जहां पर उतरी कृष्णप्रिया यमुना

Submitted by admin on Sat, 06/19/2010 - 12:56
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भास्कर

हिन्दू धर्म के हिमालय क्षेत्र के चार पावन धामों में यमुनोत्री धाम प्रमुख है। यमुनोत्री, यमुना नदी का उद्गम स्थान है। यह भारत के उत्तरांचल प्रदेश में स्थित है। यहां बंदरपुछ चोटी के पश्चिम किनारे पर यमुनोत्री मंदिर स्थित है। जो समुद्र तल से 3185 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। हिमालय से निकलकर पूर्व दिशा में बहने वाली पवित्र नदियों में गंगा और यमुना नदी प्रमुख है। पावन गंगा के समानांतर बहते हुए यमुना नदी का जल प्रवाह प्रयागराज (इलाहाबाद) में गंगा के प्रवाह से मिल जाती है। यहीं पर गंगा-यमुना-सरस्वती का पवित्र संगम स्थल है।

यमुनोत्री पवित्र जल तीर्थ है। यह चार धामों की यात्रा का पहला ठहराव स्थल भी है। यमुना नदी के पवित्र जल की विशेषता है कि अपने उद्गम स्थल से लेकर गंगा नदी में विलीन होने तक इसका जल श्याम या कृष्ण रंगी होता है। इसलिए इसका नाम कालिंदी भी प्रसिद्ध है। इसके अलावा यमुना नदी को कलिंद पर्वत से निकलने के कारण भी कालिंदी कहते हैं। इसी पर्वत पर सप्तऋषि कुंड और सप्त सरोवर भी है। पवित्र ग्रंथ वाल्मीकीय रामायण में यमुना का उद्गम यामुन पर्वत से होने का वर्णन है। वास्तव में यमुना नदी का मूल उद्गम स्थल यमुनोत्री से ऊपर कालिंदी पर्वत पर ही है। किंतु स्थान अधिक ऊँचाई पर और दुर्गम स्थान है। यह लगभग ४४२१ मीटर ऊंचाई पर स्थित है। यहां स्थित एक झील से यमुना नदी निकलती है।

कालिंदी पर्वत से नीचे यमुनोत्री के समीप यमुना जैसे शिशु रुप में होती है। यहां उसका जल साफ-पवित्र और चांदी की आभा वाला ठंडा होता है। यहां से आगे बढऩे पर यमुना अन्य छोटे प्राकृतिक जल स्त्रोतों से मिलकर एक विशाल नदी में बदल जाती है। यमुनोत्री के पास यमुना का प्रवाह उत्तर-पूर्व की ओर हो जाता है। इसलिए इसे यमुनोत्री कहते हैं। एक ओर मान्यता के अनुसार इस स्थान पर यमुना नदी के उतरने के कारण भी इसे यमुनोत्री कहा जाता है।

पौराणिक महत्व के अनुसार यमुना में स्नान से मानव मृत्यु भय और पापों से मुक्त हो जाता है। यमुनोत्री तीर्थ सभी सिद्धीयों को देने वाला है। यहीं पर अग्रिदेव और यम ने तप के द्वारा दिक्पाल और लोकपाल का पद पाया था।

पुराणों में यमुना को सूर्य की पुत्री और यमराज की बहन बताया गया है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भाईदूज का पर्व यम के यमुना से मिलने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। कहा जाता है यमुना ने अपने भाई से वरदान मांगा था कि इस दिन जो यमुना स्नान करे, उसे यमलोक न जाना पड़े। इस दिन यमुना तट पर यम की पूजा कर दान किया जाता है।

यमुनोत्री धाम के कपाट वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया यानि अक्षय तृतीया को दर्शन के लिए खुलते हैं। इस वर्ष १६ मई को श्रृद्धालुओं के लिए खोले जा चुके हैं। यमुनोत्री के कपाट दीपावली के बाद भाई दूज को बंद किए जाएंगे। ठंड के मौसम में 6 माह यहां से कुछ दूर स्थित जानकी चट्टी के समीप खरसाली स्थान पर यमुनोत्री की पूजा-उपासना पुजारियों द्वारा की जाती है।
 

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