अराल सागर, अरल सागर / Aral Sagar

Submitted by Hindi on Thu, 10/28/2010 - 10:31
अराल सागर पश्चिमी एशिया की एक झील अथवा अंतर्देशीय सागर है। इसका नामकरण खिरग़्ज़ी शब्द अरालडेंगिज के आधार पर हुआ है, जिसका अर्थ है द्वीपों का सागर। विश्व के अंतर्देशीय सागरों में, क्षेत्रफल के अनुसार, इसका स्थान चौथा है। इसकी लंबाई लगभग २८० मील और चौड़ाई १३० मील है। इसकी औसत गहराई ५२ फुट है और अधिकतम गहराई पश्चिमी तट की समांतर द्रोणी में २२३ फुट है। इस सागर में जिंहुन अथवा आमू नदी (ऑक्सस) और सिंहुन अथवा सर नदी (याक्सार्टिज) गिरती हैं, जिनसे बड़ी मात्रा में अवसाद (सेंडिमेंट) का निक्षेप होता है। इस सागर के पूर्वी तट के समांतर अनेक छोटे-छोटे द्वीपपुंज विद्यमान हैं।

आंधियों की बहुलता और सुरक्षित स्थानों की कमी के कारण अराल सागर में जलयातायात सुविधाजनक नहीं है। सागरपृष्ठ का शीतकालीन ताप लगभग ३२० फा. रहता है, यद्यपि अधिकांश तटीय भाग हिमाच्छादित हो जाता है। गर्मी में ताप लगभग ८०० फा. रहता है। सागरसमतल की घट-बढ़ महत्वपूर्ण है, परंतु ब्रीकनर के ३५ वर्षीय चक्र से इसका कोई संबंध नहीं है। यह प्राचीन धारणा कि यह सागर कभी-कभी लुप्त हो जाया करता है, पूर्णतया निराधार है। अराल सागर में मीठे पानीवाली मछलियाँ पाई जाती हैं। यहाँ मछली उद्योग कैस्पियन सागर की तुलना में कम महत्व का है। अराल सागर के तटवर्ती प्रदेश प्राय: निर्जन हैं। (रा.ना.मा.)

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अराल सागर


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अरल सागर या अराल सागर


अरल सागर या अराल सागर (कज़ाख़: Арал Теңізі, उज़्बेक: Orol dengizi, रूसी: Аральскοе мοре, ताजिक/फ़ारसी: दरिय(ओचा)-ए-खवारज़्म) मध्य एशिया में स्थित एक झील जिसके बड़े आकार के कारण इसे सागर कहा जाता है, पर अब दिनोदिन इसका आकार घटता जा रहा है। स्थानीय भाषाओं में इसका शाब्दिक अर्थ है द्वीपों की झील जो इस झील में एक समय पर दिखने वाले लगभग 1500 टापुओं के आधार पर नामांकित थी। 1960 में सोवियत प्रशासन ने इसमें विसर्जित होने वाली दो नदियों - आमू और साइर नदी को मरुभूमि सिंचाई के लिए विमार्गित करने का निर्णय लिया जिसके बाद से ये तीन अलग-अलग भागों में बंट गया। जिसके फलस्वरूप आने वाले 40 सालों में अराल सागर का 90 प्रतिशत जल खत्म हो गया तथा 74 प्रतिशत से अधिक सतह सिकुड़ गई और इसका आकार 1960 के इसके आकार का सिर्फ 10 प्रतिशत ही रह गया है।

क्षेत्रफल


एक समय इसका क्षेत्रफल लगभग 68,000 वर्ग किलोमीटर था। इसके बाद 2007 तक यह अपने मूल आकार के 10 प्रतिशत पर आ गया है। पानी की लवणता में वृद्धि हो रही है और मछलियों का जीवन असंभव हो गया है। 1960 के बाद के दशकों में सूखे के कारण और पानी मोड़ने के लिए बनाई गई नहरों के कुप्रबंधन के चलते अराल सागर की तट रेखा में भी काफी कमी देखी गई, जहाँ बड़ी नौकाएँ चलती थीं, वहाँ रेगिस्तान नजर आने लगा था। लेकिन इस सबके एवज में उज्बेकिस्तान दुनिया के प्रमुख कपास निर्यातकों में गिना जाने लगा है, जो एक समय सोवियत संघ की योजना थी।

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