मौसम परिवर्तन से बढ़ती आपदाएं

Submitted by admin on Mon, 09/13/2010 - 13:31
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समय लाइव, 07 सितंबर 2010

हर कोई मौसम की बात करता है, लेकिन उसके बारे में कोई कुछ कर नहीं सकता। यही बात प्राकृतिक आपदाओं के बारे में भी कही जा सकती है।

हां, यह जरूर है कि प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य जान और माल को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है। इधर कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम बहुत उग्र होता जा रहा है। गर्मी में बहुत ज्यादा गर्मी और सर्दी में ज्यादा सर्दी। पूरे एशिया क्षेत्र में पर मौसम की मार है। लेह में जहां बादल फटने और भारी वर्षा के कारण बहुत तबाही हुई। वहीं पाकिस्तान में भीषण बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित हुए हैं।

हाल में आए एक अध्ययन के अनुसार मौसम की मार से 2009 में दुनिया भर में साढ़े पांच करोड़ लोग मरे। 1850 के बाद यह सबसे गर्म वर्ष रहा। इस कारण लगभग 19अरब डॉलर की आर्थिक क्षति हुई। बताया गया है कि कम विकसित देश जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। इनके कारण 39 प्रतिशत मौतें एशिया में तथा 17 प्रतिशत अफ्रीका में हुई। यही क्षेत्र संसार में सबसे अधिक कुपोषित भी हैं। कृषि विशेषज्ञ डॉ. एमएस स्वामीनाथन का कहना है कि तापमान बढ़ने से सबसे अधिक नुकसान गेंहूं की फसल को हो सकता है। इस फसल से भारत की 64 प्रतिशत जनसंख्या अपना पेट भरती है। इस रूप में सबसे अधिक खतरा खाद्यान्न सुरक्षा को है।

विकासशील देशों पर मौसम की उग्रता की मार सबसे अधिक है। विश्व मौसम संगठन का कहना है कि समुद्र के स्तर में वृद्धि भी मौत का बड़ा कारण है। 1975 से आपदाओं के आंकड़े बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाएं बढ़ रही हैं। भारत को सूखे से फसलों को बचाने के प्रयत्न करने होंगे। बाढ़ का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी जलवायु एजेंसी की उस रिपोर्ट पर गौर करना जरूरी है जिसमें कहा गया कि 2010 अब तक का सबसे गर्म वर्ष होने होने जा रहा है। वास्तव में इससे पहले अप्रैल माह में इतनी गर्मी कभी नहीं पड़ी। लगभग तीन वर्ष पूर्व संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि समुद्र का स्तर बढ़ने, बाढ़, पीने का पानी तथा कृषि के लिए गिरती जल सप्लाई के कारण 40 प्रतिशत जनसंख्या प्रभावित हो सकती है। तापमान बढ़ने से इस शताब्दी में समुद्र स्तर 30 से 50 इंच तक बढ़ सकता है। इसके कारण निचले इलाकों में पानी भर जाएगा, जिससे बांग्लादेश बुरी तरह प्रभावित होगा। संसार के अधिकांश भागों में हिमनद या ग्लेशियर पिघल रहे हैं। ग्रीनलैंड की हिम शीट गत दो-तीन वर्ष से पिघल रही है।

उन्नीसवीं शताब्दी से जिस पहेली में वैज्ञानिक उलझे थे, वह ब्रिटेन की रैडिंग यूनिवर्सटी के अनुसंधान केंद्र ने हल कर दी है। केंद्र ने व्यापक अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला है कि जाड़े तथा बसंत में हिमालय के ऊपर भारी हिमपात भारत में सूखे का सीधा कारण हो सकता है। ऐसा मानसून के आरंभिक समय में ज्यादा होता है। इस अध्ययन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत में समय पर मानसून आने पर ही कृषि निर्भर करती है। यदि प्रतिकूल प्रभाव पड़ा तो फसलों पर इसका असर विनाशकारी हो सकता है। इस बार देश के कुछ राज्यों में सूखे के कारण काफी नुकसान हो चुका है जबकि कुछ भागों में अतिवृष्टि से बाढ़ के कारण रोग फैल रहे हैं, जिससे निपटना मुश्किल हो रहा है।

सारे एशिया में मौसम की गड़बड़ी के कारण विनाशकारी घटनाएं हो रही हैं। लेकिन विशेषज्ञ इन्हें जलवायु परिवर्तन का कारण नहीं कह रहे हैं, क्योंकि उनके पास ठोस प्रमाण नहीं हैं। चीन के थ्री गोर्जेस बांध का जल स्तर इतना बढ़ गया है कि वहां कम से कम डेढ़ सौ लोग इस कारण मारे गए हैं। पुणे के मौसम कार्यालय के निदेशक दामोदर पाई का कहना है कि पाकिस्तान में जैसी बाढ़ आई, वैसी भारत में भी आ सकती थी। बस यह कुछ ही मील दूर रह गई। सितम्बर के अंत में भारत में मानसून समाप्त हो जाता है, लेकिन इस बार उस समय भी वर्षा के आसार हैं। वरिष्ठ मौसम अधिकारी कह रहे हैं कि इस वर्ष मानसूनी वर्षा अक्टूबर तक खिंच सकती है जो असामान्य बात है। सितम्बर के अंत में अधिकतम वर्षा हो सकती है, और अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में भी वर्षा हो सकती है।

इस वर्ष मौसम में कुछ ज्यादा ही बदलाव आ रहे हैं। प्रशांत महासागर के ठंडा होने की दशा को स्पेनिश भाषा में 'ला नीना' और गर्म होने की दशा को 'अल नीना' कहते हैं। तो इस बार मौसम अल नीना से ला नीना में आ गया है, जिसके कारण अधिक शक्तिशाली वर्षा लाने वाली हवाएं चल रही हैं। इसी की वजह से सितम्बर-अक्टूबर में भी वर्षा के आसार हैं। गत वर्ष ला नीना के कारण (समुद्र के गरमाने से) भारत में भयंकर सूखा पड़ा था। पाई तो यहां तक कहते हैं कि लेह आपदा ने वहां के लोगों के लिए एक पाठ पढ़ाया है। वह यह कि लेह की तलहटी में स्थायी आवास नहीं होना चाहिए। यह सुरक्षित जगह नहीं है। लेकिन फिलहाल वैज्ञानिक एशिया क्षेत्र में हो रहे मौसम के इस फेरबदल का कारण ग्लोबल वार्मिंग नहीं बता रहे हैं। उनका कहना है कि इसके लिए दीर्घकालीन अध्ययन होना चाहिए।

हाल में अमेरिकी मौसम विशेषज्ञों ने कहा था कि गत मार्च में बहुत ज्यादा गर्मी पड़ी थी। अफ्रीका, दक्षिण एशिया और कनाडा में सामान्य से ज्यादा गर्म परिस्थितियां रहीं। 1880 के बाद मार्च 2010 में पृथ्वी और महासागरों का औसत तापमान रिकार्ड अधिकतम 13.5 अंश सेंटीग्रेड रहा, जो बीसवीं शताब्दी के औसत तापमान (12.7 अंश) से कहीं ज्यादा था।

तेज मानसून के कारण भारत पर एक और पुरानी बीमारी की मुसीबत आ रही है। यह है एच-1 एन-1 या स्वाइन फ्लू। बारिश और नम मौसम के कारण यह वायरस पनप रहा है। दिल्ली और उसके आस-पास तथा देश के अन्य भागों में डेंगू के भी मरीज बढ़ रहे हैं और उससे अनेक मौतें हो चुकी हैं।

अभी वैज्ञानिक पुख्ता ढंग से यह नहीं कह रहे हैं कि मौसम में यह जबर्दस्त हेरफेर ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहा है। वे कहते हैं ऐसा संभवत: हो सकता है। एक जलवायु विशेषज्ञ जय लॉरी मोर का मानना है कि जलवायु बदल रही है। उग्र घटनाएं जल्दी-जल्दी तथा और तेजी से हो रही हैं। हम ये परिवर्तन हर मौसम में देख रहे हैं। वैज्ञानिकों कहते हैं कि रूसी हीट वेब जलवायु परिवर्तन का कारण हो सकती है, लेकिन हमने यह बात अभी सिद्ध नहीं की है। साइबेरिया तथा अन्य भागों में तेज हीट वेब, सूखा तथा दावानल ने वहां के इतिहास को ही पलट कर रख दिया है। आश्चर्य है कि शून्य से नीचे रहने वाले ऐसे प्रदेश में ऐसी घटनाएं घट सकती हैं।
 
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