गंगा का प्रवाह

Submitted by admin on Thu, 07/29/2010 - 08:14
Source
वीएचवी। 22 जुलाई, 2010

एक राष्ट्र के रुप में भारत के अस्तित्व का आधार धर्म है। भारत एक राजनीतिक इकाई होने के साथ ही एक सांस्कृतिक इकाई भी है। विभिन्न स्तरों पर दिखने वाली विविधता के बावजूद संस्कृति का अन्तःप्रवाह सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोए हुए है। भारतीय संस्कृति का अन्तःप्रवाह कुछ प्रतीकों, आदर्शो एवं प्राकृतिक उपहारों से निरंतर ऊर्जा ग्रहण कर अपने आप को प्रवाहमान बनाए हुए है। गंगा का अविरल प्रवाह भी एक ऐसा ही ऊर्जा केन्द्र है जिससे भारतीय संस्कृति निरंतर पोषित होती रही है। गंगा के अविरल प्रवाह और भारतीय संस्कृति की गतिशील सनातन धारा में अद्भुत समानताएं हैं।

गंगा और भारतीय संस्कृति दोनों के प्रवाह में कई वाह्य धाराएं आकर मिलती हैं। विपरीत प्रकृति के वाह्य प्रवाहों से दोनों असहज और आतंकित नहीं होतीं, उनका स्वागत करती हैं। अपनी मूल प्रवृत्तियों को छोड़े बिना वाह्य धाराओं की अच्छाइयों को आत्मसात करती हैं और उन्हें अपने उदात्त मूल्यों से दीक्षित भी। भारतीय संस्कृति और गंगा दोनों के प्रवाह में वाह्य तत्वों के प्रति भय (जीनोफोबिया) नहीं है। दोनों वाह्य आगंतुकों का आगे बढ़कर स्वागत करती हैं और मिलन बिंदुओं को पवित्र तीर्थ बना देती हैं। गंगा के प्रवाह में जहां कहीं भी किसी दूसरी नदी की जलधारा मिलती है वहां तीर्थ बन जाता है। इसी प्रकार भारतीय संस्कृति ने भी बाहर से आने वाली सभी संस्कृतियों को अपने मूल गुणों को बदले बिना आत्मसात किया और निरंतर प्रवाहमान बनी रही।

इस बिंदु पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि दोनों प्रवाहों के स्रोंतो के सुरक्षित रहने और मूलधारा के प्रवाह के मात्रात्मक एवं गुणात्मक दृष्टि से अधिक वेगवान बने रहने पर ही आत्मसात करने की प्रक्रिया सुचारु रुप से चल पाती है। मूलधारा का प्रवाह वेग कम होने पर वाह्य धाराएं सम्पूर्ण प्रवाह को ही प्रदूषित कर सकती हैं, कर देती हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति और गंगा दोनों के मूल स्रोत विभिन्न कारणों से सुरक्षित नहीं रह गए हैं और इनकी प्रवाह प्रबलता में भी कमी आयी है। इस कारण गंगा और भारतीय संस्कृति दोनों को प्रदूषण ने अपने शिकंजे में ले लिया है और दोनों पर ही संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

गंगा का भारतीय संस्कृति के मूलभूत आदर्शो और मूल्यों के सृजन की प्रक्रिया और इन उदात्त मूल्यों के सातत्य से भी अटूट सम्बंध है। गंगा का तट और हिमालय की गुफाएं सदैव से ही साधकों के लिए आदर्श परिवेश उपलब्ध कराती रही हैं। सृष्टिपुराण के पद्मखंड में गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी, उमा, शक्तिबीजा, तपस्या की अधिष्ठात्री देवी और धर्मद्रवा के रुप में मां गंगा के सात रुप बताए गए हैं। माना जाता है कि इन सभी देवियों की शक्तियां गंगा में एक साथ निहित हैं। ये सभी देवियां शक्ति और साधना का प्रतीक हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह कहा जा सकता है कि गंगा का प्रवाह अपने साथ शक्ति और साधना का प्रवाह समाहित किए हुए है। इसीलिए संतों को साधना के लिए गंगातट आकर्षित करते रहे हैं।

उच्चतम सत्य के साक्षात्कार के लिए प्राचीन काल से ही साधक गंगा के तट पर साधना करते रहे हैं। गंगा के तट ने भारतीय संस्कृति के मूलभूत आदर्शों को गढ़ने के साथ उनको सातत्य भी प्रदान किया है। इसी कारण भारतीय संस्कृति की मूलधारा में विचलन और स्खलन आने पर गंगा की आबोहवा से कोई न कोई व्यक्ति अथवा विचार उठ खड़ा होता है। और भारतीय मूल्यों की मूल भावना को प्रतिपादित और स्थापित करता है।

गंगा भारतीयों को सतत रुप से उनकी अस्मिता और पहचान का स्मरण दिलाती है। गंगा आत्मसाक्षात्कार का दर्पण है। वह भारत के जनमानस को इस बात की अनुभूति दिलाती है कि तुम क्या हो और तुम्हें कहां जाना है। गंगा अनावश्यक मानसिक, आध्यात्मिक और चारित्रक विचलनों को रोककर व्यक्ति को अपने अंदर निहित ऊर्जा को सही दिशा में निवेश के लिए प्रेरित करने वाली एक प्रेरणा है। गंगा हमें आंतरिक संसाधनों के दुरुपयोग के प्रति सावधान करती है। आन्तरिक ऊर्जा के इस बेहतर प्रबंधन के कारण ही भारत ने आध्यात्मिक तथा सांसारिक जगत में नई ऊचाईयों को स्पर्श किया।

मां गंगा भारतीय संस्कृति के मूल प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए भारत द्वारा की गयी सतत साधना का प्रतीक हैं। गंगा भारतीयों को उनके चरम लक्ष्य की याद दिलाने वाली दिशादर्शक है। गंगा समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का स्मरण दिलाकर उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए हमारी प्रेरणा हैं। गंगा भारतीय तत्वों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए एक आधारभूमि उपलब्ध करवाती हैं। बाजारीकरण के वर्तमान दौर में भारतीय संस्कृति में कई अवांछनीय और निकृष्ट तत्वों ने प्रवेश पा लिया है। ऐसे में भारतीय संस्कृति के मूल स्वरुप को पहचानने और स्थापित करने के लिए हमको 'हर-हर गंगे' का घोष करते हुए गंगा का आवाहन करना होगा।

मां गंगा का प्रवाह केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए ही मूल्यवान नही है। गंगा का प्रवाह लोकसंस्कृति में भी रच-बस गया है। भारतीय लोक का गंगा से सम्बंध डुबकी मारकर पाप धोने तक सीमित नहीं है। इस प्रवाह के प्रभाव का रिसाव लोकांक्षाओं, लोकपरम्पराओं और लोकगीतों तक हुआ है। आध्यात्मिक सिद्धि के लिए ही नहीं, सांसारिक सुख और समृद्धि के लिए भी आम भारतीय मां गंगा से 'मनौती' मानता है- “हे गंगा मैया! तोहे चुनरी चढ़ैबे.. की टेर के साथ आम भारतीय अपनी कामनापूर्ति के लिए मां गंगा से याचना करता है।

वृक्षों में प्रथम बार लगने वाले फलों को गंगा जी को समर्पित करने की परम्परा रही है। भारतीय जनमानस इस बात की कल्पना ही नहीं कर सकता है कि गंगा का प्रवाह कभी अवरुद्ध हो सकता है अथवा गंगा जी लुप्त हो सकती हैं। इसीलिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में विवाह सम्पन्न होने के पश्चात आज भी उपस्थित लोग वर-वधू को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि - अचल होहिं अहिवात तुम्हारा, जब लगि गंग जमुन जल धारा। इन पंक्तियों से लोकमानस में गंगा के अविरल प्रवाह की कल्पना और गंगा के प्रति श्रद्धा दोनों का एक साथ बोध होता है।

हिन्दू कर्मकाण्डों के समुचित निष्पादन में गंगाजल से होने वाले पवित्रीकरण का विशेष महत्व माना जाता है। मांगलिक अनुष्ठानों, पूजा, यज्ञ, संस्कारों आदि के दौरान घर, पूजास्थल, पूजन सामग्री और व्यक्ति के पवित्रीकरण के लिए गंगा जल छिड़का जाता है। मृत्यु के समय मुंह में तुलसी पत्र और गंगाजल डालकर आत्मा की मुक्ति की कामना की जाती है। मृत्यु के बाद दाह संस्कार भी गंगा के तट पर किया जाता है। और अस्थि विसर्जन भी। इस प्रकार हम देखते है कि गंगा का सम्बंध जन्म से लेकर मृत्यु तक बना रहता है।

इसी प्रकार पूर्णिमा, अमावस्या, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, मकर संक्राति, गंगा दशहरा, हरिशयनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी के अवसर पर भी आम भारतीय गंगा स्नान को अपना परम पुनीत कर्तव्य समझता है। ऐसे अवसरों पर दान-दक्षिणा देने की भी परम्परा है। संतो के साथ समागम का भी लाभ आदमी उठाता है। इस परिप्रेक्ष्य में हम कह सकते हैं कि गंगा लौकिक और आध्यात्मिक रुप में भारत में चलने वाली दो ज्ञानधाराओं के संगम के लिए अवसर उपलब्ध कराती है। दोनों धाराओं का एक-दूसरे से आदान -प्रदान होता है। यह प्रक्रिया दोनों को ही परिष्कृत करती है और सांस्कृतिक प्रवाह स्वस्थ रुप में सतत गतिशील बना रहता है।

गंगा उपमा और रुपक के रुप में भी भारतीय लोकमानस और उसकी भाषा में विद्यमान हैं। किसी की पवित्रता गंगा जल जैसी होती है तो किसी का सान्निध्य गंगा में डुबकी लगाने के बाद आयी निर्मलता के समान है। तो कोई गंगा के समान प्रभावित हुए बिना सब को अपने में समाहित कर आगे बढ़ता रहता है।

इस प्रकार गंगा के प्रवाह और भारतीय संस्कृति के प्रवाह में कोई विभेदक रेखा नहीं खीची जा सकती। दोनों प्रवाह अपनी विशेषताओं को रेखांकित करने के लिए एक-दूसरे का रुपक के रुप में सहारा लेते हैं, अर्थात गंगा के बारे में कहा जाता है कि उसका प्रवाह भारतीय संस्कृति की भांति अजस्र है वहीं भारतीय संस्कृति के बारें में कहा जाता है कि वह गंगा जैसी प्रवाहमान है। भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य से यदि गंगा को विलुप्त कर दिया जाय तो इतनी बड़ी रिक्तता पैदा हो जाती है कि भारतीय संस्कृति का स्वरुप ही कल्पना से बाहर हो जाता है।
 
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