काश, आज बाबा साहब होते

Submitted by admin on Mon, 07/19/2010 - 19:15
Source
13 Apr 2010, नवभारत टाइम्स

सदियां गुजर गईं, पर अपने देश में सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा आज भी चलती जा रही है। आजादी के 62 सालों के बाद भी यह मध्ययुगीन सामंती चलन हमारे कई छोटे-बड़े शहरों और कस्बों से पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। राजगढ़, भिंड, टीकमगढ़, उज्जैन, पन्ना, रीवा, मंदसौर, नीमच, रतलाम, महू, खंडवा, खरगौन, झाबुआ, छतरपुर, नौगांव, निवाड़ी, सिहोर, होशंगाबाद, हरदा, ग्वालियर, सागर, जबलपुर जैसे मध्य प्रदेश के अनेक शहरों में इंसान आज भी सिर पर मैला ढोने, शौचालयों की सफाई करने और मरे हुए कुत्ते-बिल्लियों और मवेशियों के शवों को उठाकर ले जाने फेंकने का काम करते हैं। ऐसे काम करने वालों को समाज में तुच्छ और घिन की दृष्टि से देखा जाता है। वे आज भी दूसरों की तुलना में दयनीय हैं और इन्हें समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग रखा जाता है।

इस अमानवीय प्रथा के जरिये दलित समाज के अनेक लोग अपना पेट भर रहे हैं। आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं होने के कारण इन्हें इसी के भरोसे जिंदा रहना पड़ता है। कौन इन्हें आजाद भारत में फिर से आजादी दिलाएगा? काश! आज बाबा साहिब होते।

मध्य प्रदेश के ही महू शहर में जन्मे बाबा साहिब भीमराव आंबेडकर ने अछूतों को दलित नाम देकर समाज में ऊपर उठाने का प्रयास किया। उन्होंने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान की रचना की और इस तरह एक अलग इतिहास रचा। गरीब तबकों और पिछड़े वर्ग के हित में उन्होंने सभी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का अधिकार, बोलने का अधिकार, स्वंतत्रता का अधिकार और मानव अधिकार को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया। जात-पांत, रंग-रूप, नस्ल, भाषा, संस्कृति, परंपरा, क्षेत्र आदि संकीर्ण विचारधाराओं एवं विभाजनों को लांघकर धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और असांप्रदायिक राष्ट्र के गठन के लिए कार्य किया। लेकिन हम उन्हें 14 अप्रैल को याद कर भूल जाते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो भारत का विकसित राष्ट्र बनने का सपना अधूरा ही रह जाएगा।

पिछले साल मानव अधिकार आयोग के एक सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश में सिर पर मैला ढोने वालों की संख्या 7000 बताई गई, लेकिन इस संदर्भ में सरकारी अधिकारियों ने साफ-साफ रेकॉर्ड देने से हाथ झाड़ लिया। सरकारी एवं गैरसरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन के समय दलित समुदायों के बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। उन्हें अलग बिठाकर, घर से लाए गए बर्तनों में खाना देकर भोले-भाले बच्चों तक में छुआछूत की भावना पैदा की जा रही है। समाज में ऐसे शोषित बच्चों के साथ मनमाना व्यवहार करके दबंग लोग उनसे जबरन काम करवाते हैं।

इस तरह के रहन-सहन का कारण क्या हो सकता है? क्यों मैला ढोने वालों के साथ न्याय नहीं हुआ? मध्यकाल से चली आ रही इस सामंती प्रथा पर रोक क्यों नहीं लगाई गई? आखिर, इन इंसानों के साथ किस लिए नीचतापूर्ण व्यवहार किया गया? इसका एकमात्र कारण समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था है। अगर दलित समाज के लोग पढ़-लिख गए होते, ऊंचे पदों पर अधिकृत हो गए होते तो मैला ढोने के लिए कौन बचता।

भारत सरकार ने दूसरी पंचवषीर्य योजना में सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने के लिए राज्य सरकारों और स्थानीय नागरिक संस्थानों को निर्देश दिया था कि वे नागरिकों को आधुनिक फ्लश शौचालय बनाने के लिए प्रोत्साहित करें। इसके लिए वित्तीय प्रावधान भी किए गए थे। 1971 में भी भारत सरकार ने योजनाबद्ध तरीके से इस कुप्रथा रोकने का प्रयास किया। 1993 में सरकार ने सफाई कर्मचारी नियोजन और शुल्क शौचालय निर्माण अधिनियम लागू किया। दलित बच्चों को शिक्षित और साक्षर बनाने के लिए विशेष छात्रवृत्ति देने की घोषणा की, रोजगार आदि जैसे कई कानून लागू किए, परंतु भेदभाव आज भी जारी है।

कई अनुसूचित जातियों और जनजातियों में आने वाले पिछड़े वर्ग और दलितों में आने वाले विभिन्न समाज के लोगों से इस तरह का काम कराया जाता है। हिंदुओं में वाल्मीकि समाज और मुसलमानों में हेला समाज के गरीब लोग सिर पर मैला ढोने का काम करते हैं। इस बदलते समाज को उस भोर की तलाश है जब मैला ढोने वाले इस अभिशाप से मुक्त होंगे और समाज में सम्मानपूर्वक औरों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाएंगे।
 
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