सूखते जलाशय

Submitted by admin on Thu, 06/17/2010 - 09:04

परंपरागत जल स्रोतों, वन क्षेत्रों और वन्य जीवों की सुरक्षा के दावे तो सरकारें बहुत करती हैं, पर हकीकत यह है कि इनसे संबंधित प्रयास घोषणाओं तक महदूद रह जाते हैं। पर्याप्त ध्यान न दिए जाने की वजह से अनेक झीलें, तालाब और दूसरे जल-स्रोत सूखते जा रहे हैं। जयपुर, उदयपुर आदि शहरों में पुरानी झीलों, तालाबों की उपेक्षा के कारण उनके सूखते जाने और फिर सरकार की मंजूरी से उन पर रिहाइशी और व्यावसायिक भवनों के निर्माण का तथ्य भी जगजाहिर है।

हरियाणा के सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान की झील इस सिलसिले की ताजा कड़ी है। गौरतलब है कि जनवरी के बाद जब इस झील का पानी कम होने लगता है, हरियाणा का सिंचाई विभाग इसमें लगातार पानी छोड़ता रहता है। मगर इस साल जानबूझ कर पानी नहीं छोड़ा गया। उद्यान के अधिकारियों का तर्क है कि झील में मागुर प्रजाति की मछलियों की संख्या काफी बढ़ गई थी, जो छोटी मछलियों को खा जाती थीं। छोटी मछलियों के न होने के कारण प्रवासी पंछियों का आना कम होता गया था। इसलिए झील को सुखा कर मछलियों की इस प्रजाति को समाप्त करनी ही एकमात्र रास्ता बचा था। किसी वन अधिकारी को ऐसे अतार्किक फैसले करने का अधिकार नहीं है। झील को सुखा देने से न केवल मछलियों की जिंदगी पर असर पड़ा, बल्कि वहां के दूसरे जीव-जंतु भी भोजन और पानी के अभाव में दम तोड़ने लगे। क्या उद्यान की देखरेख करने वाले अधिकारियों को इस बात का इल्म नहीं था कि ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है।

दरअसल, झील में पानी न छोड़े जाने की बड़ी वजह गुड़गांव में पेयजल की बढ़ती मांग है। झील में छोड़ा जाने वाला पानी शहर की जरूरतों में खपा दिया गया। फिर सर्दियों में बरसात कम हुई, इसलिए भी झील का जलस्तर नीचे रह गया। अब उद्यान के अधिकारी मांगुर मछलियों को समाप्त करने की दलील देकर हकीकत पर परदा डालने की कोशिश कर रहे हैं।

यह स्थिति अकेले सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान की नहीं है। देश की अधिकतर झीलें गाद भरते जाने की वजह से उथली हो गई हैं, ऊपरी इलाकों से बह कर उनमें गिरने वाले बरसाती पानी के रास्ते बंद कर दिए गए हैं, जिससे उनमें प्रायः जलस्तर नीचे रहता है। गरमी का मौसम शुरू होते ही उनमें दरारें नजर आने लगती हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं कि शहरों के विकास प्राधिकरण, नगर निगमों, उद्यानों के अधिकारियों ने सरकारी दबाव या भू-माफिया की मिलीभगत से जानबूझ कर कुछ झीलों और तालाबों को सूख जाने दिया, ताकि उन पर रिहाइशी या व्यावसायिक भवनों के निर्माण का रास्ता खुल सके।

गुड़गांव कारोबारी लिहाज से अनिवासी भारतीयों की पसंदीदा जगह बनता गया है। गुड़गांव के आसपास जमीन की कीमतें जिस तेजी से बढ़ी हैं और तमाम कंपनियां वहां अपना कारोबार फैला रही है, उसे देखते हुए सुल्तानपुर झील को सूख जाने देने के पीछे किसी साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर हरियाणा सरकार सचमुच इस उद्यान और झील के रखरखाव को लेकर संजीदा है तो उसे इसमें पानी छोड़ने में लापरवाही बरते जाने पर कड़े कदम उठाने से गुरेज क्यों होना चाहिए। शहर की जरूरतों के मुताबिक पेयजल का बंदोबस्त करना है तो हरियाणा सरकार को सुल्तानपुर झील की बलि चढ़ाने के बजाय राज्य में पानी की बर्बादी रोकने और जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
 
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