. सरकार और उसके नुमाइंदो का इस ओर ध्यान ही नहीं है. इस शहर के वासी भी कम दोषी नहीं है जिन्होंने अपने आशियानों की सफाई के चक्कर में इतिहास की इस धरोहर को नष्ट होने के कगार पर पहुँचा दिया है.

वर्ष 2003 की 6 मार्च को राजस्थान उच्च न्यायालय ने सुजान गंगा नहर की सफाई,गंदे पानी की आवक रोकने और स्वच्छ पानी की व्यवस्था करने संबंधी आदेश राज्य सरकार को दिये थे. इन आदेशों की कोई पालना नहीं हुई. उल्टे कागजात गायब कर किसी भी दोषी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. हाल ही में न्यायालय ने दर्जनों अधिकारियों को तलब कर आदेशों की अवमानना करने को लेकर कड़ी फटकार लगाई. नगरीय विकास विभाग के प्रमुख सचिव के अनुरोध पर आगे 2 महीने का समय दे दिया है. न्यायालय ने गलत जानकारी देने ओर रिकार्ड गायब होने के कारण एडीएम को कडी फटकार लगाई. एडीएम ने शपथ पत्र पेश कर न्यायालय से माफी माँगी है.

सुजान गंगा नहर एक प्रकार से सेप्टिक टैंक का रूप ले चुकी है. शहर भर की गंदी नालियाँ, कूडा करकट, पाँलिथीन और मैला नहर में डाला जा रहा है. नहर का पानी बिल्कुल हरा नजर आता है. इसके पास से गुजरने के दौरान आने वाली बदबू ने लोगों को परेशान कर रखा है. नगरपरिषद ने हाल ही में नहर से पाँलिथीन निकालने का करीब पाँच लाख का ठेका दे दिया है.

सुजान गंगा नहर के जीर्णोद्वार, प्रदूषण मुक्त करने और पर्यटन महत्व का बनाने के लिए राज्य सरकार ने 120 करोड की एक कार्ययोजना बनाई है. जिसमें से 56 करोड़ की वित्तीय स्वीकृति शीघ्र जारी करने का भरोसा मुख्यमंत्री ने सांसद रतनसिंह को दिया है. स्थानीय लोगों की माने तो एक बार फिर सरकारी हुक्मरानों और नेताओं के नहर के सहारे करोडपति होने के दिन आ गये है. इस नहर के जीर्णोद्वार और साफ-सफाई ने अब तक न जाने कितने ही लोगों के जीवन का उद्वार कर दिया है.
 
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