अनामलाई पहाड़ियाँ

Submitted by Hindi on Wed, 10/27/2010 - 09:39
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अनामलाई पहाड़ियाँ दक्षिण भारत के मद्रास प्रांत के कोयंबटूर जिले तथा केरल राज्य में स्थित एक पर्वतश्रेणी है जो अक्षांश १० १३उ. से १० ३१उ. तथा देशांतर ७६ ५२पू. से ७७ २३पू. तक फैली है। 'अनामलाई' शब्द का अर्थ है 'हाथियों' का पहाड़', क्योंकि यहाँ पर पर्याप्त संख्या में जंगली हाथी पाए जाते हैं। पर्वतों की यह श्रेणी पालघाट दर्रे के दक्षिण में पश्चिमी घाट का ही एक भाग है। अनाईमुडी इसका सर्वोच्च भाग है (८,९५० फुट)। इसके शिखरों में तंगाची (८,१४७) फुट), काठुमलाई (८,४०० फुट) कुमारिकल (८,२०० फुट) और करिनकोला (८,४८० फुट) उल्लेखीय हैं। इन शिखरों को छोड़कर इस पर्वतमाला को ऊँचाई की दृष्टि से हम दो भागों में बाँट सकते हैं-उच्च श्रेणी और निम्न श्रेणी। उच्च श्रेणी की पहाड़ियाँ ६,००० से लेकर ८,००० फुट तक ऊँची हैं और अधिकतर घासों से ढकी हैं। निम्न श्रेणी की पहाड़ियाँ लगभग २,००० फुट ऊँची हैं जिनपर मूल्यवान इमारती लकड़ियाँ जैसे सागौन ( टीक), काली लकड़ी (आबनूस, डलबर्गिया लैटिफ़ोलिया) और बाँस पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। इमारती लकड़ियों का सरकारी जंगल ८० वर्ग मील में है। इन लकड़ियों को हाथी तथा नदी के सहारे मैदान पर लाया जाता है। कोयंबटूर तथा पोतनूर जंकशनों से रेलमार्ग द्वारा काफी मात्रा में ये लकड़ियाँ अन्यत्र भेजी जाती है। अनामलाई शहर में भी इसका एक बड़ा बाजार है। इन लकड़ियों को ढोने के लिए इन पहाड़ों पर पाए जानेवाले हाथी तथा पालघाट के रहनेवाले मलयाली महावत बड़े काम के हैं। इन हाथियों को बड़ी चतुरता से ये लोग इस कार्य के लिए शिक्षित करते हैं। इस पर्वतश्रेणी से बहनेवाली तीन नदियाँ-खुनडाली, तोराकदावु और कोनालार भी लकड़ी नीचे लाने के लिए बड़ी उपयोगी हैं। लकड़ियों के अतिरिक्त इन पर्वतों से प्राप्त पत्थर मकान बनाने में काम आते हैं।

यहाँ की जलवायु अच्छी है और पाश्चात्य लोगों ने इसकी बड़ी प्रशंसा की है। यहाँ की जलवायु तथा मिट्टी में उगनेवाले असंख्य पौधों का प्राकृतिक सौंदर्य विश्वविख्यात है।

भूगर्भशास्त्र की दूष्टि से अनामलाई पर्वत नीलगिरि पर्वत से मिलता जुलता है। ये परिवर्तित नाइस चट्टानों से बने हैं जिनमें फेल्स्पार और स्फटिक ( क्वार्ट्‌ज़) की पतली धारियाँ यत्रतत्र मिलती हैं और बीच बची में लाल पॉरफोराइट दिखाई पड़ते हैं।

इन पहाड़ियों में आबादी नाममात्र की है। उत्तर तथा दक्षिण में कादेर तथा मोलासर लोगों की बस्ती है। इसके अंचल के कई स्थानों पर पुलियार और मारावार लोग मिलते हैं। इनमें से कादेर जाति के लोगों को पहाड़ों का मालिक कहा जाता है। ये लोग नीच काम नहीं करते और बड़े विश्वासी तथा विनीत स्वभाव के हैं। अन्य पहाड़ी जातियों पर इनका प्रभाव भी बहुत है। मोलासर जाति के लोग कुछ सभ्य हैं और कृषि कार्य करके अपना जीवननिर्वाह करते हैं। मारावार जाति अभी भी घूमने-फिरनेवाली जातियों में परिगणित होती है। ये सभी लोग अच्छे शिकारी हैं और जंगल की वस्तुओं को बेचकर कुछ न कुछ अर्थलाभ कर लेते हैं। पिछलें दिनों यहाँ पर कहवा (कॉफ़ी) की खेती शुरु हुई है। (वि.मु.)

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