मेरा गांव

Submitted by admin on Tue, 08/31/2010 - 13:29
Source
गांधी मार्ग, मई-जून 2003
यह कैसी विडम्बना है कि किसी भी राष्ट्र जीवन के स्थूल और नकारात्मक चिह्न दूसरे देश, विशेषकर भारत में जितनी जल्दी दिखाई देने लगते हैं, शायद ही किसी दूसरे देश के जातीय जीवन में उतनी जल्दी दिखाई देते हों? यह बात इसलिए ज्यादा बल देकर रेखांकित करना जरूरी है क्योंकि हमारे राष्ट्रीय जन-जीवन में पर्यावरण के प्रतिगामी और विनाशकारी लक्षण जितनी तेजी से दिखाई पड़ रहे हैं, वैसी प्रवृत्तियां एक समृद्ध पर्यावरणीय चिन्तन वाले देश में पनपना आत्मवंचना का साक्षात प्रमाण है।अपने वर्तमान नगरीय आवास से मात्र 65-70 किलोमीटर दूरी पर स्थित जब-जब अपने गांव सिवान जाता हूं तो पहुंचते ही मुझे वह नाला दिखाई देता है, जिसमें मेरे शैशव और कैशौर्य ने कितने संक्रान्ति कालों में डुबकियां लगाकर देह और मन की तपन शान्त की है। कितनी वर्षा ऋतुओं में तट की वर्जनाओं को तोड़कर मन के उच्छल आवेग को तरंगायित होने का अवसर हाथ लगा है। यह नाला हमारे गांव की जीवन रेखा था।

सुनता रहता था, उस नाले का स्रोत केंद्र कोई अनाम छोटा सा झरना है और देखता रहता था कि उस अनाम झरने से प्रवाहित होने वाली अक्षय और अनन्त जलराशि अपने जनपद के मेरे सबसे बड़े गांव के मनुष्य सहित सभी जीवधारियों और खेतों की प्यास बुझाने वाली संजीवनी धारा है। इस नाले की आद्रता गांव के समूचे कुओं और तालाबों की धमनियों में भी रक्त संचार किए रहती थी। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के विकास के पहले चरण अर्थात पांचवें दशक में अचानक गांव में पेयजल टंकी और नलों में उपलब्ध कराया जाने लगा। कुएं अनुपयोगी मानकर कचरों के भण्डार में तब्दील होने लगे और उपेक्षित पड़े तालाब अपना अस्तित्व खोने लगे।

ग्रामीण विकास के दूसरे चरण में अबकी बार गांव गया तो देखा कि कस्बा बनते जा रहे गांव का मल-मूत्र बहाने वाली नालियों का विसर्जन केंद्र वही नाला है जो मेरी भावना और यथार्थ बोध के स्तर पर गंगा की तरह पवित्र और कृषि कार्य के लिए आधार तत्व था।

यह भारतवर्ष के अकेले मेरे गांव की त्रासदी नहीं है, पर्यावरण के एक आधारभूत घटक जलीय संदर्भ में लगभग अधिकांश गांवों की यही नियति है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों में प्रवेश करते ही आंखे जिस अदृश्य आग की तपन से जलने लगती हैं अब वह आग महानगरों की हदों को लांघकर कस्बों और छोटे-छोटे नगरों तक पहुंच कर झुलसा रही है। जिन्दगी की तपिश को प्रेम की हरीतिमा से कुछ पल चैन की दिलासा देने का आग्रह रचने वाले ताजमहल के शहर आगरा तक में अवशिष्ट कचरों के ढेर और वृक्षों के छायाविहीन मार्गों से गुजरते हुए ‘ग्रीन आगरा क्लीन आगरा’ जैसे विदेशी पदों में लिखे गए सूक्ति वाक्य और नारे आत्म प्रवंचना का प्रमाण बनकर हमारे नागरिक जीवन और तंत्रीय चरित्र की असलियत खोलते नजर आते हैं। ‘ग्रीन’ और ‘क्लीन’ जैसे पदों से पटे पड़े किसी शहर के ‘बोर्ड’ और ‘होर्डिंग्स’ हमारी चेतना और संकल्प के अंग न होने के कारण हमारे दोहरे आचरण की पट्टिका से कुछ भी अधिक नहीं हैं।

हमारा केन्द्रीय तंत्र राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी नामधारी रेल-गाड़ियों के अभिजात्यपन का एक परिचय उसके खाने या नाश्ते के स्वरूप में भी देता है, जिसमें यात्री के जेब से लिए गए पैसे से दी जाने वाली भोज्य सामग्री के लगभग सभी पदार्थ उस पोलीथीन में बंद किए गए होते हैं, जिन पोलीथीनों को नष्ट करने के लिए भविष्य में कोई बंगाल की खाड़ी भी छोटी पड़ेगी। न सिर्फ भोजन के पदार्थ वरन् उसके परोसे जाने के ढंग में भी जिस विदेशी जीवन पद्धति को अंगीकार कर लिया गया है, यह और जीवन के ऐसे अनेक नकारात्मक बिन्दुओं में ही वैश्विक चेतना के जबरदस्त प्रभाव दिखाई देते हैं। यह कैसी विडम्बना है कि किसी भी राष्ट्र जीवन के स्थूल और नकारात्मक चिह्न दूसरे देश, विशेषकर भारत में जितनी जल्दी दिखाई देने लगते हैं, शायद ही किसी दूसरे देश के जातीय जीवन में उतनी जल्दी दिखाई देते हों? यह बात इसलिए ज्यादा बल देकर रेखांकित करना जरूरी है क्योंकि हमारे राष्ट्रीय जनजीवन में पर्यावरण के प्रतिगामी और विनाशकारी लक्षण जितनी तेजी से दिखाई पड़ रहे हैं, वैसी प्रवृत्तियां एक समृद्ध पर्यावरणीय चिंतन वाले देश में पनपना आत्मवंचना का साक्षात प्रमाण है।

जल, थल, वायु और ध्वनि के अतिरिक्त नभमंडल पर्यावरण के अंग हैं, स्वभावतः प्रकृति का समृद्ध लोक, मनुष्य जीवन से उसका सहचर्य और उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण ही पर्यावरण के संरक्षण या क्षरण का कारण बनता है। प्रकृति के समृद्ध लोक को यदि हम मनुष्य के उपयोग में आने वाली सामग्री मात्र या पदार्थवादी नजरिये से देखेंगे तो उसका अधिकतम उपभोग और अधिक से अधिक दोहन का व्यवहारवाद चलाएंगे। विकास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उद्योगवाद, यांत्रिकीकरण और आधुनिकतावाद जैसे प्रत्ययों का सहारा लेकर हमने प्रकृति के साथ जो छेड़छाड़ और विनाशलीला की है, उसके परिणाम राष्ट्रीय और वैश्विक जीवन में दिखाई पड़ने लगे हैं।

20वीं शताब्दी के असाधारण मनीषी महात्मा गांधी का यह कथन की “प्रकृति के पास करोड़ों लोगों को खिलाने के लिए अकूत भण्डार है किन्तु एक भी व्यक्ति की तृष्णा मिटाने की सामर्थ्य उसमें नहीं है।” एक ऐसी जीवन पद्धति और विचार की ओर संकेत करता है जिसके सुने जाने पर आज विश्व समाज और कम से कम हमारे राष्ट्र की ऐसी दयनीय स्थिति न होती।

पर्यावरण के वर्तमान क्षरणशील परिदृश्य को लेकर हिन्दी के विद्यार्थी के नाते मुझे महाकवि प्रसाद कृत ‘कामायनी’ का वह वस्तु संदर्भ बार-बार अपनी ओर आकृष्ट करता है जिसमें ‘शतपथ ब्राह्मण’ ग्रंथ को आधार बनाकर मनुष्य के उस विवेक को बनाए रखने का संदेश दिया गया है जिसमें वह प्रकृति या पर्यावरण के साथ संतुलन बनाए रख सकता है और ठीक इसके विपरीत आचरण पर महाजलप्लावन और ध्वंस का शिकार बन सकता है। यह जरूरी नहीं है कि महाजलप्लावन और ध्वंस का दृश्य उसी रूप में दुहराये जाने की आशंका है, किन्तु यह आशंका किसी अन्य रूप में भी सामने आ सकती है, जिसके कुछ-कुछ चिह्न मनुष्य समाज में दिखाई पड़ने लगे हैं-

सुख केवल सुख का वह संग्रह/केन्द्रीभूत हुआ इतना।
छायापथ में नवतुषार का/सघन मिलन होता जितना।।
शक्ति रही हां शक्ति; प्रकृति थी पदतल में विनम्र विश्रांत।
कंपती धरणी, उन चरणों से, होकर प्रतिदिन ही आक्रान्त।।


प्रकृति के प्रति मनुष्य का पदार्थवादी दृष्टिकोण उसे प्रकृति के प्रति चाहे कितना ही उदार और सहिष्णु क्यों न रखे किन्तु वह उसे भोगवादी होने से नहीं रोक सकता। अन्ततोगत्वा प्रकृति उसके लिए बाजार का एक उपादान और वह उसका उपभोक्ता होगा ही। हमें स्वीकार करना ही होगा कि पर्यावरणीय संतुलन और संरक्षण के लिए प्रकृति के साथ मनुष्य के जैविक और भाववादी सम्बन्धों का पुनर्स्मरण कर सह अस्तित्व की भावना को संवर्धन देना एक मात्र विकल्प है। महाकवि सूरदास के चरित नायक जिस संवेग व आत्मीयता से अपने मित्र से कहते हैं-

‘ऊधौ मौंहि ब्रज बिसरत नाहीं।
हंस सुता की सुन्दर कगरी अरु कुंजन की छाहीं।।’


इससे प्रकृति और मनुष्य के औपचारिक सम्बन्धों का खुलासा मात्र नहीं होता वरन् प्रकृति मनुष्य की धड़कन का अविभाज्य अंग बनकर सजीव होती है। कृपया सोचिये, संबंधों की इस बुनियाद पर यदि साहचर्य की अभिनव संस्कृति खड़ी होती है तो इसमें आश्चर्य कुछ भी नहीं है। यह संबंध परस्पर संरक्षण और आवश्यकतानुसार सहयोग का कारण बनते हैं। अकारण नहीं है कि ईसाई मत में प्रकृति को देवी और इस्लाम में ऐसी विरासत बताया गया है जिसे संवारना प्रत्येक बन्दे का दायित्व है। हिन्दू धर्म में तो प्रकृति को ईश्वर का प्रतिरूप, सृजनकर्ता, पूज्य, पिता, मां, सहचर और एक शब्द में कहा जाए तो सर्वस्व माना गया है। यहां प्रकृति मनुष्य की आस्था और धर्म है, वह जीवन का मर्म है, जीवन के पग-पग पर कर्म है। प्रकृति ही हमारे यहां जन्म-मरण का हेतु है और चिर जन्म-मरण के आर-पार का सेतु है-

छिति जल पावक गगन समीरा।
पंच रचित यह अधम सरीरा।।


यह विचारणीय है कि गीता में श्रीकृष्ण ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां’ कहकर प्रकृति से अपनी सत्ता को अभिन्न ठहराते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो के संदेश ‘Back to the Nature’ में जीवन को निसर्ग के निकट रखने का आग्रह है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो हों या कीट्स, वर्डसवर्थ आदि अंग्रेजी कवि सभी ने प्रकृति के उन्मुक्त गान गाए हैं। भारतीय मन-प्राण बाल्मीकि, कालिदास और भवभूति आदि प्राचीन कवि हों या रवीन्द्रनाथ, प्रसाद या निराला जैसे आधुनिक कवि सभी प्रकृति के उन्मुक्त गायक हैं।

प्रकृति हमारे लिए सौन्दर्य का उपादान भर नहीं है। वन, नदी, पर्वत, निर्झर, समुद्र, जीव-जन्तु, मनुष्य सभी पर्यावरण समुदाय हैं। दूर्वा, शमी, आम्र और तुलसी, पीपल, बड़, कमल, अशोक आदि पेड़-पौधों की प्रजातियां पूजा-वंदन, औषधि व जीवन की रस्मों से अविच्छिन्न होकर अपरिहार्य हो गई हैं। शिव, भरत, राम, कृष्ण आदि देवों को कर्मयोग में तपोनिष्ठ करने वाली प्रकृति के हम चिर ऋणी हैं। हमारी संस्कृति का उत्स प्रकृति ही है। जिसकी वट वृक्ष की छाया तले बैठे गौतम बुद्ध के बुद्धत्व और महावीर के शिष्यों को विहार की मुक्त प्रेरणा देती है। यही धारा आधुनिक भारत में शान्ति निकेतन जैसे संस्थान को रचती है, जहां प्रकृति और अध्यात्म के उत्संग में मानव-शिक्षा सार्थकता पाती है।

20वीं शताब्दी विज्ञान, टेक्नालॉजी और उद्योगवाद की अन्धदौड़ की रही है। प्रतिस्पर्धा कड़ी है और विकास के मानदण्ड बदल गए हैं। मशीन पर अधिकाधिक निर्भर होते जाना, जंगलों का विनाश कर नगरों, उपनगरों और महानगरों का निर्माण, महानगरों में भी गगनचुम्बी अट्टालिकाएं और ताबड़तोड़ औद्योगिकरण ने पर्यावरण का संतुलन तोड़ दिया है। बीते नौवें दशक में भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस का रिसाव तथा ईराकी-अमरीकी युद्ध में बड़े पैमाने पर समुद्र में पेट्रोल का फैलना सभ्यता और जीने के इस विकासवादी नजरिए पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न है। गैस दुर्घटना में भोपाल में दो हजार से अधिक निरपराध लोगों की मृत्यु और खाड़ी युद्ध से समुद्र में पेट्रोल के फैलाव से असंख्य जलचर, नभचर, अकाल मृत्यु के ग्रास होकर प्रदूषण का कारण बने। क्या ये आधार मनुष्य के विकास के रास्ते के पुनर्मूल्यांकन के लिए पर्याप्त नहीं हैं।?

आज पर्यावरण प्रदूषण एक प्रमुख चुनौतीपूर्ण समस्या है। हमने विकास का जो यूरोपीय ढांचा अपनाया है उसका परिणाम स्वदेशी उत्पादों, उद्योग धन्धों, कुटीर व छोटे कारखानों व हस्तकला के विनाश व कृषि क्षेत्र के हतोत्साहन के रूप में सामने आता है। गांव उजड़ रहे हैं, शहरों में जनसंख्या का घनत्व बढ़ रहा है, चारागाह नष्ट हो रहे हैं, पशुपालन कठिनतर होता जा रहा है, जलाऊ लकड़ी का स्वाहा हो रहा है, व्यापक पैमाने पर चल रहे खनिज उत्पादन से सैंकड़ों हैक्टेयर भूमि बीहड़ होती जा रही है, घर-घर में धरती की छाती को भेदकर जल संयंत्र लगाए जा रहे हैं, जलाशय व झीलें सूख रही हैं, भूमि का जलस्तर घटता जा रहा है, रासायनिक कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं और धूल ने लोगों के फेंफड़ों में परतें जमा दी हैं, कारखानों से निकलने वाले धोवन से नदी की निर्मल धारा विषैली हो गई है। नवगीतकार अनूप अशेष लिखते हैं-

‘चिमनी का धुआं जिएं/गुंगवाती सांसों की/जहरीली गन्ध पिएं/लोहे की नदी बहें/रागें की धार जमें/यन्त्रों की बस्ती में सुलगें/कुछ आंच सहें/’

जो पर्यावरण हमारे जीवन के लिए इतना मूल्यवान है या कहें कि जीने की अनिवार्य शर्त है उसे हम पूज्यमान या उपयोगितावाद जिस सृष्टि से देखें, उसके संरक्षण व संवर्धन के लिए हर संभव कोशिश करनी होगी। भगवान महावीर का संदेश ‘जिओ और जीने दो’ मनुष्य से आगे सम्पूर्ण चराचर जगत के लिए है। मध्यकालीन कवि देव ने कहा है कि ‘विधि के बनाए जीव जेते हैं जहां के तहां खेलत फिरत तिन्हें खेलन फिरन देव।’ सह अस्तित्व का भाव और मार्ग ही प्रशस्त पथ है। मनीषी आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘कविता क्या है’ नामक प्रसिद्ध निबन्ध में प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते की व्याख्या करते हुए एक मार्मिक टिप्पणी की है कि ‘हम पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों से सम्बन्ध तोड़कर, बड़े-बड़े नगरों में आ बसे पर उनके बिना नहीं रहा जाता।’

दरअसल, वस्तु जगत-पर्यावरण जिसका मूलभूत अंग है वह हमारे विचार और दृष्टिकोण की निर्मिति है, इसलिए यह जरूरी है कि पहले हम भाव या विचार जगत से साक्षात्कार कर जीवन का लक्ष्य समझें। भोगवादी और अपरिग्रह जीवन के दो विरोधी मार्ग हैं। हमारी सांस्कृतिक थाती त्याग और उपभोग के संतुलन में रही है। यही संतुलन पर्यावरण को भी जीवन दे सकता है और पर्यावरण मनुष्य की जिंदगी। मनुष्य मन के गहन मीमांसक महात्मा गांधी ‘ईशोपनिषद’ के इस सूत्र को जीवन का मंत्र मानते थे, आइये; हम भी इसके संदेश को गुनें या नहीं, पर सुनें तो-

ईशावास्यम् इदम सर्वम्, यत किं च जगत्यां जगत।
तेन त्यक्तेन भुत्र्जीथाः, मा गृधः कस्यास्विद धनम्।।


Disqus Comment

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा