कुज्जन गांव की आपबीती

Submitted by admin on Sun, 07/18/2010 - 13:00
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हम भागीरथी घाटी के निवासी हैं। सदियों से भागीरथी बहती आई है। अब इसे बांधों में बांधा जा रहा है। कहीं सुंरगों में तो कहीं जलाशयों में डाला जा रहा है।

मेरा गांव कुज्जन, मध्य हिमालय के उत्तराखंड में गंगोत्री राजमार्ग से चार किलोमीटर ऊपर भटवाड़ी ब्लाक में है। प्रकृति का भरपूर सौन्दर्य मेरे गांव में बरसता है। गांव में आज भी एकता है। कोई आपसी मुकदमेबाजी नहीं। शराब का चलन भी बहुत कम है। लकड़ी के पुराने सुंदर मकान है। गांव का सारा पंचायती काम मिलजुल कर होता है। गेहूं, कौंदा, राजमा, लहसुन और अनेक तरह कि फसलें होती हैं। बूरांस खूब होता है। जिसका लाल-लाल शर्बत बहुत प्रसिध्द है। गांव के पास ही दयारा नाम का पर्यटन स्थल है। सामने हिमाच्छादित हिमालय नजर आता है। यह क्षेत्र मुलाल, कालीमुर्गी, तीतर, चकोर, बाघ, भालू, गरुड़, बारहसिंघा, बाज जैसे अनेकों पशु-पक्षियों का आवास है। मेहनतकश किसान अपना जीवन सादगी और आनंद के साथ जी रहे थे। पर अब इन सब पर संकट मंडराने लगा है।

हम भागीरथी घाटी के निवासी हैं। सदियों से भागीरथी बहती आई है। अब इसे बांधों में बांधा जा रहा है। कहीं सुंरगों में तो कहीं जलाशयों में डाला जा रहा है। गंगोत्री से बारह किलोमीटर नीचे भैंरो घाटी चरण एक और दो, लोहारीनाग-पाला, पाला-मनेरी, मनेरी-भाली चरण एक और दो, टिहरी बांध, कोटेश्वर बांध फिर कोटली-भेल चरण एक जैसी जल विद्युत परियोजनाएं बनाई जा रही हैं। यहां से बिजली और पानी बाहर जाएगा सुना है हमारे राज्य को भी ढेर सारा राजस्व मिलेगा।दुर्भाग्य से मेरे गांव के नीचे नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन द्वारा जल विद्युत परियोजना का बिजलीघर बनाया जा रहा है। भागीरथी नदी को सुरंग में डाल कर 600 मेगावाट की बिजली परियोजना बनाई जा रही है। हमें तो कुछ मालूम नही था कि बांध से क्या होगा, ना ही हमें बांध के प्रभावों के बारे में बताया गया। बस ये कहा गया कि देश और राज्य का विकास होगा। इसलिए सब स्वीकार करो। मुआवजा मिलेगा, तुम्हारा भी विकास होगा। आज भी सब कुछ देश के विकास के नाम पर कराया जा रहा है। 30-7-04 को हुई बांध की पर्यावरणीय जन सुनवाई में भी हम लोगों के साथ धोखा हुआ था। हमें बताया ही नही गया था कि वो जन सुनवाई क्यों है? उसमें हमारे क्या अधिकार हैं? कौन से कागजात हमें मिलने चाहिएं थे? 2-8-05 को दी गई पर्यावरण स्वीकृति हमें उपलब्ध नहीं कराई गई है। जानकारी छुपाने का मतलब तो यही समझ में आता है कि अधिकारी यह चाहते हैं कि हम लोगों को पता नहीं चले कि क्या प्रभाव होने वाला है? पर्यावरण स्वीकृति मिलने के पहले प्रशासन की चिंता रही कि विस्थापितों को किसी तरह भूमि का मुआवजा देकर पुनर्वास का मामला खत्म कर दिया जाए। पुनर्वास की अन्य मदों का पैसा चालाकी से जमीन के दाम में मिलाकर प्रति नाली एक लाख कर दिया गया। अब स्थिति यह है कि पुनर्वास के अन्य काम हो ही नहीं रहे हैं।

आगे पर्यावरण पर क्या असर होगा पता नहीं लेकिन फिलहाल ये स्थिति है कि बांध निर्माण की मिट्टी (सुरंग से निकलने वाली) बिना किसी नियम कानून के रास्तों व नदी में डाली जा रही है। पूरे कार्य क्षेत्र में धूल है पर कोई छिड़काव भी सही ढंग से नहीं होता। जिससे क्षेत्र के लोगों के जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है। बड़ी संख्या में विस्फोटों को अंजाम दिया जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि मकानों में दरारे आ रही हैं। पत्थर गिरते हैं। गांव के पानी के तीनों स्त्रेत सूखने की कगार पर हैं। बांध निर्माण के दौरान किए जा रहे इन विस्फोटों पर कोई निगरानी नहीं है। बांध बनने की वजह से हमारी सारी चराई की जमीनें खत्म हो गई हैं। महिलाओं को चारे के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है। हरे चारे के ना होने के कारण पशु दूध भी पूरा नही दे रहे हैं। हमारी खाद्य सुरक्षा पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा है। इनका न कोई सर्वे है, न कोई मुआवजा और न ही कोई सुरक्षा। निर्माण मजदूर अपने भोजन आदि की व्यवस्था स्वयं करते हैं जिसके लिए वे जंगल से लकड़ी काटते हैं। इससे हमारे जंगलों पर दबाव बढ़ रहा है। कुज्जन गांव से नीचे सड़क तक आने-जाने में जो चार किलोमीटर का संपर्क मार्ग है उसकी स्थिति बहुत खराब है। 60 बच्चों को नीचे संगलाई स्कूल आने में भी खतरा रहता है। पूरा भुगतान न होने के कारण काश्तकारों को एक वर्ष के ब्याज का नुकसान हुआ है। सड़क व दूसरे कामों में कटने वाले पेड़ों की भरपाई भी नहीं हो रही है। तिहार गांव के नीचे संगलाई स्थित स्कूल की इमारत बनाने के लिए एनटीपीसी के मुख्य प्रबंधक ने पूर्व विधायक व ब्लाक प्रमुख के सामने एक लाख देने की घोषणा की थी। पूर्व विधायक के द्वारा किए गए शिलान्यास का पत्थर अभी भी धूल खा रहा है। कुज्जन से भुक्की सड़क बांध कार्य के कारण ग्रामीणों के लिए आवागमन बहुत मुश्किल हो गया है, खासकर बच्चों के लिए।

पूरी तरह से जमीन का मुआवजा भी अभी नहीं मिल पाया है। प्रभावित भंगेली, सुनगर, तिहार व कुज्जन आदि गांवों के लोग मुआवजे के लिए भटक रहे है। बांध कार्यों के लिए किसानों ने अपनी खड़ी फसल छोड़ी थी। उसका मुआवजा ही नहीं मिला। यह सब पर्यावरणीय स्वीकृति का उल्लंघन है। रोजगार के संबंध में राज्य द्वारा स्थानीय लोगों को 70 प्रतिशत रोजगार देने के राज्य सरकार के नियम-कानून का पालन नहीं हुआ है। पर कौन सुने? स्वीकृति के बाद शासन-प्रशासन बांध कंपनी के साथ खड़ा दिखता है।माटू जनसंगठन द्वारा राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण में दायर अपील पर 7-2-07 को दिए गए आदेश का भी पालन नहीं हो रहा है। इस आदेशानुसार केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रलय के द्वारा एक निगरानी समिति परियोजना के कामों व पुनर्वास के कामों को देखने के लिए बननी चाहिए थी। जो आज तक नहीं बनी। तंग आकर हमने माटू जनसंगठन के बैनर तले 14 अप्रैल से बांध का काम रोका। गांव की महिलाओं ने जबरदस्त धरना चलाया। हद तो तब हो गई जब प्रशासन ने मुकदमे की धमकी दी। गांव के लोगों के सामने कोई चारा नहीं था। हम जेल जाने को तैयार थे। 27 अप्रैल को जिलाधीश से वार्ता हुई। 28 अप्रैल को काम खुला। पर समझौते में लिखा था कि काम किसी सूरत में हम आगे बंद नही कराएंगे और बातों के लिए एनटीपीसी शासन-प्रशासन से अनुरोध करेगी। यहां भी छल हुआ। हमें कहा गया कि बांध से विकास होगा। पर अभी तक तो विकास की पहेली समझ में नहीं आई है। थोड़े दिनों के लिए थोड़े लोगों को नौकरी तो मिली पर कौन सी? वही पत्थर को देखने की।आज हम मजबूर होकर अपनी बर्बादी अपने हाथों से करने को अभिशप्त हैं। पर हमारी गंगा मां तो गई। गांव के आधे से ज्यादा मकान जो सींमेंट के बने हैं, वे दरारों से पटे पड़े हैं। जो किसी भी छोटे भूकंप में धराशायी होंगे। 1991 में आए भूकम्प से मनेरी-भाली चरण एक के ऊपर का गांव जामक तबाह हो गया था। जहां 62 लोग मारे गए थे। हमारा डर वही है। सूखे जल स्रोतों, दरारों वाले कमजोर मकानों और ना जाने कितनी आपदाओं के साये में होगा हमारा भविष्य। हम लड़ तो रहे हैं अपनी ताकत के साथ लेकिन आप भी कभी गंगोत्री आएं तो हमारी घाटी, हमारी गंगा और हमारे गांव की दुर्दशा देख लेना। चूंकि बड़े शहरों और बड़े विकास के लिए ही हम ठगे गए हैं।

संपर्क: कुज्जन, भटवाड़ी,
उत्तरकाशी, उत्तराखंड, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन
 

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