कोप 16 : कोपेनहेगन की ही राह पर कानकुन

Submitted by admin on Tue, 12/07/2010 - 12:22
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लेकिन पंद्रह वर्षों की बैठकबाजी और कम से कम आठ बार संधि का प्रारूप बनने और बिगड़ने के बावजूद कोई ऐसा सर्वमान्य दस्तावेज तैयार नहीं हो पाया जिस पर जमा हुए देश अपनी मुहर लगा सके। अमेरिका जहां जलवायु परिवर्तन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी लेते हुए वैज्ञानिकों द्वारा सुझाए जा रहे कार्बन कटौती के लक्ष्यों को स्वीकार करने को तैयार नहीं था वहीं चीन जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के उपायों की स्वतंत्र जांच के लिए तैयार नहीं था। दुनिया का चालीस प्रतिशत से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले ये दोनों ही देश क्योटो संधि जैसे बाध्यताकारी लक्ष्यों को मानने को तैयार नहीं थे। अंतत: मेजबान डेनमार्क ने अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे कुछ बड़े देशों और गुटों के नेताओं की गुपचुप बैठक करा समझौते का मसौदा तैयार कर उसे डेढ़ सौ से अधिक देशों पर थोप दिया। विकासोन्मुख देशों के गुट जी 77 के प्रतिनिधि ने इस पर गहरा रोष जताया था।

कोपेनहेगन समझौते की सबसे अहम बात शायद यह थी कि धनी, विकसित देशों ने गरीब विकासोन्मुख देशों को 2012 तक हर साल दस अरब डॉलर की अतिरिक्त सहायता देने का वचन दिया जिसे 2020 तक बढ़ा कर 100 अरब डॉलर सालाना तक पहुंचा दिया जाएगा। जंगलों का कटान रोकने के लिए धन उपलब्ध कराने और विकासोन्मुख देशों को स्वच्छ ऊर्जा तकनीक हस्तांतरण का वादा भी किया गया था। दुनिया ने पहली बार स्वीकारा कि औसत तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस अधिक बढ़ने से रोकना होगा। लेकिन इस लक्ष्य के लिए किसी देश के कार्बन उत्सर्जन पर कोई सीमा नहीं लगाई गई। क्योंकि सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक अमेरिका, भारत और ब्राजील जैसे विकासोन्मुख देशों से तो कार्बन सीमा निर्धारित करने की मांग कर रहा था लेकिन स्वयं कोई बाध्यताकारी सीमा मानने के लिए तैयार नहीं था।

अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति ओबामा का कार्बन विधेयक ठुकरा दिया है इसलिए संभव है वह कानकुन सम्मेलन में शिरकत न करें। ओबामा की तरह ही चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ भी शायद ही आएं क्योंकि न तो वे किसी ऐसे समझौते में बंधना चाहते हैं जो चीन को कार्बन गैसें घटाने को बाध्य करे और न अपनी कार्बन कटौती के कदमों की स्वतंत्र जांच को तैयार हैं। चीन अब दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषणकारी देश बन चुका है, परंतु वह अमेरिका को प्रदूषण घटाने पर बाध्य करने पर अड़ा है। विकासोन्मुख देशों की ओर से बोलते हुए दक्षिण अमेरिकी देश बोलिविया के संयुक्त राष्ट्रदूत ने कहा है, अमेरिका और चीन जैसे देशों ने दुनिया का भविष्य बंधक बना रखा है और वे संयुक्त राष्ट्र को कमजोर कर रहे हैं। पर क्या अमेरिका और चीन को इसकी परवाह है ?

जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए यूरोप के लोग अमेरिका और चीन की तुलना में अधिक सजग और चिंतित हैं। लेकिन वे इन दिनों आयरलैंड, ग्रीस, स्पेन और पुर्तगाल के ऋण संकट और उसकी वजह से साझी मुद्रा यूरो पर मंडराते संकट से जूझ रहे हैं। इसलिए कोपेनहेगन समझौते के तहत कार्बन उत्सर्जन में 2020 तक 1990 की तुलना में 30 प्रतिशत तक की कटौती की बात स्वीकारने के बावजूद शायद ही वे कानकुन का रुख करें। बहरहाल, 194 देशों के पर्यावरण मंत्री और अधिकारी जरूर सोलहवें जलवायु सम्मेलन में भाग लेने के लिए मैक्सिको के सैलानी शहर कानकुन पहुंच गए हैं।

कोपनहेगन में हुए पंद्रहवें जलवायु सम्मेलन के राजनीतिक घोषणा पत्र के अंतिम प्रारूप में कहा जाने वाला था कि 2012 से 2020 के बीच कार्बन उत्सर्जन की सीमा निर्धारित करने के लिए एक बाध्यताकारी संधि कानकुन सम्मेलन से पहले तैयार कर ली जाएगी लेकिन अंतिम घड़ी में इस वाक्य को भी घोषणा पत्र से निकाल दिया गया था। फिर भी, घोषणा पत्र की शब्दावली का यही आशय लिया जा रहा था कि जो बाध्यताकारी संधि कोपेनहेगन में नहीं हो सकी थी, उसे कानकुन में हासिल कर लिया जाएगा। लेकिन कानकुन की संधि का सपना भी कार्बन बिल पास कराने में राष्ट्रपति ओबामा की नाकामी, यूरोप के ऋण संकट और चीनी-अमेरिकी द्वंद्व की भेंट चढ़ गया लगता है। कानकुन जलवायु सम्मेलन की तैयारी के लिए इस साल जर्मनी के बॉन और चीन के तियांजिन शहर में हुई वार्ताओं में चीन और अमेरिका के बीच पहल और पारदर्शिता को लेकर कोपेनहेगन से चले आ रहे गतिरोध को तोड़ा नहीं जा सका है। इसलिए कानकुन संधि की बात अब कोई नहीं कर रहा।

लेकिन जलवायु परिवर्तन का पहिया तेजी से घूम रहा है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हुई एक संगोष्ठी में मौसम विशेषज्ञों ने चेताया है कि कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए विभिन्न देशों की अब तक की गई घोषणाएं देखते हुए वायुमंडल के पारे को 4 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ने से नहीं रोका जा सकेगा जिस कारण उत्तरी ध्रुव की बर्फ पिघल जाएगी और दक्षिणी ध्रुव की पश्चिमी पट्टी गायब हो जाएगी। अगले 90 सालों के भीतर लगभग एक अरब लोगों के घर-बार डूब सकते हैं। इसके प्रमाणस्वरूप इसी साल की घटनाओं पर नजर दौड़ाना काफी है। रूस और मध्य एशिया में इतिहास की सबसे भयंकर गर्मी पड़ी और तापमान एक महीने तक औसत से 7.8 सेल्सियस ऊपर रहा। ब्रिटेन और यूरोप में शीत लहर के रिकॉर्ड टूटे हैं। अगस्त में अमेरिका के मैनहैटन द्वीप से चार गुना बड़ा हिमखंड ग्रीनलैंड के ग्लेशयिर से टूट कर समुद्र में जा गिरा था। अमेरिका के 158 मौसम केंद्रों में इसी साल 1895 के बाद के सबसे ऊंचे तापमान दर्ज हुए और सिंध नदी की प्रलयंकारी बाढ़ में पाकिस्तान का लगभग पांचवा हिस्सा डूब गया।

ब्रिटेन और अमेरिका के वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन में तीन चौथाई हाथ उन कार्बन गैसों का है जो हमने वायुमंडल में छोड़ी हैं। इसके बावजूद अमेरिका के सांसद और नेता कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने वाले बिल पर बात करने को तैयार नहीं हैं। संसदीय चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की भारी जीत ने राष्ट्रपति ओबामा के इस काम को लगभग असंभव सा बना दिया है। इसलिए नेता से पर्यावरण-चेता बने अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर ने निराशा से कहा, 'मैं कानकुन को लेकर थोड़ा उदास हूं। समस्या और गंभीर होती जा रही है।' जबकि जलवायु परिवर्तन का वैज्ञानिक आकलन करने वाली संयुक्त राष्ट्र संस्था आईपीसीसी के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र पचौरी का कहना है, 'हमें कुछ कदम तो उठाने ही होंगे वर्ना संयुक्त राष्ट्र से लोगों का भरोसा ही उठ जाएगा।' शायद इसी को ध्यान में रखकर 194 देशों के पर्यावरण मंत्री कानकुन सम्मेलन में विकासोन्मुख देशों के लिए 100 अरब डॉलर सालाना का जलवायु कोष बनाने, प्राकृतिक वनों को बचाने की व्यवस्था करने और विकासोन्मुख देशों को स्वच्छ तकनीक के हस्तांतरण की व्यवस्था करने वाली संधियों पर सहिमत जुटाने की कोशिश करेंगे।

वायुमंडल के पारे का चढ़ना 2020 तक रोकने और उसके लिए विकसित व विकासोन्मुख देशों के कार्बन उत्सर्जनों पर बाध्यताकारी सीमा लगाने वाली संधि का काम अगले साल दक्षिण अफ्रीका में होने जा रहे सत्रहवें जलवायु सम्मेलन के लिए छोड़ दिया गया है। यानी तय है कि तब तक अमेरिका और चीन वायुमंडल को गर्म करते रहेंगे और एंडीज और हिमालय पर्वतमालाओं के ग्लेशियर छीजते रहेंगे। लोग सूखे-बाढ़ और शीत-ग्रीष्म लहरों की मार झेलते रहेंगे। लेकिन अमेरिका सांसद और चीन के शासक अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहेंगे।
 

 

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