हम समझें प्रकृति का सम्मान करना

Submitted by admin on Sat, 06/26/2010 - 09:55
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स्पैन, मार्च 2010

वन्य जीवों पर फिल्म बनाने वाले भारतीय फिल्मकार माइक पांडे मानते हैं कि पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक प्राणी को जीवन चक्र में अपना किरदार निभाना होता है। उनका विश्वास है कि पर्यावरण की हिफाजत के लिए सबसे जरूरी है लोगों को शिक्षित करना। वह इस बात को मानते हैं कि लोगों को जब यह समझाया जाता है कि किस तरह वनस्पतियां और जानवर इंसान के लिए जरूरी हैं तो वे इनके संरक्षण के लिए कदम बढ़ाते हैं।

माइक पांडे नतीजों को दर्ज़ करने में यकीन करते हैं। पांडे और रीवर बैंक स्टूडियो में मौजूद उनकी टीम के सदस्यों के लिए सिर्फ इतना ही काफी नहीं है कि उन्हें तीन बार ग्रीन ऑस्कर से नवाज़ा गया या फिर भारत के घरों में लोग उन्हें एक ऐसे शख्स के रूप में जानते हैं जो दूरदर्शन पर धरती से जुड़े मामलों पर अपना कार्यक्रम अर्थ मैटर्स दिखाता है। पांडे के लिए अहम है, मौजूदा और भावी पीढ़ी के लाभ के लिए, यह दिखाना कि एक जानवर को विलुप्त होने से बचा लिया गया है, एक क्रूर प्रथा पर प्रतिबंध लग गया है और पानी या वनस्पतियों के किसी महत्वपूर्ण स्रोत को मौजूदा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया गया है।

ये पांडे की फिल्में ही थीं जिनके चलते भारत में व्हेल, शार्क और गिद्धों की प्रजातियां विलुप्त होने से बचीं। हाथियों को पकड़ने के क्रूर तरीके पर उनकी फिल्म का ही कमाल था कि सरकार ने तुरंत कदम उठाया और ऐसी अमानवीय पद्धति पर रोक लग सकी।

पांडे इस बात में यकीन करते हैं कि शिक्षा और सूचना, विशेषकर फिल्मों के जरिए, ही वे आधार हैं जो आम लोगों को इंसान के संतानोत्पत्ति की ज़रूरत, जीवन रक्षा और अपना जीवन स्तर सुधारने की भावना के सम्मान के साथ पर्यावरण और जानवरों के संरक्षण के उपाय खोजने की ओर आकर्षित कर सकते हैं। पांडे का जन्म केन्या में हुआ और वह एक वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र के निकट ही पले-बढ़े। उन्होंने अमेरिका कीईस्टमैन कोडक कंपनी के ब्राउनी बॉक्स कैमरे से वन्य जीवों की तस्वीरें खींचना शुरु किया। पांडे स्पेशल इफेक्ट एवं स्टंट तकनीक के इस्तेमाल और जानवरों को बिना नुकसान पहुंचाए फिल्माने की अपनी दक्षता का श्रेय हॉलीवुड में काम करने के दौरान पाए अपने अनुभव को देते हैं। पांडे कहते हैं कि उनके स्टूडियो द्वारा बनाई 10 फिल्में इस समय अमेरिकी कांग्रेस की लाइब्रेरी में मौजूद हैं जिन्हें अब अमेरिकी विश्वविद्यालयों को उपलब्ध कराया जा रहा है।हॉलीवुड में पांडे ने फिल्मों में स्टंट और स्पेशल इफेक्ट के पुरोधा मशहूर रोडियो स्टार या कीमा कानुट के साथ काम किया। कानुट हॉलीवुड में खड़ी पहाड़ी चट्टान से सवार समेत घोड़े की छलांग और कुलांचे भरते घोड़े पर सवार काउबॉय को शूट करना, पशुओं की भगदड़, घुड़सवार सेनाओं के युद्ध और आखिर में बेन-हर फ़िल्म में रथों की दौड़ जैसे दृश्य फिल्माने के लिए प्रसिद्ध हैं। पांडे ने हॉलीवुड में उन लोगों के साथ प्रशिक्षण लिया जो जानवरों के स्टंट सीन करवाते थे और इन लोगों ने कार्लटन हेस्टन के अभिनय वाली मौलिकप्लेनेट ऑफ एप्स और रोमियो एंड जूलियट और ब्लेड रनर के लिए विजुएल एवं साउंड इफेक्ट तैयार किए थे।

हॉलीवुड के अपने दिनों को याद करते हुए पांडे कहते हैं, ‘‘मैंने अपने कौशल को मांजा और बहुत से दोस्त बनाए। वे बहुत ही अच्छे साल थे क्योंकि इसने मेरे नजरिए को व्यापक बनाया और मेरे दरवाजे खोले। वहां से लौटने के बाद मैं अपने बहुत से दोस्तों को... दक्षता हासिल करने और विशेषज्ञों से सीखने के लिए लॉस एंजिलिस भेजता रहा, क्योंकि जो आप कॉलेज में दो-तीन साल में सीख पाते हैं, वह इन विशेषज्ञों में से किसी की मौजूदगी में एक हफ़्ते में सीखा जा सकता है।’’

पांडे कहते हैं कि अमेरिका में उन्होंने सिर्फ फोटोग्राफी और लाइटिंग ही नहीं लचीलापन अपनाना और किसी काम के लिए ‘‘दी गई ब्रीफिंग’’ से आगे जाकर काम करना सीखा। वह कहते हैं कि वह हॉलीवुड में हेस्टन जैसे महान फिल्म स्टारों से मिले, ‘‘ये पेशेवर लोग थे और अपने काम में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। सबसे बड़ी बात ये खुद को काम करने वाले दूसरे लोगों से अलग नहीं समझते थे।’’

पांडे कहते हैं कि अभी भी भारत में बाघों, जंगली हाथियों, जल स्रोतों और वन संरक्षण के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है पर वह इस बारे में टीवी पर प्रसारित हो रहे अपने कार्यक्रम अर्थ मैटर्स से मिल रहे नतीजों से काफी संतुष्ट हैं। ‘‘जब मैंने ये कार्यक्रम शुरू किया था तब इस बारे में जागरूकता की काफी कमी थी।’’ लेकिन अब वह कहते हैं कि हालात अलग हैं। ‘‘गांवों में जहां असली भारत बसता है, करीब 67 प्रतिशत आबादी ऐसे मुद्दों के बारे में जागरूक है। उन्हें पता है कि इंसानों के साथ साथ पृथ्वी आज कैसी समस्याओं से जूझ रही है।’’ निश्चित रूप से लोगों को जागरूक करने में उनके कार्यक्रम का बहुत बड़ा हाथ है।

पांडे कहते हैं, ‘‘यह कार्यक्रम बहुत सरल है। यह जानकारियों को साझा करता है। मैं इस बात में गंभीरता से यकीन करता हूं कि अगर आप किसी चीज़ को समझते हैं तो आप उसकी इज्जत करेंगे... और जब आप किसी चीज़ की इज्जत करेंगे तो उसे संरक्षित करेंगे। और जाहिर है कि आप जिस चीज़ का संरक्षण करेंगे उससे प्यार भी करेंगे।’’ पांडे अपने प्रयासों के मकसद को संक्षेप में सामने कुछ इस तरह रखते हैं, ‘‘हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम अपने जीवन और प्रकृति जगत के संबंधों को समझें।’’तो एक ग्रामीण के जीवन और परभक्षी में क्या संबंध है?

पांडेइस सवाल के जवाब में बताते हैं, ‘‘बाघ और तेंदुए जंगली जीवन में खाद्य शृंखला की धुरी हैं। ये जंगल के इको सिस्टम में संतुलन कायम करने वाले प्राणी हैं। वे जंगल में बंदरों और हिरणों और अन्य जानवरों की तादाद नियंत्रण के बाहर नहीं जाने देते। मसलन, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की घटनाओं को लीजिए, यहां तेंदुए भारी तादाद में मार दिए गए। नतीजा क्या हुआ, बंदरों और जंगली बोर की संख्या में विस्फोटक बढ़ोतरी। अब ये जानवर खेतों तक आने लगे और फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे हैं। गांव वालों के लिए खेती करना मुश्किल हो गया है। एक इलाके के करीब 3,000 से 5,000 ग्रामीणों ने खेती करना छोड़ दिया। अगर इस इलाके में तेंदुए जीवित होते तो इन जानवरों की संख्या कम ही रहती... यह पर्यावरण से जुड़ा मामला है जो हम इंसानों की हरकत का परिणाम है। हमारी इस बारे में अज्ञानता का नतीजा कि जंगल में तेंदुए जैसे परभक्षी क्या भूमिका निभाते हैं।’’

पांडे अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए महात्मा गांधी के कथन का हवाला देते हैं। ‘‘हर प्राणी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए प्रकृति ने पर्याप्त दिया है लेकिन इंसान की लालच की भरपाई वह नहीं कर सकती... हमें यह समझना होगा कि हम इस दुनिया को दूसरे तमाम प्राणियों के साथ साझा करते हैं, हम यहां के नियामक नहीं, अगर प्रकृति के कानून का सम्मान किया गया तो पर्याप्त चीजें होगीं।’’

एक उदाहरण देते हुए पांडे कहते हैं, ‘‘भारत में हर साल चार-पांच महीनों में तकरीबन 4,000 अरब घन लीटर वर्षा होती है लेकिन इसमें से हम सिर्फ 12 फीसदी का ही इस्तेमाल कर पाते हैं। बांध बनाने में काफी लंबा वक्त लगता है और यह भारत की सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं। सिंचाई के लिए लगभग 80 फीसदी भूजल का प्रयोग होता है और इस वजह से इसका स्तर तेजी से घट रहा है और यह चिंता की बात है।’’ पांडे कहते हैं, ‘‘ऐसे हालात में जल्दी ही यह पानी भी खत्म हो जाएगा क्योंकि इस 80 फीसदी भूजल का दोहन तो हो रहा है,लेकिन उस रफ्तार से जल सरंक्षण का काम नहीं हो रहा।’’

समाधान क्या है?
वह कहते हैं, ‘‘हमें पानी का किफायत से इस्तेमाल करने वाला राष्ट्र बनना चाहिए।’’ वह जोर देकर कहते हैं कि हमें सिंचाई के तौर-तरीकों को बदलना होगा। इसके लिए उच्च तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। भारत भर में पानी एकत्र करने का सबसे बढ़िया तरीका इसे भूजल के रूप मे एकत्र करना है... हमें पानी के पारंपरिक स्रोतों पर भी ध्यान देना होगा जैसे कि नदियों और तालाबों में काफी समय से जमा गाद को निकाला जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि उनमें पानी साफ हो और औद्योगिक कचरा उनमें न जाए। ऐसा करके हम एक संतुलन कायम कर पाएंगे और हालात में कुछ फर्क नज़र आएगा।’’ उनकी दलील है कि ‘‘भारत में पानी की कमी नहीं है, यहां काफी पानी है बस उसके उचित प्रबंधन की दरकार है। यह काम युद्ध स्तर पर किया जाना चाहिए। स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण का काम होना चाहिए, हर गांव को अपने जल के संरक्षण के लिए जवाबदेह बनाना होगा। इससे गांवों में उन कुओं में तो पानी वापस भर जाएगा ही जो सूख रहे थे, उन स्रोतों में भी पानी लौटेगा जो खत्म हो रहे थे।’’

पांडे कहते हैं, ‘‘मुझे यकीन है कि हमारी धरती में अगर ज़रूरत पड़ी तो 12 अरब लोगों को भी झेल लेने की क्षमता है बशर्ते इसके साथ ढंग से पेश आया जाए। इसके लिए ज़रूरी है अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल इस तरह से किया जाए कि हम अपने संसाधनों का उचित प्रबंधन कर सकें और उनके प्रकृति के प्रति सम्मान दर्शाएं।’’

पांडे जल सुरक्षा और उसके साथ जुड़े दूसरे मुद्दे खाद्य सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित है। उनका दावा है कि इस समय दुनिया में करीब 1.2 अरब से 1.3 अरब तक ऐसे लोग हैं जिनके पास पीने का पानी उपलब्ध नहीं है और आशंका इस बात की है कि यह संख्या अगले 15 वर्षों में निश्चित तौर पर 2.5 से लेकर 3 अरब तक हो जाएगी। यह दुनिया की मौजूदा जनसंख्या का आधा हिस्सा है। वह बताते हैं, ‘‘दुनिया भर में फसल का उत्पादन घट रहा है और अगर पानी का यही हाल रहा तो यह और तेजी से घटेगा।’’

इस सबके बावजूद पांडे हालात को लेकर निराश नहीं हैं। उन्हें सिर्फ तब झल्लाहट होती है जब कोई जानवरों से दुर्व्यवहार करता है। उनकी कोशिश रहती है ज्यादा से ज्यादा कामों को निपटाने के साथ नए कार्य समूहों से जुड़ने की और एक और नई फिल्म बनाने की ताकि उन लोगों तक और जानकारियां पहुंच सकें जो बदलाव के पहरुए बन सकते हैं।पांडे ने अब तक बाघों के उपर कभी भी डॉक्यूमेंट्री नहीं बनाई, लेकिन अब वह ऐसी एक डॉक्यूमेंट्री द रिटर्न ऑफ द टाइगर बना रहे हैं और इस काम में उनकी मदद कर रहे हैं फिल्म स्टार जॉन अब्राहम। उनका कहना है, ‘‘रिटर्न ऑफ द टाइगर तभी संभव है जब हम सामूहिक प्रयास करें और एक साथ आएं। इसका अर्थ है राजनेता, नौकरशाह, आम नागरिक के अलावा स्थानीय समुदाय भी।’’

पांडे बाघों के वजूद को सृष्टि के लिए जरूरी बताते हैं। वह कहते हैं, ‘‘पृथ्वी का जल चक्र हमारे वनों पर निर्भर करता है। यह बात लोगों को समझ में आना जरूरी है। इसलिए वन हमारी ज़रूरत हैं और वनों के संरक्षण के लिए बाघों का होना आवश्यक है। यह पूरा एक चक्र है। अगर घास काटी जाती है तो उसे खाने के लिए हिरण भी तो चाहिए, शहद चाहिए तो मधुमक्खी चाहिए ही।’’

पांडे इस बात से व्यथित हैं कि प्रोजेक्ट टाइगर पिछले 40 वर्षों से चलने के बाद भी बाघों की हत्या नहीं रोकी जा सकी। वह पूछते हैं, ‘‘क्यों नहीं दुनिया की सारी ताकतवर संस्थाएं और लॉबी मिलकर इस काम में अपनी ताकत झोंकती हैं ताकि उस मुल्क में बाघों को बचाया जा सके जहां उन्हें आदर दिया जाता रहा है।’’ उनके अनुसार, ‘‘यह शर्म की बात है कि लगभग सवा अरब लोगों का मुल्क अपने एक हज़ार बाघों की रक्षा नहीं कर सकता। हमें यह सोचना होगा कि हम कहां गलत हैं। बाघों को बचाने की मुहिम में संरक्षित वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को साथ लेना होगा। उनकी रोज़ी-रोटी और उनकी चिंताओं का ध्यान रखना ज़रूरी है।’’

पांडे कहते है कि बाघों की आदत, उनकी आवाजाही और उनके इलाके की सूचना स्थानीय लोगों के पास रहती है। ‘‘ये लोग बहुत गरीब होते हैं। मेरी राय में इन वन क्षेत्रों में रिसॉर्ट चलाने वालों और उन लोगों के लिए जो लॉजिंग और सफारी के लिए हजारों डॉलर वसूलते हैं, ये नियम बना दिए जाने चाहिएं कि उनके स्टाफ में काम करने वाले 70 से 80 फीसदी लोग आसपास के इलाकों के रहने वाले हों। इन लोगों को प्रशिक्षित किया जाए, उन्हें अधिकार दिए जाएं और कारोबार में हिस्सेदार बनाया जाए। एक बार जब इन लोगों को अपने वन क्षेत्र का फायदा मिलने लगेगा तो यही गांव वाले आपको अपने खुद के हितों की रक्षा के लिए एक पुलिस वाले की भूमिका नजर आएंगे।’’
 

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