धरती का अमृत है पानी

Submitted by admin on Sat, 05/29/2010 - 08:26
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नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक स्व.सी.वी. रमन से किसी ने एक बार भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा के दौरान पूछा- “क्या सचमुच ही अमृत जैसी कोई पेय वस्तु रही है, जिसके लिए देव-दानव संग्राम की स्थिति बन गई थी।”

कुछ गंभीर होकर सोचने के उपरान्त वे बोले- “मनुष्य समाज व्यर्थ ही युगों से उस काल्पनिक दीर्घायुकारी दैवी-अमृत की खोज में रहा है, जिसकी एक घूंट वह समझता है कि उसे अमर बना देगी। जीवन का वास्तविक दाता सदा हमारे निकट रहा है और यह है सबसे सामान्य तरल, सादा पानी। प्रलयोपरान्त समुद्र के खारे पानी का शोधन-मंथन कर मीठे पानी के पानी की खोज ही संभवतः अमृत की खोज की कहानी भी रही हो। प्रलय में निश्चय ही सारा पानी समुद्रीय खारा पानी हो गया हो।”

“तब तो इसकी रासायनिक विशेषताएं निश्चय ही असाधारण होंगी।” उन सज्जन ने चट से पूछा।

“हां, प्रकृति का दिया गया यह अनुपम पीने योग्य तरल द्रव्य विलक्षण गुणों का भण्डार है। इसी अर्थ में यह अमृत भी कहा जाने का हक पाता है। पानी सभी के जीवन का आधार है। प्रत्येक जीव जन्तु और प्रत्येक पौधे के शरीर में मुक्त और संयोजित पानी का काफी बड़ा अनुपात होता है। शरीर की कोई ऐसी क्रिया सम्भव ही नहीं है, जिसमें पानी की अनिवार्य रूप से आवश्यकता नहीं रहती हो। निश्चय ही पानी हर जन्तु के जीवन के लिए आवश्यक यद्यपि यह भी सत्य है कि प्रत्येक वनस्पति जाति के लिए आवश्यक जल की मात्रा में बहुत अधिक अन्तर होता है। इस प्रकार पानी का उपयोग मानव कल्याण का आधार भी है।

हम पानी को वैज्ञानिकता की तराजू पर तोलें तो भी वह महत्वपूर्ण ही साबित होने की योग्यता रखता है। एक अर्थ में पानी द्रव्यों में सबसे साधारण है पर दूसरे अर्थ में वह अपने उन आश्चर्यजनक गुणों के कारण तो इसकी जन्तु और वनस्पति जीवन-साधनों की अद्वितीय क्षमता के लिए उत्तरदायी है, सबसे अधिक असाधारण है। इसी कारण जल की प्रकृति और गुणधर्म का अन्वेषण उच्चतम वैज्ञानिक रोचकता का विषय है और इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ अनुसंधान किया जा सकता है।”

एक वैज्ञानिक के मुख से पानी के बारे में इतनी महत्वपूर्ण जानकारी पाकर उनकी जिज्ञासा जागृत हो उठी थी। वह पूछ उठा- “क्या पानी के बिना मानव से जीवन संभव नहीं होगा, महाशय।”

“शायद नहीं। खाद्य पदार्थ खाये बिना मनुष्य काफी दिनों तक जीवित रह सकता है लेकिन पानी के बिना तो 60 से 80 घन्टे के अन्दर उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए जीवन रक्षा के लिए स्वच्छ प्राणदायक तत्व वायु के बाद इंसान के लिए पानी ही सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ है, जिसे प्रकृति से हर कहीं उपलब्ध करवाने की पहल की है।”

“तब तो शारीरिक स्थितियों पर पानी का प्रभाव स्पष्ट परखा जा सकता है।” वह फिर जिज्ञासावश पूछ उठा।

“हां बंधु! परखा ही जा सकता है। तथ्य तो यह है कि हमारे शरीर को ही जटिल जल प्रणाली का संवाहक कहें तो गलत नहीं होगा। भिन्न-भिन्न तरह के तरल पदार्थ छोटी-बड़ी नलियों में होकर पूरे शरीर में सदैव दौड़ते ही रहते हैं। प्रकृति हमारे जीवन निर्वाह के लिए जिन विभिन्न अंगों को पौष्टिक पदार्थ पहुँचाती रहती है तो इस क्रिया में उसका वाहक जल ही है। इससे शरीर का हर क्षुद्रतम कोष सदैव पानी से घुलता रहता है। प्रकृति ने शरीर शुद्धि की यह प्रक्रिया चलाकर हम पर खूब उपकार किया है।”

“रमन साहब तो फिर शरीर में जल की स्थिति का रासायनिक विश्लेषण भी समझा दीजिए न।”

“हाँ, यह जानना भी जरूरी है। हमारे शरीर का कोई 70 प्रतिशत भाग पानी ही है। हमारी लार का 99.6 भाग पानी से ही बना है। पाकस्थली के अमल रस का 97.5 भाग, मूत्र का 99.3 भाग, पित्त का 56.8 भाग और यहां तक की हड्डी का 13 प्रतिशत भाग पानी होता है। शरीर में अनवरत विद्यमान यह जलीय अंश हर समय मल, मूत्र, पसीना और निःश्वास वायु के साथ बाहर निकलता रहता है। समशीतोष्ण देश के एक पूर्ण वयस्क व्यक्ति की निश्वास वायु के मार्ग से प्रतिदिन 350 सी.सी. पानी निकलता है। चर्म के मार्ग से निकलता है। 500 सी.सी. और मूत्राशय से 2,500 सी.सी.। गरम देशों में इससे भी काफी अधिक पानी निकल जाता है। कठोर परिश्रम करते समय एक घण्टे में दस पॉइण्ट पानी तक भी निकलते हुए देखा गया है। ये तथ्य ही बताते हैं कि पानी का रासायनिक महत्व भी हमारे लिए कम नहीं है।”

“तब तो हमें पानी की सुरक्षा के लिए भी सदैव तत्पर रहना होगा।” उसने उत्साह से पूछा।

“हाँ, भाई। पानी है इसलिए हम हैं। हमें पानी प्रकृति ने सुलभ करवा रखा है इसलिए अन्धाधुन्ध उपयोग करके खराब नहीं करना चाहिए।”
 

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