नवदर्शनम् : एक गृहस्थ की ऋषि खेती

Submitted by admin on Mon, 08/16/2010 - 16:18

ऐसा नहीं कि जैविक खेती में कोई परेशानियां नहीं होतीं। इनसे बचने के जैविक खेती के अपने तरीके हैं, जो आश्चर्यकारक ढंग से कारगर हैं। उनमें भी अहिंसा भाव है। नहीं तो क्या यह संभव है कि जहां सामान्य खेती में कीट-खरपतवारनाशक हैं, जैविक खेती में यही काम करने वाले पदार्थ को जीवामृत कहा जाए?

अब उनके हाथ-पैर में खेत की मिट्टी लगी रहती है। अभी कुछ ही बरस पहले तक वे अमेरिका की कंप्यूटर कंपनियों में तरह-तरह के यंत्रों से घिरे रहते थे। नाम है इनका टी.एस. अनंतू। देश के सबसे ऊंचे माने गए तकनीक संस्थान आई.आई.टी. से कंप्यूटर का पूरा व्यवहार और दर्शन पढ़कर वे निकले थे। कोई 30 बरस पुरानी बात होगी यह। उन दिनों देश में कंप्यूटर की कोई खास जगह थी नहीं। इक्के-दुक्के कंप्यूटर एक अजूबे की तरह कुछ गिनी-चुनी जगहों पर रहे होंगे। ऐसे में अनंतूजी यहां करते भी तो क्या करते। वे अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने आई.बी.एम. और जैराक्स जैसी प्रसिद्ध कंपनियों में कंप्यूटर इंजीनियर की तरह काम किया। तन तकनीकी सेवा में दिन-रात लगा था पर उनका मन उस काम में रम नहीं रहा था। मन कहता था कि अपने वतन में ही कुछ करना है।

उन्होंने अपने मन की बात सुनी। वापस भारत लौट आए। कुछ दिनों तक दिल्ली में एक व्यावसायिक, फिर भी बहुत ही पारदर्शी कंपनी में काम किया। यहां वे प्रसिद्ध गांधीवादी अर्थशास्त्री श्री लक्ष्मीचंद जैन के संपर्क में आए। श्री जैन ने उन्हें गांधी शांति प्रतिष्ठान से परिचित कराया। वे दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से, विज्ञान और टैक्नोलॉजी का प्रसार करने में जुट गए तथा इनका जीवन और जीवन को आधार देने वाले अध्यात्म से क्या संबंध है- इस खोज में लग गए। इसी दौरान उन्होंने अपनी पुरानी संस्था आई.आई.टी. में अनेक युवा वैज्ञानिकों को समाज के, जीवन के कुछ गहरे प्रश्नों से जोड़ने का सुंदर काम खड़ा किया। इन्हीं कुछ मित्रों ने उनके प्रभाव से अपनी कीमती मानी गई आई.आई.टी की पढ़ाई और नौकरी भी छोड़ी तथा अपने गांवों में लौटकर खेती करने लगे। फिर अनंतूजी भी इस प्रयोग को करते-करते स्वयं भी इसी तरफ ऐसे मुड़े कि उन्हें गांधी शांति प्रतिष्ठान भी मंजिल नहीं, एक पड़ाव जैसा ही लगा।

कुछ ही समय बाद अनंतूजी ने बंगलोर से 48 किलोमीटर दूर तमिलनाडु की सीमा में जमीन खरीदी। वह ऊसर बियाबान का विस्तार था। पूरे 120 एकड़ का। उनकी पंद्रह वर्षों की तपस्या का जो फल आज वहां देखने को मिल रहा है, वह है ऋषि-खेती का नवदर्शन।

यही है उनकी संस्था का नामः नवदर्शनम्। हल्दी, केले, आम, नींबू के अलावा सब्जियों और अनाज की भरी-पूरी खेती इस इलाके में सचमुच ही दर्शनीय है। बीच के 32 एकड़ में सामूहिक जीवन। एक ही रसोई का खाना और साथ रहना। कोई चाहे तो अपने दो कमरे अलग से बना सकता है। उन पर ताला नहीं पड़ सकता। एक की अनुपस्थिति में दूसरा उसका उपयोग कर सकता है। 32 एकड़ के बाहर के क्षेत्र में अपना ताला, अपनी रसोई की अनुमति है, लेकिन वहां मुफ्त की बिजली नहीं मिलेगी जो भीतर के हिस्से में 24 घंटे उपलब्ध है। और यह सारी बिजली नवदर्शनम् में बहने वाली हवा से, यहीं के गोबर से और यही चमकने वाले सूरज से बनती है।

यह सारी बिजली नवदर्शनम् में बहने वाली हवा से, यहीं के गोबर से और यही चमकने वाले सूरज से बनती है। जैविक खेती और सामुहिक जीवन को दिवास्वप्न कहने वालों के लिए नवदर्शनम् एक उदाहरण है। साकार हुए स्वप्न को खुली आंखों से दिखाने वाला।

जैविक खेती और सामूहिक जीवन को दिवास्वप्न कहने वालों के लिए नवदर्शनम् एक उदाहरण है। साकार हुए स्वप्न को खुली आंखों से दिखाने वाला। नवदर्शनम् पूर्व वैज्ञानिक रहे और अब योजना आयोग के सदस्य प्रोफेसर वीरेंद्रलाल चोपड़ा के कहे को सच साबित करता है कि जैविक खेती को अपनाकर उच्च स्तर पर सातत्य बनाए रखना संभव है। यहां उगाए हुए फलों की चटनियों, मुरब्बों और दलिए वगैरह की बंगलोर के स्कूलों और बाजार में हर महीने जो खपत है, उसका मूल्य एक लाख रुपयों से ऊपर है।

ऋषि-खेती के इस तरह के नामकरण के पीछे ऋषि-मुनियों की जीवन-शैली की झलक तो है ही, इसके सात्विक फल के लिए तपस्या भी आवश्यक है। इसकी पद्धतियों की खोजबीन के लिए वेदों में जाने की जरूरत नहीं है। अभी इतना जान लेना काफी और रुचिकर होगा कि 1930-40 के आस-पास मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में ही इसे व्यावहारिक रूप दिया गया था। अंग्रेज लाट साहब अल्बर्ट हॉवर्ड और उनके साथियों ने इंदौर के कृषि महाविद्यालय के इलाके में इंडियन प्लांट इंस्टीट्यूट नाम से संस्था बनाकर इस तरह की खेती का मोटा-मोटा तरीका तय किया था। पत्तियों को सड़ाकर खाद बनाने की ‘इंदौर शैली’ आज दुनिया भर में प्रसिद्ध है। अपनी इंदौर यात्रा में गांधीजी भी इसे देखने आए थे। उन्हें इसमें अहिंसा दिखाई दी।

जैविक खेती का अर्थ ही जमीन के भीतर के जीवों को इसका आधार बनाना है। इसमें हल चलाने, रासायनिक खाद या कीटनाशक डालने की गुंजाइश नहीं है। जमीन के अंदर केंचुए और पेड़-पौधों की जड़े वैसे ही दिन-रात हल चलाने और हवा पहुंचाने का काम करते रहते हैं। किसी भी रूप में डाले हुए रसायन मिट्टी की रूप-रचना बिगाड़ते ही हैं। साल-दर-साल अधिक फसल के लिए बढ़ी हुई मात्रा में उर्वरक और दवाइयां पचाकर गब्बर होते जाते कीड़ों को मारने के लिए डाले गए कीटनाशक एक हद के बाद बेअसर हो जाते हैं। इनका जहर मनुष्य को ही मारने के लिए लौट आता है।

ऐसा नहीं कि जैविक खेती में कोई परेशानियां नहीं होतीं। इनसे बचने के जैविक खेती के अपने तरीके हैं, जो आश्चर्यकारक ढंग से कारगर हैं। उनमें भी अहिंसा भाव है। नहीं तो क्या यह संभव है कि जहां सामान्य खेती में कीट-खरपतवारनाशक हैं, जैविक खेती में यही काम करने वाले पदार्थ को जीवामृत कहा जाए? तब बात आकर टिकती है मनुष्य के धीरज पर। जो काश्तकार 3 वर्ष तक संयम बरत सकते हैं, उन्होंने पाया है कि इतने समय में कीड़े अपने आप कम हो जाते हैं। यह अनुभव करने के लिए दूर दक्षिण में जाने की आवश्यकता नहीं है। मध्यप्रदेश में मंडलेश्वर के पास राजीव बरुआ या बजवाड़ (नेमवर) में दीपक सजदे के खेतों में जैविक खेती के प्रभाव को देखा जा सकता है। इस खेती में जोर स्वस्थ पर्यावरण में ताकतवर फसल लेने पर है।

ऋषि-खेती केवल एक पद्धति नहीं, पूरी जीवन शैली है। इसमें गाय-बैल, मुर्गी-बकरी पालन की भी भूमिका है। जमीन को खाली छोड़ने या अदला-बदली कर फसलें लेना इसका आधार है। हर वर्ष नकद फसलें उगाने का मोह कारण बनता है महाराष्ट्र, आंध्र, केरल, कर्नाटक की घटनाओं का। दुर्घटना के बाद विदर्भ के पढ़े-लिखे किसान स्वीकार करते हैं कि कपास और जुवार की अलटा-पलटी उत्पादन और मिट्टी की सेहत के लिए श्रेष्ठ है। लेकिन अपने ही भले के लिए उन्हें शासन से घूस (सबसिडी) की दरकार है। नए विदेशी कपास से होने वाली आमदनी उनकी दृष्टि पर इस तरह परदा डाल देती है कि वे यह चेतावनी नहीं पढ़ पाते कि आयातित बीज केवल सिंचित खेती के लिए हैं।

इंग्लैंड की कपड़ा मिलों को देखने के बाद जो बात गांधीजी की समझ में आई, वह यह थी कि कम लंबाई के रेशे वाला कपास ही भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल है। सूत कताई गांधीजी के लिए स्वराज का हथियार तो था ही, उनकी जीवन-शैली का भी हिस्सा था। इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं लगाना चाहिए कि जैविक खेती करने वाला मोटा-झोटा पहने और उसके बच्चे ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई करें।

नवदर्शनम् में लगी पवनचक्की दिन-रात खूब चलती है और सोलर पेनल खूब तपते हैं। इन दोनों से इतनी बिजली बनती है कि नवदर्शनम् के सादे सुंदर मकान, भवन रोशन होते हैं और कंप्यूटर- रेफ्रिजरेटर पूरे समय चलते रहते हैं। बायोडीजल से पंप चलते हैं। विज्ञान की खोजों सुविधाएं जुटा सकती हैं, अच्छे व्यापारी बना सकती हैं। खेती का सीधा संबंध समृद्ध भूमि से है और प्रकृति के साथ समरस होना इसका सरल उपाय है।

श्रीपाद अच्युत दाभोळकर महाराष्ट्र के ऐसे ही एक काश्तकार थे। तासगांव में उनकी शुरुआत का परिणाम था कि कुछ ही वर्षों में प्रदेश से अंगूर का निर्यात 200 करोड़ रुपयों के पार निकल गया। मध्यप्रदेश शासन ने उन्हें भोपाल आमंत्रित किया। सेमिनार और व्याख्यान हुए। कृषि के कर्ताधर्ता सारी व्यवस्था उनके हाथ सौंपने के लिए करबद्ध खड़े थे। पुरानी खेती के आधुनिक ऋषि का कहना इतना ही था कि एक का विकास दूसरा नहीं कर सकता। अपनी खेती की उन्नति के लिए किसान को खुद ही प्रकृति का भागीदार बनना होगा।

नवदर्शनम् में स्थायी तौर पर 11 सदस्य निवास करते हैं। साल में कोई दो हजार अतिथि संस्था का काम देखने के लिए आते हैं। इन सबका सारा प्रबंध अनंतूजी और उनकी पत्नी ज्योति बहन के आत्मीय हाथों में। अभी दो माह पहले ज्योति बहन का निधन हुआ। अनंतूजी समेत पूरे नवदर्शनम् परिवार ने मृत्यु को भी प्रकृति का एक अभिन्न मित्र मानकर सब कुछ बिलकुल सहज ढंग से लिया है।

नवदर्शनम् एक गृहस्थ की ऋषि खेती है, जो खेती में, जीवन में अहिंसा के बीज बो रही है।

श्री दिलीप चिंचालकर ने आस्ट्रेलिया से आधुनिक खेती की उच्च शिक्षा पाई जरूर पर फिर उसे अपने देश के लिए एकदम निरर्थक मानकर डिग्री वहीं छोड़ वे वापस लौट कला और लेखन में रम गए हैं।

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