रक्षा कवच की रक्षा का सवाल

Submitted by admin on Thu, 09/16/2010 - 10:57
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समय लाइव, 16 सितंबर 2010

आज हमारी राजनीति से लेकर समाज, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण तक सब कुछ छलनी हो चला है। और तो और हमने ओजोन की उस छतरी में भी छेद कर डाला है, जो सूर्य की घातक किरणों से हमें बचाती है।

नासा के औरा उपग्रह से प्राप्त आंकड़े के अनुसार ओजोन छिद्र का आकार 13 सितम्बर, 2007 को कोई 97 लाख वर्ग मील के बराबर फैल गया था जो उत्तरी अमेरिका के क्षेत्रफल से भी अधिक है। 12 सितम्बर, 2008 को इसका आकार और बढ़ गया।

वायुमंडल में मौजूद ओजोन की चादर लगातार झीनी हो रही है और सूर्य की खतरनाक पराबैंगनी किरणें हमारा अस्तित्व छेद रही हैं। इसके लिए हमारी सोच और जीवनशैली जिम्मेदार है। इस कारण हमें त्वचा और आंखों की खतरनाक बीमारियों से दो-चार होना पड़ रहा है। ओजोन की छतरी में छेद के लिए जिम्मेदार है, क्लोरोफ्लोरोकार्बन गैस जिसका हमारे दैनंदिन जीवन में बडे पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। रेफ्रिजरेटर से लेकर एयरकंडीशनर तक इसी गैस पर निर्भर हैं और इन्हीं के जरिए सीएफसी वातावरण में घुल रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि सीएफसी के उत्पादन और इस्तेमाल पर आज से ही पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए तो भी ओजोन क्षरण की समस्या बनी रहेगी। क्योंकि वातावरण में मौजूद सीफसी को साफ करने का तरीका अब तक नहीं ढूढ़ा जा सका है और यह अगले सौ सालों तक वातावरण में इसी तरह बनी रहेगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सीएफसी पर पूर्ण प्रतिबंध संभव है?

मोट्रियल प्रोटोकाल से जुड़े 30 देशों ने सीएफसी के इस्तेमाल में कमी लाने पर सहमति जताई है। लेकिन यह कमी कितनी होगी, इसका कोई आंकड़ा स्पष्ट नहीं है। 2000 तक अमेरिका तथा यूरोप के 12 राष्ट्र सीएफसी के इस्तेमाल और उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने पर सहमत हो गए थे। इसे बड़ी उपलब्धि माना गया था क्योंकि ये देश दुनिया में उत्पादित होने वाले सीएफसी का तीन चौथाई हिस्सा पैदा करते हैं। लेकिन प्रश्न है कि इन देशों ने अपनी सहमति को साकार कितना किया? ओजोन की चादर में पहला छेद अंटार्कटिक के ठीक ऊपर बना। ओजोन छिद्र का पता 1985 में ब्रिटिश वैज्ञानिक जोसेफ फारमैन, ब्रायन गार्डनर और ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के जोनाथन शंकलिन ने लगाया था। ओजोन की चादर की खोज 1913 में फ्रैंच वैज्ञानिकों, चार्ल्स फैब्री और हेनरी बूइसॉ ने की थी। पृथ्वी से 30 मील ऊपर तक का क्षेत्र वायुमंडल कहलाता है और उसके सबसे ऊपरी हिस्से में नीले रंग की ओजोन गैस की पर्त है।

ओजोन में ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं। हमें सांस लेने के लिए जिस ऑक्सीजन की जरूरत होती है, उसमें दो परमाणु होते हैं। सीएफसी से निकलने वाली क्लोरीन गैस ओजोन के तीन ऑक्सीजन परमाणुओं में से एक से अभिक्रिया कर जाती है और इस तरह क्लोरीन का एक परमाणु ओजोन के एक लाख अणु नष्ट कर डालता है। अमेरिका की एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (ईपीए) के अनुसार ओजोन क्षरण के कारण, 2027 तक पैदा होने वाले छह करोड़ अमेरिकी, त्वचा के कैंसर से पीडि़त होंगे और इनमें से लगभग दस लाख मारे जाएंगे। अनुसंधानों में कहा गया है कि इससे मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाएगा। ईपीए के अनुसार इस कारण वृक्षों का जीवन चक्र बदल सकता है, खाद्य श्रृंखला बिगड़ सकती है। पशुओं पर भी बुरा असर पड़ेगा। अधिकांश समुद्री सूक्ष्म जीव समाप्त हो जाएंगे। जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय समिति (आईपीसीसी) की हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि ओजोन क्षरण के कारण धरती का तापमान पिछले सौ सालों में 0.74 प्रतिशत बढ़ गया है और इसका प्रभाव घातक है।

ओजोन की चादर बचाने के लिए सीएफसी के इस्तेमाल पर प्रतिबंध के अलावा फिलहाल कोई रास्ता नहीं है। इस बारे में जागरूकता के लिए 16 सितम्बर 1995 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहल पर मोट्रियल प्रोटोकॉल पर 191 देशों ने सहमति जताई थी। इसके तहत सभी सदस्य देशों को सीएफसी के उत्पादन और इस्तेमाल में कमी के लिए अपने-अपने स्तर पर उपाय करने थे। इसी सहमति के समर्थन में अब हर वर्ष 16 सितम्बर को अंतरराष्ट्रीय ओजोन दिवस मनाया जाता है। लेकिन क्या साल में एक दिन का समारोह मना लेने से समस्या सुलझ जाएगी?

यदि हम वाकई समाधान के प्रति गंभीर हैं, तो साल के 365 दिन ओजोन को याद रखना होगा। इसके लिए अपनी सोच और जीवन-शैली में बदलाव लाना होगा। अधिकाधिक पेड़ लगाने होंगे, ऊर्जा-खपत घटानी होगी। पर्यावरण अनुकूल उत्पादों और वस्तुओं का इस्तेमाल करना होगा, स्थानीय स्तर पर जागरूकता फैलानी होगी।
 
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