भोपाल ताल

Submitted by admin on Mon, 08/02/2010 - 16:01
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Source
‘बूँदों की संस्कृति से साभार’, सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरनमेंट, नई दिल्ली, 1998


तटबंध: भोपाल में अभी तक मौजूद 11वीं सदी के तटबंध का कुछ भाग, मध्यकालीन कौशल का अद्भुत उदाहरण राजा भोज द्वारा बनवाया ताल दो पहाड़ियों के बीच तटबंध से बना था। इसमें 365 स्रोतों से पानी आता था।भोपाल ताल का निर्माण राजा भोज ने करवाया था। परमार वंश के इस राजा ने 1010 से 1055 ई. तक राज किया। राजा भोज ने जो ताल बनवाया था वह काफी विशाल रहा होगा। आज भी यह छोटे आकार में मौजूद है। इसका महत्व कितना है यह इस दोहे से प्रकट होता हैः

“ताल तो भोपाल ताल, और सब तलैया।
रानी तो कमलावति, और सब रानैया।
गढ़ तो चित्तौड़गढ़, और सब गड़हिया।
राजा तो रामचंद्र, और सब रजैया।’’


पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि भोपाल ताल वास्तव में विशाल था। पारंपरिक कथा के अनुसार, राजा भोज ने दो पहाड़ियों के बीच बांध बनवाकर भोजपाल नामक विशाल ताल बनवाया था। इस ताल के निर्माण को लेकर जो किंवदंतियां हैं वे काफी दिलचस्प हैं। इतिहासविद् और पुरातत्वविद् डब्ल्यू. किनकैड ने ताल के इतिहास का सर्वेक्षण करने के बाद इस किंवदंती का जिक्र किया है कि राजा भोज एक बार बहुत बुरी तरह बीमार पड़ गए और दरबारी वैद्य-चिकित्सक भी उनका इलाज न कर पाए। एक साधु ने भविष्यवाणी की कि अगर राजा भारतवर्ष में सबसे बड़ा ताल, जिसमें 365 झरनों का पानी आकर जमा होता हो, नहीं बनवाएंगे तो इस गंभीर बीमारी से उनकी मृत्यु हो जाएगी।

कुशल कारीगरों को विंध्य क्षेत्र की घाटियों का सर्वेक्षण करने और ऐसा ताल बनाने की संभावना तलाशने को कहा गया। अंततः बेतवा नदी के इर्दगिर्द के पहाड़ी क्षेत्र का पता लगा, लेकिन पाया गया कि केवल 356 झरनों का पानी इस घाटी में बहता था। इस मुश्किल का समाधान गोंड सरदार कालिया ने खोजा। उन्होंने बताया कि एक लुप्त नदी है जिसकी सहायक नदियां अपेक्षित संख्या को पूरा करती है उस नदी का नाम कालियासोत रख दिया गया और आज तक वह इसी नाम से जानी जाती है।

किनकैड के मुताबिक, यह किंवदंती दो महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर इशारा करती है- बेतवा के स्रोतों का अपवहन क्षेत्र ताल को भरने के लिए अपर्याप्त था, ताल बेहिसाब बड़े आकार का बना। किनकैड के विश्लेषण के मुताबिक, स्थानीय क्षेत्र और निर्माणों के अवशेषों के अध्ययन से साफ होता है कि उस समय के इंजीनियरों ने 32 किमी. दूर पश्चिम में दूसरी नदी के पानी को बेतवा में मोड़ दिया था। ऐसा भोपाल में दैत्याकार बांध बनाकर किया। इस तरह बने जलाशय से एक नदी पुराने बहाव से नब्बे डिग्री पर बहाई गई जो पहाड़ियों से होते हुए बेतवा घाटी में पहुंची। यह एक महत्वपूर्ण पूरक नदी बन गई। कालियासोत नदी इसके अतिरिक्त पानी को बरसात खत्म होने के तीन महीने बाद तक बड़े ताल में पहुंचाती थी।

किनकैड ने पता लगाया कि उन्होंने जिस बंधारा का पता लगाया था उससे लेकर भोपाल रेलवे लाइन की ऊंचाई तक बांध जैसा बना था। जब भोपाल-मालवा क्षेत्र सर्वेक्षण नक्शे को देखा गया तो पाया गया कि पुराना ताल 65,000 हेक्टेयर में फैला था। तब यह भारतीय प्रायद्वीप में सबसे बड़ा कृत्रिम ताल था-विशाल जल सतह के बीच छोटे-छोटे द्वीप इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते थे। कहीं-कहीं यह 30 मीटर तक गहरा था और चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा था।

बंधारा निचली पहाड़ियों के चट्टान से होकर भी गुजरा है। यह तिकोनी घाटी के शीर्ष पर बना है और बड़े बांध से करीब 3 किमी. दूर है। किनकैड के मुताबिक, बांध से इसकी इतनी दूरी उस समय के इंजीनियरों के कौशल का प्रमाण है। सतह चुनने में थोड़ी-सी चूक से बांध टूट सकता था जो दोनों तरफ से चट्टान की बाहरी सतह से बना था मगर उसके अंदर मिट्टी भरी थी और यह पानी के भारी बहाव को ज्यादा दिनों तक बर्दाश्त नहीं कर सकता था। दूसरा बांध घाटी के दूसरे एकमात्र निकास पर बना था और यह कालियासोत को 90 अंश पर मोड़कर बेतवा की ओर बहा देता था।

इस ताल को 1434 ई. में कभी होशंग शाह (1405-1435 ई.) ने तुड़वाया। इसका जिक्र उस समय के इतिहासविद् साहिब हकीम ने माअसिर-ए-महमूद शाही में किया है। भोजपुर में शिव मंदिर के पास मेंडुआ में इस तोड़फोड़ के निशान देखे जा सकते हैं। होशंग शाह के सैनिकों ने बेतवा पर बने बांध को भी तोड़ा। भोपाल में तटबंध अभी भी बचा हुआ है और दोनों ताल भी अपने वर्तमान छोटे आकारों में हैं। दरअसल, भोपाल में ऊपरी ताल और निचली ताल कोटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित ऊपर और नीचे के स्तरों पर बने तालाबों की याद दिलाते हैं। कहा जाता है कि तटबंध तोड़े जाने और ताल के सुखने के बाद मालवा की जलवायु में परिवर्तन आ गया और विदिशा शहर पर बाढ़ का खतरा और बढ़ गया।
 

 

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