सोलर सूनामी का पहला ज्वार

Submitted by admin on Thu, 08/19/2010 - 08:21
Source
7 Aug 2010, नवभारत टाइम्स
एक और दो अगस्त को सूरज से उठकर सीधे अपनी तरफ बढ़े दो तूफानों का झटका धरती पिछले दो-तीन दिनों में झेल चुकी है। एक वैज्ञानिक के शब्दों में कहें तो इस वक्त भी यह उनके असर से झनझना रही है। सूरज की सतह पर होने वाले विस्फोटों से निकली सामग्री का सीधे धरती की तरफ आना एक विरल घटना है। लेकिन इस बार तो लगातार दो विस्फोटों से निकले आवेशित कण हजारों मील प्रति सेकंड की रफ्तार से इसी तरफ दौड़ पड़े थे। बताते हैं कि ऐसे एक भी विस्फोट से निकली ऊर्जा को अगर किसी तरह काबू में कर लिया जाए तो इससे धरती की सारी ऊर्जा जरूरतें दसियों लाख साल तक पूरी की जा सकती हैं। इतनी ज्यादा ऊर्जा अचानक अपने ग्रह की तरफ आ जाना कोई मामूली बात तो थी नहीं।

एक के पीछे एक चले आ रहे इन दोनों सौर तूफानों की मार से कृत्रिम उपग्रहों के डगमगाने, टेलीफोन कनेक्शनों में व्यवधान पड़ने और कनाडा, रूस नार्वे और फिनलैंड जैसे सुदूर उत्तरी देशों में पॉवरग्रिड फेल हो जाने के खतरे गिनाए जा रहे थे। अतीत में यह सब कई बार हो चुका है, और निकट भविष्य में भी इसके होने की आशंका पूरी है। इस बार ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला क्योंकि ये तूफान उतने जबर्दस्त नहीं थे, जितनी आशंका जताई जा रही थी। खगोलशास्त्री सौर तूफानों का वर्गीकरण उनकी तीव्रता के क्रम में सी, एम और एक्स, तीन वर्गों में करते हैं। इस बार वाले दोनों तूफान सी, यानी सबसे निचली श्रेणी के थे।

सौर तूफानों का आना सूरज की सक्रियता से जुड़ा होता है। नंगी आंखों से हर रोज एक सा नजर आने वाला सूरज असल में बहुत ही तेज बदलने वाला पिंड है। इसकी सतह थोड़े समय के लिए चिकनी रहती है फिर इसमें कलंक (सन स्पॉट्स) आने शुरू हो जाते हैं। ये धब्बे पहले छिटपुट ढंग से इसके उत्तरी और दक्षिणी इलाकों में नजर आते हैं। फिर धीरे-धीरे ये सूरज की मध्य रेखा के आसपास दिखने लगते हैं और इनकी संख्या और फैलाव, दोनों बढ़ते जाते हैं। यह समय सूरज की सबसे ज्यादा सक्रियता का होता है और वहां से उठे तूफान धरती के लिए सबसे बड़ा खतरा भी तभी पैदा करते हैं। अभी सूरज अपनी सक्रियता के शुरुआती दौर में ही है इसलिए उससे उठने वाले तूफान भी कमजोर हैं। गणनाओं के मुताबिक सक्रियता का यह चक्र 2012 में अपने चरम पर पहुंचेगा।

क्या यह गिनती किसी भयानक चीज की याद दिला रही है? जी हां। पिछले साल जबर्दस्त चर्चा में रही इसी नाम की एक फिल्म में सन 2012 में दुनिया नष्ट हो जाने की बात कही गई है। फिल्म का नायक, एक अमेरिकी अंतरिक्षविज्ञानी भारत के भूगर्भशास्त्री सतनाम त्सुरुतानी से मिलने आता है, जो उसे बताते हैं कि सौर तूफानों में आए न्यूट्रिनो कण धरती की कोर में पहुंचकर उसे अस्थिर बना रहे हैं। यह प्रकरण फिल्म की कहानी गढ़ने के लिए रचा गया है। हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं है क्योंकि अत्यंत ऊर्जावान न्यूट्रिनो कण धरती में कहीं भी जमा नहीं होते। वे तो इसके आर-पार ऐसे निकल जाते हैं, जैसे राइफल की गोली प्लाईवुड का तख्ता पार कर जाती है। सौर तूफानों की मार धरती की भीतरी सतहों को नहीं, वायुमंडल की सबसे ऊपरी सतहों को झेलनी पड़ती है। इनका कुछ न कुछ असर मौसम पर भी पड़ता है, लेकिन ठीक-ठीक कितना, इस बारे में कोई एक राय नहीं बन पाई है।

इधर कुछ महीनों से धरती के विभिन्न इलाकों में असाधारण प्राकृतिक घटनाएं ( एक्स्ट्रीम वेदर इवेंट्स ) दिखाई पड़ रही हैं। रूस में इतिहास के सबसे अधिक तापमान का रेकॉर्ड जुलाई के आखिरी हफ्ते में दो बार टूट गया। डेढ़ महीने की जानलेवा गर्मी ने वहां जंगलों की आग का एक पूरा सिलसिला ही बना डाला। चीन और पाकिस्तान में पिछले कई दशकों की सबसे भयानक बाढ़ आई हुई है। अमेरिका भयंकर उमस और ऑस्ट्रेलिया लगातार आ रहे तूफानों से परेशान है। ये पंक्तियां लिखेजाते वक्त जम्मू - कश्मीर के लेह जिले में बादल फटने से एक पूरा इलाका तबाह हो जाने की खबर चल रही थी। इन घटनाओं का संबंध सूरज की सक्रियता से हो सकता है , और नहीं भी हो सकता। दो दिन पहले चीन में क्लाइमेटोलॉजी पर हुए एक हाई प्रोफाइल सेमिनार में एक मौसम विज्ञानी ने इनका रिश्ता सूरज की सक्रियता से जोड़ा तो दूसरे ने ग्लोबल वार्मिंग से। यह भी संभव है कि इन दोनों का मेल समस्या को और बढ़ा रहा हो।

सूरज की सक्रियता की वजह आखिर क्या है ? क्यों यह सोए –सोए अचानक जाग पड़ता है ? खुदबुद करती इसकी सतह एकाएक लंबी -लंबी ज्वालाएं क्यों छोड़ने लगती है ? धरती के बारे में हम जानते हैं कियह एक बहुत बड़े चुंबक जैसा व्यवहार करती है , जिसका उत्तरी ध्रुवकमोबेश उत्तर में और दक्षिणी ध्रुव लगभग दक्षिण में हुआ करता है।इन ध्रुवों की जगह बदलती है , लेकिन बहुत धीरे -धीरे।

करीब साढ़ेसात लाख साल में पासा पलट जाता है। यानी पृथ्वी का उत्तरी चुंबकीय ध्रुव दक्षिणी हो जाता है और दक्षिणी चुंबकीय ध्रुव उत्तरी। लेकिन सूरजके मामले में ध्रुवों की यह अदला - बदली मात्र 11 साल में हो जाया करती है। ज्यादा महीन ढंग से कहें तो 10.7 साल में। पूरे सौरमंडल कोअपने पीछे लटकन की तरह घुमाने वाले , दस लाख धरतियों जितनेबड़े सूरज में इससे पैदा होने वाला असंतुलन काफी हिंसक होता है। इसेही हम सौर कलंकों और सौर ज्वालाओं में जाहिर होते देखते हैं।

अद्भुत आसमानी दृश्यों के शौकीन लोगों के लिए सौर तूफानों का अपना मजा है। सूरज से निकले आवेशित कण जब धरती के चुंबकीय क्षेत्र कोअपने घेरे में लेते हैं तो वायुमंडल की सबसे ऊपरी सतह पर लाखोंएंपियर की बिजली दौड़ने लगती है। ध्रुवीय क्षेत्रों का वातावरण इसकेअसर में किसी नियॉन बल्ब की तरह चमकने लगता है। उत्तर में इसचमक को ऑरोरा बोरियालिस और दक्षिण में ऑरोरा ऑस्ट्रियालिस कहते हैं। इस चमक को देखना भारत जैसे ट्रॉपिकल देशों के भाग्य में नहीं है। अलबत्ता बरसाती अंधेरी रातों में बिजली कड़कते वक्त आसमान के दहकते बैंगनी रंग को देखकर हम इसकी कुछ कल्पना जरूर कर सकते हैं। इस बार भी उत्तरी देशों की दो - तीन रातें इन तूफानों के असर में यादगार बन गईं। कनाडा और रूस के आसमान में आधी रात को दिखीं हरी और गुलाबी रोशनी की अजीब भुतहा छटाएं , जिन्हें देखकर कुछ लोग डर से सिहर गए तो कुछ ने हमेशा के लिए इन्हें अपने कैमरों में कैद कर लिया। उम्मीद करें कि 2012 में दुनिया सही - सलामत रहेगी, लेकिन आकस्मिक आकाशीय खतरों के लिए हमारी तैयारी पूरी होनी चाहिए।

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