कायम है आशा की किरण

Submitted by admin on Wed, 07/14/2010 - 15:20
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आज जब युवाओं पर भौतिकवादी होने का आरोप लगाया जाता है, अनेक युवा सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में कार्य करते हुए मिसाल बन रहे हैं। एक ऐसा ही नाम है आलिम हाजी का। अप्रवासी भारतीय आलिम का जन्म एवं शिक्षा अमेरिका में हुई है, लेकिन उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र राजस्थान के झुंझनु जिले के छोटे से गांव बगड़ को चुना है। आलिम के साथ करीब आधा दर्जन युवाओं को टीम ने बगड़ में देश के पहले महिला बीपीओ का आगाज किया है। आप्टीकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके आलिम, कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्रा की डिग्री प्राप्त गगन राणा, अमेरिका की केस वेस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्रा में स्नातक कार्तिक रमण, बेल्जियम में पली-बढ़ी और शिक्षित आशिनी कोठारी एवं बायोटेक्नालजी में स्नातक मुंबई के श्रोत कटेवा चाहते तो किसी भी कारपोरेट कंपनी में नौकरी करके आराम की जिंदगी बसर कर सकते थे। आखिर क्या कारण था कि उन्होंने गांवों की पगडंडियों पर चलना पसंद किया? बहरहाल जो भी हो, इन युवाओं द्वारा शुरू किए गए बीपीओ ‘सोर्स फार चेंज’ में बगड़ की करीब 40 महिलाएं कार्य कर रही हैं। यह बीपीओ देश-विदेश के अपने ग्राहकों को डाटा एंट्री, डाटा मेन्टेनेंस, कान्टेक्ट वेरीफीकेशन जैसी सेवाएं देता है। महिलाओं को घर का काम भी करना पड़ता है, इस बात को ध्यान में रखते हुए 4 एवं 8 घंटों की दो शिफ्ट में काम करने की सहूलियत दी जाती है। संस्था के ग्राहकों में दवा निर्माता रीरामल ग्रुप, प्रथम एनजीओ, सीआईआई, राजस्थान सरकार और अमेरिका की मैरीलैंड यूनिवर्सिटी शामिल है। किसी नए प्रयोग को लेकर स्थानीय ग्रामीणों के मन में तरह-तरह के सवाल उठना लाजमी हैं। बगड़ में सोर्स फार चेंज के संस्थापकों ने भी इसी तरह के सवालों का सामना किया, मसलन- ‘आप यहां क्यों आये हैं? क्या आपको सर्टिफिकेट मिलेगा? बगड़ गांव की महिलाओं को बीपीओ से जोड़ने के लिए आलिम और उनके साथियों को परंपरागत सामाजिक प्रतिरोधों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद आज उन्होंने इस पर फतह हासिल कर ली है और उन्हें बगड़ के लोगों का प्यार एवं सम्मान भी मिलने लगा है।

एक और युवा की बात करे तो वर्ष 2005 में जब सूचना का अधिकार अमल में आया तो शायद ही लोगों को इसके प्रभाव का अंदाजा रहा हो। लेकिन इस बीच सामान्य कद काठी के सांवले से एक युवक ने इसके प्रभाव का आकलन कर लिया। फिर क्या था, आई. आई. टी. इंजीनियर इस युवा ने आईआरएस की नौकरी को गुडबाय कह दिया और सूचना के अधिकार के बूते देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, प्रशासनिक उदासीनता और कालाबाजारी के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। इस मुहिम में दर्जनों स्वयंसेवी संस्थाओं को शामिल कर लिया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में सूचना के अधिकार के तहत हजारों अर्जियां देश भर से आने लगीं। परिणाम यह हुआ कि इस कानून की धार कुंद किए जाने के प्रयास किए जाने लगे। लेकिन उस युवा की अगुवाई में देश भर के गैर सरकारी संगठन लामबंद हुए और सूचना के अधिकार की धार को बचाने के लिए संघर्ष छिड़ गया। बाद में उस उत्साही युवा को इस काम के लिए मैग्सेसे अवार्ड से भी नवाजा गया, जिसे हम अरविंद केजरीवाल के नाम से जानते हैं। अरविंद जैसे युवा आगे नहीं आते तो सूचना का अधिकार जो जनता की आवाज बना है, कब का कूड़े की टोकरी में फेंका जा चुका होता।

समाज के लिए कुछ करने की चाहत रखने वालों युवाओं में ऐसा ही एक नाम शुभ्रा सक्सेना का है। वर्ष 2009 की प्रशासनिक सेवा में अव्वल रहने वाली शुभ्रा का कहना है कि- ‘मैं समाज में हाशिये पर पड़े लोगों के लिए कुछ करना चाहती हूं।’ शुभ्रा सक्सेना शहर-गांव के बीच फैलती खाई, महिला एवं पुरुषों के बीच असमानता एवं दलितों के प्रति किए जाने वाले भेदभाव को लेकर चिंतित नजर आती हैं। आज जब वे भारतीय प्रशासनिक सेवा का एक हिस्सा बन चुकी हैं तो ग्रामीण विकास के अपने सरोकारों को अमली जामा पहनाने के लिए वे कमर कस चुकी हैं।

अंधेरे के साम्राज्य से मुकाबला करने के लिए दिए की एक छोटी सी लौ ही काफी है। आज हमारे देश में भ्रष्टाचार और कुशासन का जो सर्वव्यापी अंधकार फैला है, वह हताश तो करता है, लेकिन जब हम कुछ युवाओं को उससे सीना तान कर लड़ते देखते हैं तो हमें आशा की एक किरण दिखायी देती है। आइए पढ़ते हैं ऐसे ही कुछ युवाओं की कहानी… देवास जिले की जनसाहस नामक संस्था से जुड़े आसिफ शेख और अहमदाबाद की गैरसरकारी संस्था नवसर्जन से सम्बध्द मंजुला प्रदीप ऐसे ही उत्साही युवाओं की जमात का हिस्सा हैं, जिन्होंने समाज की बेहतरी का रास्ता चुना है। दोनों दलित मुद्दों को लेकर कार्य करते हैं। मैला प्रथा उन्मूलन, सामाजिक भेदभाव एवं दलित अत्याचार के अलावा आत्मनिर्भरता की कई कहानियों को इन्होंने अभिव्यक्ति दी है। वड़ोदरा का दिवेर गांव जो कभी पटेल सवर्णों की सामंती व्यवस्था के प्रभाव में था आज, वहां की पंचायत में दलितों का सिक्का चलता है। इसी तरह देवास जिले के अनेक गांवों में दलितों के हक की आवाज बनकर जनसाहस उभरा है और कई मामलों में प्रदेश सरकार को भी झुकना पड़ा है। आसिफ और मंजुला जैसे युवा किसी युवा के लिए प्रेरणास्रोत हो सकते हैं।आईआईएम और आईआईटी के अनेक छात्रों ने समय-समय पर गांवों में जाकर वंचित समुदायों के बीच काम करने की प्रतिबध्दता जाहिर की है। कौशलेन्द्र ऐसे ही सैकड़ों छात्रों की जमात का हिस्सा हैं, जिन्होंने आकर्षक पैकेजों के लोभ को ठुकराकर अपने गृहराज्य बिहार के किसानों के बीच काम करने का निर्णय लिया है। आईआईएम से डिग्री लेने के बाद कौशलेन्द्र ने विस्तृत फील्ड वर्क किया, उन्होंने खेती की तकनीकों को समझा और अंतत: 40 लाख रुपये कर्ज लेकर सब्जी का व्यापार आरंभ कर दिया। उनके इस प्रयास को कमतर नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि उनके काम में एक मिशन का भाव निहित है और वे गरीब सब्जी उत्पादकों, वितरकों एवं मजदूरों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। आज बिहार की अधिकतर आबादी रोजगार की तलाश में पलायन कर रही है, ऐसे में कौशलेन्द्र राज्य में एक सप्लाई चेन तैयार करने में जुटे हैं, जिससे निचले स्तर के उत्पादकों एवं गरीब मजदूरों को फायदा पहुंचाया जा सके और खेती-किसानी की ओर लोगों का रूझान वापस लौट सके।

पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की संस्था इको-प्रो के अध्यक्ष बंडू धोतरे की उम्र होगी करीब 30-32 साल। लेकिन सामान्य से दिखने वाले इस युवा ने दर्जनों स्वयंसेवी संस्थाओं को लामबंद कर चंद्रपुर जिले के 1750 हेक्टेयर में फैले ताडोबा अंधेरी बाघ अभ्यारण्य के बफर जोन को माइनिंग माफिया से बचाने के लिए आंदोलन छेड़ रखा है। उल्लेखनीय है अदानी ग्रुप लिमिटेड को चंद्रपुर जिले के ताडोबा रिजर्व फारेस्ट के बफर जोन में 2 कोल ब्लाक आवंटित किए गए हैं। जिसके लिए राज्य एवं केन्द्र सरकार के अनेक नेता एवं सरकारी मशीनरी भी कंपनी के पक्ष में लाबिंग करने में जुटे हैं। लेकिन देश के सबसे बड़े कोयला आयातक अदानी के रास्ते का काटा बनकर उभरे हैं बंडू धोतरे। बंडू चाहते तो करोड़ो रुपये लेकर आंदोलन समाप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने इसकी बजाय अपने गृह जिले के पर्यावरण, बायोडायवर्सिटी, जल एवं जंगल को तरजीह दी। इसके लिए बंडू दो बार आमरण अनशन पर भी बैठ चुके हैं। उनके इस आंदोलन से चंद्रपुर जिले की जनता जागरूक हुई है और अदानी की माइनिंग पर रोक लगाने की मांग करते हुए लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं। अंतत: केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश को माइनिंग पर रोक लगाने का आश्वासन देना पड़ा है।

इस तरह देखा जाये तो हमारा इतिहास एवं तर्वमान युवाओं की कीर्ति गाथाओं से भरा है। आखिर सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों के बलिदान को कौन भुला सकता है। स्वामी विवेकानंद द्वारा अमेरिका में भरी गई हुंकार की गूंज को क्या भुलाया जा सकता है? युवावस्था में यदि गांधी जी दक्षिण अप्रफीका में नस्लीय भेदभाव को सहकर चुप बैठ गए होते तो क्या स्वाधीनता संग्राम को बल मिल पाता, कतई नहीं! भारतीय युवाओं का जयघोष ऐसे ही गूंजता रहेगा, जो भावी पीढ़ियों को हमेशा सामाजिक सरोकारों की सीख देगा। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 41 फीसदी आबादी युवाओं की है जो देश के विकास में परिवर्तनकारी भूमिका अदा कर सकती है। बशर्ते जरूरत होगी इन युवाओं को शिक्षा एवं रोजगार जैसे बुनियादी अधिकार मुहैया कराने की। बहरहाल, इस ओर सरकार ने कदम बढ़ाया है और शिक्षा का अधिकार कानून पास हो चुका है। लेकिन आज जब शिक्षा कमोडिटी बन चुकी है, ऐसे में शैक्षिक परिवेश एवं उसके प्रभाव में व्यवहारिक समानता कैसे लाई जा सकेगी? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है। शायद किसी युवा को एक बार फिर इस सवाल का जवाब तलाशना और सरकार को एक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना की याद दिलाने के लिए उठ खड़ा होना होगा।

सूचना समाज के दौर में अपने अधिकारों की जानकारी और उसकी मांग करने की सीख ग्रामीणों को देना, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, परिवहन एवं खाद्य सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों पर सबका हक सुनिश्चित करने के लिए अभियान चलाना, समकालीन समाज के मुताबिक पिछड़े लोगों को तकनीक एवं कौशल आधारित उद्यमों से जोड़ना, ग्रामीण उत्पादों के प्रसंस्करण और विपणन के लिए जमीन तैयार करना, स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अवसर पैदा करने जैसे अनेक कार्य हैं। इससे शिक्षित युवा जुड़कर ग्रामीणों एवं वंचित लोगों के जीवन में रोशनी भर सकते हैं। हाल ही में मैग्सेसे एवार्ड से सम्मानित दीप जोशी ने युवाओं की ताकत को काफी पहले ही पहचान लिया था। आज उनकी संस्था ‘प्रदान’ से आईआईटी एवं आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा ग्रहण कर चुके हजारों लोग जुड़े हैं। हमेशा के लिए नहीं, कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की प्रतिबध्दता इन युवाओं ने दिखाई है। जिसका परिणाम यह हुआ कि ‘प्रदान’ आज इस देश के तमाम गैर सरकारी संगठनों के लिए आदर्श बन चुकी है।

एक बात राजनीति में युवाओं की भागीदारी से जुड़ी है। किसी भी समाज में परिवर्तन का मार्ग राजनीति से होकर जाता है। यह विडंबना है कि आज हमारा देश न केवल दुनिया के भ्रष्टतम देशों की जमात में शामिल है, बल्कि हमारे राजनीतिज्ञों ने ओछी राजनीति का परिचय देते हुए समय-समय पर देश की अस्मिता को दांव पर लगाया है। आज हालात यह हो गए हैं कि कोई स्वच्छ छवि का व्यक्ति या फिर शिक्षित युवा राजनीति के दलदल में पैर नहीं रखना चाहता। लेकिन इस तरह से मुंह छिपाने से काम नहीं चलेगा। आज दुनिया की साम्राज्यवादी ताकतें भारत को उभरती हुई ताकत के रूप में नहीं देखना चाहती। इसके लिए तमाम तरह के अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का सहारा लिया जाता है। विडंबना यह है कि हमारी सरकारें अमेरिकापरस्ती से बाज नहीं आती और देश के हितों को ताक पर रखकर ताबड़तोड़ समझौते कर रही है। शिक्षित युवा राजनीतिज्ञों को आगे आना होगा, जिससे देश के प्रति की जाने वाली साजिशों का पर्दाफाश किया जा सके।बात यहां मीडिया की भी करनी होगी। मीडिया में उत्साही और देशभक्त युवाओं की कमी नहीं है। लेकिन मीडिया संस्थानों में अनेक ऐसे लोग कुंडली मारकर बैठे हैं, जो किसी न किसी लाबी का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में जब वे नौकरी छोड़ते हैं तो पूरी टीम खिसक जाती है और उसकी जगह दूसरी लाबी की टीम प्रतिस्थापित हो जाती है। ऐसे में मीडिया संस्थान द्वारा उत्पादित नवांकुर पत्रकार के लिए जगह बनाना आसान नहीं होता। जो जगह बना भी लेते हैं, उनके लिए जीवनयापन के साथ-साथ नौकरी बचाना चुनौती बन जाता है। ऐसे में समाज के लिए कुछ करने का जज्बा मरने लगता है। ऐसे दर्जनों युवा पत्रकारों की पीड़ा को मैंने खुद देखा-सुना है। यह सवाल मैंने कई लोगों से उठाया, इतने चैनल, इतने मीडिया हाउस नित खुल रहे हैं, तो फिर इन युवाओं के समक्ष नौकरी के लाले क्यों हैं? या फिर जिन लोगों के पास नौकरी है भी, वे इतना असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं? जवाब मिला कि नौकरी की कमी नहीं है, कमी है आत्मविश्वास की, कमी है मुद्दों पर आधारित समझ की, कमी है भाषा दक्षता की, कमी है न्यूज सेंस की। आगे उन्होंने कहा कि कोर्स करके डिग्री तो हासिल की जा सकती है, लेकिन पत्रकारिता जिन कारणों से समाज से में स्थान बनाती है, वे कारण युवाओं में विरले ही नजर आते हैं और जिनमें काबिलियत है वे कभी पीछे नहीं रहते और समाज में परिवर्तनकारी भूमिका का सूत्रपात करते हैं।

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