ग्रीनपीस और पर्यावरण

Submitted by admin on Fri, 07/30/2010 - 07:41
Source
अमर उजाला

ग्रीनपीस की सह संस्थापक डोरोथी स्टोव के निधन से पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रही इस संस्था का एक मजबूत स्तंभ ढह गया है। यह उन्हीं की पहल का नतीजा है कि आज यह संस्था अपने लगभग २० लाख ८० हजार सदस्यों के साथ दुनिया के ४० मुल्कों में पृथ्वी को बचाने के लिए प्रयासरत है।

ग्रीनपीस एक गैर-सरकारी संस्था है, जिसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय नीदरलैंड के एमस्टर्डम में है। इसकी नींव वर्ष १९६८ में कनाडा के वैंकूवर में पड़ी, जब अमेरिका ने अलास्का में कई परमाणु परीक्षण करने की घोषणा की। इस परीक्षण का विरोध करने के लिए करीब दर्जन भर पुरुष और महिलाओं ने ‘डोंट मेक ए वेव कमेटी’ के बैनर तले अलास्का के एमचिटका द्वीप तक नाव से यात्रा करने का निश्चय किया। इस आंदोलन का नेतृत्व फीलिस कॉरमेक, डोरोथी स्टोव, जिम बोहलेन, बॉब हंटर जैसे युवा कर रहे थे। इन लोगों ने जिस नाव से यात्रा करने की ठानी, उसे ग्रीनपीस नाम दिया। वर्ष १९७१ में नाव जब जाने को तैयार हुई, तो अमेरिकी सैनिकों ने सभी को गिरफ्तार कर लिया। इस तरह नाव अलास्का तो नहीं पहुंच सकी, पर इसने जो माहौल तैयार किया, उससे अमेरिका को अलास्का में परीक्षण बंद करना पड़ा। मई, १९७२ में इस संस्था ने आधिकारिक रूप से अपना नाम बदलकर ग्रीनपीस रख लिया और पर्यावरण संरक्षण पर काम करने लगी।

इस संस्था को अंतरराष्ट्रीय पहचान १९८० के दशक में मिली, जब फ्रांस की खुफिया एजेंसी ने इस संगठन के नाव रेनबो वारियर पर बम गिराकर नष्ट कर दिया था। असल में, ह्वेल का शिकार रोकने और जहरीले कचरे के फैलाव के विरोध में ग्रीनपीस ने कई देशों में आंदोलन चलाया था, जिसकी सफलता फ्रांस के लिए नुकसानदेह साबित हो रही थी। बहरहाल, सभी जैव-विविधताओं के पालन-पोषण के लिए पृथ्वी के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के अपने मिशन को लेकर ग्रीनपीस आज भी संघर्षरत है।
 
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