ग्लोबल वॉर्मिंग की बंद गली, और एक रास्ता

Submitted by admin on Thu, 08/19/2010 - 08:09
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नवभारत टाइम्स, 29 जुलाई 2010
ग्लोबल वॉर्मिंग के बारे में आम लोगों का रवैया संशयवादी हो सकता है लेकिन साइंटिस्टों में इस समस्या को लेकर कोई दुविधा नहीं है। वे हमेशा मानते रहे हैं कि इंसान की पैदा की हुई यह समस्या वास्तविक है और अगर इसकी अनदेखी की गई तो इससे इंसान के वजूद को ही खतरा हो सकता है।

लेकिन, यदि इस समस्या से निपटना है तो जरूरी सवाल यह है कि हम इस बारे में करें तो क्या करें। इस बारे में सबसे आम सुझाव यह है कि दुनिया को हर दिन वातावरण में झोंकी जाने वाली ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में भारी-भरकम कटौती करनी चाहिए। कहा जा रहा है कि इस सदी के मध्य तक कार्बन-डाइ-ऑक्साइड के ग्लोबल इमिशन में 50 फीसदी की कमी लानी चाहिए। लेकिन, इस मत के समर्थक भी मानते हैं कि यह टारगेट हासिल कर पाना आसान नहीं है, और इस मामले में वे सही हैं। बल्कि असल में वे जितने सही हैं, उतने ही गलत भी हैं। कैसे? चलिए, देखते हैं।

पेट्रो का पट्टा


कार्बन उगलने वाले ईंधनों पर हमारी निर्भरता हद से ज्यादा है। यह इतनी जबर्दस्त है कि इसे हम खुद को कुचल डालने वाली चीज की कैटिगरी में रख सकते हैं। इसकी एक वजह यह है कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन एनर्जी कहे जाने वाले दूसरे सभी सोत ग्लोबल एनर्जी कंजंप्शन का सिर्फ 0.6 पर्सेंट हिस्सा पैदा कर पाते हैं, और जो अक्षय ऊर्जा है वह फिलहाल लकड़ी और बायोमास जैसे उन गैर-टिकाऊ सोतों से मिल रही है जिसका इस्तेमाल तीसरी दुनिया के लोग करते हैं। दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का ज्यादातर हिस्सा जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) से पूरा होता है। ऐसे में अगर सदी के मध्य तक कार्बन उत्सर्जन को आधा करना है तो हमें गैर-कार्बन ऊर्जा सोतों का इस्तेमाल करना शुरू करना होगा। पर क्या आज की तारीख में हम ऐसा कर सकते हैं?

कैसे रुके वार्मिंग


इंटरनैशनल एनजीर् एजेंसी के मुताबिक सदी के मध्य तक ऐसा करने के लिए इस अवधि में हमें इतनी चीजों की जरूरत पड़ेगी- 30 नए न्यूक्लियर प्लांट, 17 हजार पवनचक्कियां, 400 बायोमास पावर प्लांट, चीन के थ्री गॉरजेस डैम जितने बड़े दो हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट और कार्बन सोखने वाली किसी ऐसी टेक्नॉलजी से चलने वाले कोयले व गैस पावर प्लांट, जिसे अभी विकसित किया जाना बाकी है! ध्यान रहे कि इस लिस्ट में यह नहीं बताया गया है कि इस अवधि में कौन सा प्लांट कब तक लग जाना चाहिए। सिर्फ यह बताया गया कि 2050 तक हर साल ये प्लांट लगाते चले जाना है। एक और बात। अगर हम ये सारे इंतजाम करने में कामयाब हो जाते हैं (जाहिर है, हम ऐसा नहीं कर पाएंगे) तो भी 2050 तक ग्लोबल टेंपरेचर पर इन उपायों का असर मामूली ही होगा। सबसे प्रतिष्ठित क्लाइमेट-इकनॉमिक मॉडल के मुताबिक इन सारे भारी-भरकम इंतजामों के बावजूद ग्लोबल टेंपरेचर में उस समय तक एक डिग्री सेंटीग्रेड के दसवें हिस्से भर की कमी लाई जा सकेगी, जिससे समुद के जलस्तर की संभावित बढ़त में केवल एक सेंटीमीटर की कमी हो पाएगी।

और इन सारे इंतजामों की लागत क्या होगी?


सदी के मध्य तक 50 खरब (5 ट्रिलियन) डॉलर, जो इसके फायदों को देखते हुए इतनी ज्यादा लगती है कि इन उपायों के बारे में सोचना ही बेमतलब हो जाता है। बहरहाल, अच्छी बात यह है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटने के लिए इससे कहीं बेहतर और स्मार्ट उपाय मौजूद हैं। भारी तादाद में पावर प्लांट बनाने पर खरबों डॉलर खर्च करने और दुनिया के अरबों गरीबों को कोसते हुए कार्बन उत्सर्जित करने वाले ईंधन को बेहद महंगा बनाने की जगह क्यों न हम ग्रीन एनर्जी के विकल्पों को सस्ता बनाने की कोई जुगत भिड़ाएं? फिलहाल प्रति यूनिट ऊर्जा उत्पादन के पैमाने पर सौर ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से मिलने वाली ऊर्जा के मुकाबले 10 गुनी महंगी बैठती है।

ऐसे में सिर्फ पश्चिमी देशों के अमीर लोग ही ये सौर पैनल लगा सकते हैं। लेकिन अगर हम सोलर एनर्जी को जीवाश्म ईंधन से सस्ता बना दें तो इसका विस्तार हर जगह किया जा सकता है। तब हमें न तो किसी को कोयला या तेल जलाने से रोकने की मशक्कत करनी होगी, न ही ग्रीन एनर्जी के इस्तेमाल पर सब्सिडी देनी होगी। तब हर कोई, यहां तक कि चीन और भारत भी ऊर्जा के सस्ते और स्वच्छ विकल्पों की तरफ बढ़ जाएंगे और उत्सर्जन में कटौती का वैश्विक लक्ष्य अपने आप पूरा होने लगेगा।

पीसी जैसा चमत्कार


लेकिन क्या हम अगले 20 या 40 साल में ऐसा कोई तकनीकी चमत्कार कर पाएंगे? इसका जवाब 'हां' हो सकता हैं। पिछले 30 बरस में सौर ऊर्जा की लागत हर दशक में आधी होती गई है। अगर हम ग्रीन एनर्जी से संबंधित आर-एंड-डी पर ग्लोबल जीडीपी का दो फीसदी (लगभग 100 अरब डॉलर सालाना) खर्च करने को तैयार हों तो न सिर्फ सोलर एनर्जी बल्कि अन्य वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों पर भी काम हो सकता है। लोग इस समाधान को संदिग्ध मान सकते हैं लेकिन जरा आधुनिक युग के एक चमत्कार पर्सनल कंप्यूटर (पीसी) के बारे में सोचिए।

क्या इस डिवाइस को घर-घर पहुंचाने के लिए सरकारों ने सब्सिडी दी या इसके लिए टाइप राइटर की कीमतों में इजाफा किया गया? बिल्कुल नहीं। इसी तरह स्पेस संबंधी खोज को लें। अमेरिकी सरकार ने इसके लिए सॉलिड-स्टेट फिजिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में खोज-अनुसंधान के लिए पैसा लगाया। इसका नतीजा सिर्फ यह नहीं निकला कि नील आर्मस्ट्रांग 1969 में चंद्रमा पर पहुंच गए, बल्कि इन क्षेत्रों में हुए काम की बदौलत 1976 में एप्पल कंपनी पहला मैक कंप्यूटर बनाने में और इसके पांच साल बाद आईबीएम पहला पीसी बनाने में कामयाब हुई। कुछ ऐसा ही क्लीन एनर्जी के मामले में भी किया जा सकता है, बशर्ते हुए फालतू हो चुकी टेक्नॉलजी को सब्सिडी देने और पेट्रो ईंधन के इस्तेमाल को बेहद महंगा करने का रास्ता छोड़कर हम ग्रीन एनर्जी को अत्यधिक सस्ता बनाने से जुड़ी बेसिक रिसर्च को संसाधन मुहैया कराएं।

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