केलो नदी को बचाने की जरूरत

Submitted by admin on Tue, 06/08/2010 - 07:32
वेब/संगठन

छत्तीसगढ़, रायगढ़ का ख़मरिया गांव भारत के बाक़ी गांवों से कम भाग्यशाली नहीं है. इसकी सा़फ-सुथरी गलियां, सलीके से बनाए गए मिट्टी के घर यह बताते हैं कि दूसरे ग्रामीण इलाक़ों की समृद्धि किस तरह हो सकती है. केलो नदी इसी गांव से होकर गुज़रती है. यही नदी इन इलाक़ों की कृषि के लिए सिंचाई का साधन है. गांव से मुख्य मार्ग तक पहुंचने का साधन भी आसान है. बिजली आदि सभी सुविधाएं होने के कारण शिक़ायत की कोई वजह नहीं हो सकती है. लेकिन, यदि कोई इस गांव के आवासीय इलाक़ों से होकर गुज़रता है तो उसके मन में इसकी ग़लत छवि क्यों उभर आती है? सबसे ख़ास बात यह कि वह पानी जो खमरिया और इसके पड़ोसी गांवों का पालन पोषण करता है, काला हो रहा है. यह पानी पीने, नहाने और सिंचाई के लायक़ बिल्कुल ही नहीं रह गया है.

खमरिया के पास केलो नदी की जलधारा कोयला खान मालिकों और मोनेट इस्पात एवं ऊर्जा लिमिटेड द्वारा नियंत्रित होती है. यदि कोई चिड़िया उड़कर आए तो कोयले की खान से खमरिया गांव की दूरी तीन किलोमीटर से ज़्यादा नहीं होगी. जबकि घुमावदार सड़क से गांव और कोयला खान के बीच की दूरी पांच किलोमीटर पड़ती है. नदी में खदानों के पानी उत्सर्जन का स्रोत भी है. यह बात मुझे गांव के ही एक आदमी ने बताई. 5 दिसंबर 2009 को मैं वहां पहुंची. केलो नदी में कोयले के अपशिष्टों के प्रवाहित होने के किस्सों को सुनकर मैं बिल्कुल ही हैरान रह गई. उस ग्रामीण ने बताया कि दरअसल आज आप नदी की जो गंदगी देख रही हैं, वह एक सप्ताह पहले नदी में बहाए गए खदानों के अपशिष्टों का नतीजा है. केलो नदी खमरिया और उसके आसपास के ग्रामीणों के लिए महज़ जीविका का स्रोत नहीं है, बल्कि यह पूरे रायगढ़ ज़िले को पीने का पानी मुहैया कराती है. साथ ही यह महानदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है. यह नदी रायगढ़ शहर के पास भी प्रदूषण का दंश झेलती है, क्योंकि वहां उद्योग का़फी हैं.

हम खमरिया गांव रमेश अग्रवाल और राजेश त्रिपाठी के साथ पहुंचे. ये दोनों सामाजिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता हैं. पिछले चार-पांच सालों से प्रदूषण फैलाने वाले उपक्रमों के ख़िला़फ ये लगातार अपनी आवाज़ उठा रहे हैं. पर्यावरण को बर्बाद करने वालों के ख़िला़फ इन्होंने मोर्चा खोल रखा है. ये उस पर्यावरण को बचाने की मुहिम में लगे हैं, जिसकी वजह से हमारा अस्तित्व क़ायम है. रायगढ़ ज़िले में उद्योगों की वजह से जिस तरह पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, खमरिया गांव उसकी दूसरी कड़ी है. छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के मीलापुरा एवं कोंडकेल गांवों में मोनेट इस्पात को कोयला खनन के लिए साल 2000 में ही अनुमति मिल गई थी. इस कंपनी को यह अनुमति 1994 के पर्यावरण प्रभाव अधिसूचना के तहत मिली थी. इसके ज़रिए यह कंपनी हर साल 860.416 हेक्टेयर इलाक़े में 1.1 मिलियन टन प्रति वर्ष खनन कर सकती थी. पर्यावरण विभाग से जब इसे अनुमति मिली थी तो खुदाई का यह क्षेत्र मध्य प्रदेश राज्य के अंतर्गत था. यह ध्यान देना बहुत ज़रूरी है कि छत्तीसगढ़ राज्य का गठन नवंबर 2000 में हुआ था.

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने जिन 17 आम और 10 ख़ास शर्तों के साथ खुदाई के लिए मंजूरी दी थी, उसकी क्या अहमियत है? यह बेहद दिलचस्प है कि इनमें से किसी भी शर्त में यह ज़िक्र नहीं किया गया कि गंदा और खदान से निकला पानी कहीं और प्रवाहित किया जाएगा. जबकि लीज पर दी गई जगहों पर ही यह सारा कुछ होना चाहिए. इसीलिए हमने अपनी यात्रा कोंडकेल से शुरू की, ताकि हम इस बात का पता लगा सकें कि जो गंदा पानी नदी में प्रवाहित हो रहा है, वह खदानों से ही निकल रहा है, क्योंकि खमरिया ग्रामवासी इस बात को लेकर बिल्कुल आश्वस्त थे. हम उस जगह का पता लगाने के लिए का़फी जद्दोजहद कर रहे थे. इस दौरान एक अज्ञात साईकिल सवार ने रुककर हमसे बात की. हमारी मंशा जानकर उसने हमें उन जल स्रोतों के बारे में बताया, जिनकी हमें तलाश थी. ये जल स्रोत वाक़ई कोयले की खदानों से निकलने वाले काले पानी से भरे थे. हमने देखा कि कोंडकेल की खदान के बिल्कुल बगल में एक नाला बह रहा था. इस नाले के बहने की दिशा जंगलों की तऱफ थी, जो वन विभाग के लिए अनजान नहीं है. खदान के पास एक जंग लगा पानी का पाइप था. यह सड़क से होकर जंगलों की तऱफ जाता था. दरअसल इस पाइप को खदान से काले पानी की निकासी के लिए सड़क से लगाया गया था. जब पानी जंगलों के आसपास या अपनी दिशा बदल कर खेती योग्य भूमि की ओर रुख़ कर लेता है तो उसके असर को समझा जा सकता है. इसने हमें वहां रुकने पर विवश किया, ताकि हम उसकी फोटो ले सकें और उसकी असलियत को देख सकें.

इस पूरे क्षेत्र में जीपीएस का उपयोग किया गया था. जैसा मैंने आपको बताया, केलो नदी खमरिया से होकर गुज़रती है. और, हम 22.09,30.8 अक्षांश और 83.30,28.3 देशांतर रेखा के पास मौजूद थे. कोयले के पानी ने मोनेट के कोंडकेल संयंत्र के पास जो नाला बनाया था, वह 22.10, 32.0 अक्षांश और 83.21,30.8 देशांतर के पास स्थित था. यानी दोनों ज़्यादा दूर नहीं थे. लेकिन यही पूरी हक़ीक़त नहीं थी. हमें इस बात को सुनिश्चित करना था कि क्या वाक़ई यह नाला केलो नदीं में मिलता है. हम उस नाले के प्रवाह की दिशा में चलते रहे, तो हमें पता चला कि डोमा नाला केलो नदी में खमरिया और दूसरे गांवों के पास जाकर मिलता है. यह हमारे लिए कोई हैरानी वाली बात नहीं थी, क्योंकि इससे भी अधिक कोयले की खदानों वाला पानी यहां 22.10, 33.5 अक्षांश और 83.31, 20.2 देशांतर के पास मिलता था.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस पानी में विषैले पदार्थों की मात्रा कितनी होगी? वहीं ध्यान रखने वाली बात है कि इसी पानी का इस्तेमाल गांव वाले अपनी दैनिक ज़रूरतों के लिए करते हैं. क्या वे इस बात से वाक़ि़फ हैं कि इसका इस्तेमाल उनके लिए सुरक्षित नहीं है? भला कोई इस बात का पता कैसे लगा सकता है कि उनके जंगलों के आसपास जो पानी बह रहा है, वह खदानों से निकलने वाला विषैला पानी है? रायगढ़ ज़िले के लिए इसका समाधान निकालना चुनौती भरा काम है, क्योंकि उद्योगपति धनबल और तऱक्क़ी के एजेंडों के ज़रिए विनाश का यह सारा खेल खेलते हैं. लेकिन, हमें इन तथ्यों को वैज्ञानिक तौर पर स्वीकार करने की आवश्यकता है. और, ईमानदारी से सहयोग करने की ज़रूरत है. यह स़िर्फ खमरिया गांव की कहानी नहीं है, बल्कि दूसरे गांवों जैसे लमदरहा, गरे, कोसंपाली, कोंडकेल, कुंजेमुरा और तमंर आदि की भी यही राम कहानी है. उपर्युक्त बातें हमें जनचेतना संस्था के सदस्य डॉ. हरिहर पटेल ने बताईं. डॉ. पटेल पेशे से चिकित्सक हैं और उन्होंने इन इलाक़ों में लोगों के स्वास्थ्य स्तर में गिरावट की ओर सभी का ध्यान खींचा है. इस समस्या की वजह मोनेट खदान से प्रवाहित होने वाला अपशिष्ट जल है. इन उदाहरणों से सीख लेकर और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर ही उन्होंने उद्योगपतियों, मसलन जिंदल समूह पर दबाव बनाने का साहस किया है. क्योंकि, इस समूह ने भी गरे गांव में खदान का काम शुरू करने का फैसला लिया है. लेकिन, डॉ. पटेल इस इलाक़े के बहुत बड़े भू-भाग के मालिक हैं और कंपनी उसे ख़रीदना चाहती है. बड़े भू-भाग पर स्वामित्व के कारण ही उनमें यह इच्छाशक्ति जगी है.

इन इलाक़ों की वैज्ञानिक जांच-पड़ताल और कार्रवाई अभी बाक़ी है. ऐसे में खमरिया गांव पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. जैसा कि मैंने आपको बताया, फिर भी मैं इस बात से आश्वस्त नहीं हूं कि केलो नदी में और कितना प्रदूषित पानी पचाने की क्षमता है. लेकिन, पानी के बहाव का चित्र हमें झकझोरता है. यह नदी ख़ुद को स्वार्थी लोगों के चंगुल से बचाने के लिए कार्रवाई की मांग कर रही है.
 

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