मनरेगा, जो मन में आए करो!

Submitted by Hindi on Mon, 12/06/2010 - 12:23
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चौथी दुनिया

उत्तर प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना (मनरेगा) ग़रीबों के लिए केंद्र सरकार की खास योजना है। लेकिन अधिकारियों ने इसे अपनी तरह से चलाने की मनमानी शुरू कर दी है। इस समय प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों के मन में जो आ रहा है वही, इस योजना के लिए भेजे गए फंड के साथ किया जा रहा है। हालांकि राहुल गांधी द्बारा इसमें हो रही लूट की ओर इशारा करने के बाद मायावती ने कुछ अधिकारियों के ख़िला़फ कार्रवाई की है। इससे कांग्रेस के आरोपों की सच्चाई अपने आप प्रमाणित हो जाती है। मनरेगा से जुड़े कुछ उदाहरण देखिए।

मुख्यमंत्री मनरेगा में भ्रष्टाचार करने वालों को जेल भेजने की जो बात कह रही हैं वह स़िर्फ दिखावा है। अगर उनमें ज़रा भी नैतिकता हो तो इन प्रकरणों में कार्रवाई करें। वह केवल बातें करती रहती हैं। बाराबंकी में इंदिरा नहर पर मनरेगा के तहत हो रहे काम को इस समय भी देखा जा सकता है जहां नहर की पटरी की मरम्मत के नाम करोड़ों के वारे- न्यारे हुए हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह की मांग हैं कि मनरेगा में भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों की सेवाएं समाप्त होनी चाहिए और उनके द्वारा किए गए घपलों की वसूली उनके वेतन से होनी चाहिए। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को आमतौर पर निलंबित भर किया जाता है और कुछ दिन बाद उसकी तैनाती अन्यत्र कर दी जाती है किंतु निलंबन कोई दंड नहीं है।

उन्नाव में मनरेगा के पैसे से 972 डिजिटल कैमरे ख़रीद लिए गए हैं। चित्रकूट, जो ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद का ज़िला है, में भी 700 कैमरों की ख़रीदारी दिखाई गई है। महोबा में 247 आलमारी, बांदा में दो करोड़ रुपए की मेज-कुर्सी, सिद्धार्थनगर में 1,210 शिक़ायत पेटिकाओं की ख़रीददारी भी मनरेगा के पैसे से की गई है।

कानपुर देहात में तो कमाल ही हो गया जहां दलितों में वितरित करने के लिए ढाई करोड़ रुपये का सब्जी का हाईब्रिड बीज ख़रीद डाला गया। महाराजगंज में एक एनजीओ को 50 लाख रुपये प्रचार-प्रसार के लिए दे दिए गए। औरेया में 55 लाख के ट्री-गार्ड ख़रीदे गए, पर मौक़े पर एक भी नहीं मिला। गोंडा में मनरेगा गाइड लाइन के विपरीत तीन साल में 17 करोड़ रुपये की ख़रीदारी की गई। एक करोड़ का तो स़िर्फ खिलौना ख़रीदा गया। 50 लाख के बाल्टी-मग, 75 लाख की बांस बल्ली जैसी चीजों की ख़रीद के बावजूद कोई बड़ा अधिकारी इस बर्बादी की ओर गंभीरता से विचार नहीं कर रहा है। कांग्रेस मनरेगा सेल के संयोजक संजय दीक्षित व प्रवक्ता द्विजेंद्र त्रिपाठी ने चुनौती देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री मनरेगा में भ्रष्टाचार करने वालों को जेल भेजने की जो बात कह रही हैं वह स़िर्फ दिखावा है।

अगर उनमें ज़रा भी नैतिकता हो तो इन प्रकरणों में कार्रवाई करें। वह केवल बातें करती रहती हैं। बाराबंकी में इंदिरा नहर पर मनरेगा के तहत हो रहे काम को इस समय भी देखा जा सकता है जहां नहर की पटरी की मरम्मत के नाम करोड़ों के वारे- न्यारे हुए हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह की मांग हैं कि मनरेगा में भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों की सेवाएं समाप्त होनी चाहिए और उनके द्वारा किए गए घपलों की वसूली उनके वेतन से होनी चाहिए। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को आमतौर पर निलंबित भर किया जाता है और कुछ दिन बाद उसकी तैनाती अन्यत्र कर दी जाती है किंतु निलंबन कोई दंड नहीं है। लोक निर्माण विभाग को मनरेगा के तहत चालू वित्त वर्ष में 806 करोड़ रुपये के काम करने थे लेकिन लोक निर्माण विभाग ने मात्र 56 करोड़ रुपये के ही काम कराए हैं।

वर्ष 2009-10 में लोक निर्माण विभाग को डा। अंबेडकर ग्राम विकास योजना, तटबंध, पटरी, पुलिया आदि के कार्य मनरेगा से कराने के लिए 800 करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया गया था। विभिन्न कार्यो के लिए विभाग के 20 खंडों के मनरेगा से जो धनराशि उपलब्ध कराई गई है उसमें से भी 10 फीसदी से ज़्यादा नहीं ख़र्च की गई है। इनमें निर्माण खंड बिजनौर व गौतमबुद्धनगर में तो बिल्कुल काम नहीं हुए। काम में इस तरह की लापरवाही पर विभागीय अभियंताओं के अपने तर्क हैं। वे कहते हैं कि उच्च स्तर से लक्ष्य चाहे जो तय कर दिया जाए, सच्चाई यह है कि विभाग से कोई कार्य कराना ही नहीं चाहता है।

काग़ज़ों की बाज़ीगरी में उत्तर प्रदेश का प्रशासन सुर्ख़ियों में रहा है। अपनी तिकड़म से इसने काग़ज़ों में एक साल में 51 हज़ार शिक्षित बेरोज़गार घटाएं हैं।

राजधानी लखनऊ तथा मंडल के अंतर्गत आने वाले जनपदों में मनरेगा के अंतर्गत लघुसिंचाई, वन, उद्यान, लोक निर्माण, कृषि, रेशम, मत्स्य, पंचायती राज तथा ग्रामीण अभियंत्रण सेवा विभाग में फरवरी खर्च के आंकड़े भी सरकार की कलई खोल देते हैं।

मनरेगा में रिश्वतखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति से चिंतित मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि मनरेगा में जो रिश्वत ले और योजना का पैसा ख़ुद खाए ऐसे लोगों को जेल भेजना चाहिए लेकिन अभी मनरेगा में घोटाला करने वाला एक भी अधिकारी/कर्मचारी जेल नहीं भेजा गया है। स्वागतयोग्य एक काम यह ज़रूर हुआ है कि न्यायपालिका ने स्वयं सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण की पहल करके बुंदेलखण्ड के बांदा जनपद में ज़िला जज सुरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ग्राम्य पंचायत स्तर पर शिविर लगाकर जागरूकता का ज़िम्मा लिया है। इतना ही नहीं गांवों में ही लोक अदालत लगाकर इससे संबंधित समस्याएं भी निस्तारित की जा रही हैं।

 

 

राहुल के निशाने पर मनरेगा की कार्यप्रणाली


मनरेगा के तहत सुलतानपुर जनपद में काम करने वाला स्वयं सेवी संगठन 88 लाख रुपये लेकर ग़ायब है। एक लाख 23 हज़ार जॉब कार्ड में केवल 11495 मज़दूर परिवारों को सौ दिन का रोज़गार उपलब्ध कराया जा सका है। इन तथ्यों के सामने आते ही स्थानीय सांसद तथा कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ज़िलास्तरीय सतर्कता एवं अनुश्रवण समिति की अध्यक्षता करते हुऐ बिफर पड़े। राहुल गांधी ने मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर गहरी नाराज़गी व्यक्त की।

मनरेगा योजना से जुड़े धन आवंटन में अनियमितता के एक मामले में राहुल गांधी ने केंद्र सरकार की एक कमेटी से जांच कराने का निर्णय सुनाया तो ज़िला अनुश्रवण एवं सतर्कता समिति में बतौर सदस्य उपस्थित बसपा प्रतिनिधियों ने विरोध जताया। मनरेगा और ग़रीबों को आवास के मसले पर भी कांग्रेस और बसपा सदस्यों के बीच विवाद हुआ। मनरेगा योजना को लेकर राहुल गांधी की नाराज़गी की वजह केवल दस फीसदी लोगों को रोज़गार मिलना है। जब राहुल गांधी ने मनरेगा पर कड़ा रुख़ अपनाया तो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने भी मनरेगा के क्रियान्वयन में अनियमितता की शिक़ायतों पर कार्रवाई का साहस दिखाया।

उन्होंने चित्रकूट और सुल्तानपुर जनपदों के तत्कालीन ज़िलाधिकारियों के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही करने तथा जनपद महोबा एवं चित्रकूट के तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारियों को निलंबित करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने जनपद सुल्तानपुर के तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी को आरोप पत्र देकर विभागीय कार्यवाही करने तथा जनपद गोण्डा, बलरामपुर, महोबा, सुल्तानपुर तथा चित्रकूट के अन्य दोषी अधिकारियों को निलंबित करते हुए जांच के निर्देश जारी किए हैं। मायावती ने कहा है कि मनरेगा के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को सख्त हिदायत दी है कि मनरेगा के तहत अवस्थापना एवं विकास कार्यों को पूरी ईमानदारी से अंजाम दें। उन्होंने कहा कि ग़रीबों के रोज़गार से जुड़ी इस योजना में प्रदेश सरकार किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीरता से लेगी।

ज्ञातव्य है कि मुख्यमंत्री के आदेश पर प्रत्येक तहसील स्तर पर मनरेगा के अंतर्गत किए जा रहे कार्यों के अनुश्रवण के लिए निगरानी समिति गठित की गई थी। इसके अलावा समय-समय पर उच्चाधिकारियों द्वारा भी स्थलीय भ्रमण करके मनरेगा के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यों के निरीक्षण की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री ने मनरेगा एवं अन्य विकास कार्यों का थर्ड पार्टी सत्यापन के भी आदेश दिए हैं।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर मनरेगा कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न स्रोतों से प्राप्त शिक़ायतों की जांच कराई गई। जांच के फलस्वरूप जनपद गोण्डा के तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी श्री राज बहादुर को निलंबित कर विभागीय कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त परियोजना निदेशक श्री जी.पी0.गौतम, नाज़िर/सहायक लेखाकार श्री सुधीर कुमार सिंह, लेखाकार श्री अवधेश कुमार सिंह तथा संख्या सहायक श्री दुर्गेश मिश्रा को तात्कालिक प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

 

 

 

 

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Comments

Submitted by Anonymous (not verified) on Sun, 08/10/2014 - 17:55

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हमारे देश में भ्रष्टाचारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि एक ओर बलरामपुर [ उत्तर प्रदेश ] में मनरेगा में भीषण भ्रष्टाचार की जाँच सीबीआई द्वारा की जा रही है , वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचारियों का भ्रष्टाचार भी पूर्व की भांति जारी है | अब भ्रष्टाचारियों ने सरकारी धन की लूट के लिए हैरतअंगेज तौर – तरीक़े ईजाद कर लिए हैं | ज़िले के सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग के बनकटवा रेंज में मनरेगा भ्रष्टाचार का जो मामला सामने आया है , वह बड़ी कूट – रचना और धन हड़पने के व्यापक स्वरूप की ओर इंगित करता है |प्राप्त विवरण के अनुसार , ग्रामीण मज़दूरों से वन अधिकारियों ने महीनों काम लेकर उन्हें लाखों रुपये मज़दूरी नहीं दी और जिन लोगों ने काम किया ही नहीं उनसे जॉब कार्ड और पास बुक लेकर उन्हें भुगतान कराया और उनसे बैंक से रूपये निकलवाकर उन्हें नाममात्र की धनराशि देकर शेष पूरी धनराशि वनाधिकारियों ने ले ली | उदाहरण के रूप में ग्राम – टेंगनवार निवासी पेशकार नामक ग्रामीण के बैंक अकाउंट में अट्ठारह सौ रूपये डाले गये और उससे यह पूरी धनराशि निकलवायी गयी | वनाधिकारियों व कर्मचारियों ने उसे तीन सौ रूपये दिए और डेढ़ हज़ार रूपये ख़ुद डकार गये | इस प्रकार बिना काम किये पेशकार को तीन सौ रूपये मिल गये और जिन्होंने कई महीने तक काम किये , वे मजदूर अपनी मज़दूरी पाने के लिए दर – दर भटक रहे हैं | उन्हें दो जून खाने के लाले पड़ गये हैं |

Submitted by satishkumar (not verified) on Sat, 06/11/2016 - 09:05

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very good yojana

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