कानकुन का हासिल

Submitted by Hindi on Sat, 12/18/2010 - 10:24
Source
अमर उजाला 17 दिसम्बर 2010


कानकुन का शाब्दिक अर्थ है ‘सांप की पिटारी’। तीन साल पहले अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन की बैठक में इस पिटारी से व्यापार साम्राज्यवाद का पहला संस्करण निकला था। 16वें वैश्विक जलवायु सम्मेलन के अवसर पर इस पिटारी से ताप साम्राज्यवाद का दूसरा संस्करण प्रकट हुआ है। पश्चिमी देश खासकर अमेरिका अपने ऊपर कार्बन डाई ऑक्साइड कम करने का बंधन नहीं चाहते, यद्यपि क्योटो प्रोटोकॉल के तहत दुनिया के 40 देशों को 2008-12 की अवधि में ग्रीनहाउस गैस का स्तर कम कर 1990 के स्तर तक ले जाना है। हालांकि कानकुन में संपन्न हुए सम्मेलन में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के बीच विकसित राष्ट्रों द्वारा वर्ष 2020 तक 25 से 40 प्रतिशत तक उत्सर्जन कम करने का झिलमिल समझौता हुआ है। लेकिन गैस उत्सर्जित करने वाले सबसे बड़े देश अमेरिका ने वर्ष 2020 तक उत्सर्जन में 2005 के स्तर से केवल 17 फीसदी कमी करने का वायदा कर सम्मेलन के लक्ष्य को फीका कर दिया। चीन भी इस प्रकार के समझौते के प्रति उदासीन है। विकासशील देशों के आंसू पोंछने के लिए केवल 10 अरब डॉलर के हरित कोष की स्थापना की बात कही गई, जो गैस उत्सर्जन की कमी कर रहे देशों को तकनीक के साथ-साथ अन्य विकल्प भी सुझाएगा।

गौरतलब है कि 2008 में जलवायु परिवर्तन पर विकसित राष्ट्रों ने नेतृत्व प्रदान करते हुए 2050 तक कार्बन उर्त्सजन में 50 प्रतिशत कमी करने का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन उसे भी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने एक तरह से अनदेखा ही कर दिया था। गौर से देखा जाए, तो विकसित राष्ट्रों का मंतव्य 1990 के क्योटो प्रोटोकोल से अलग नहीं है, जिसमें कहा गया था कि 2020 तक विकसित राष्ट्र अपने कार्बन उत्सर्जन में 5.2 प्रतिशत की कमी करेंगे। लेकिन अमेरिका और क्योटो प्रोटोकॉल के सबसे बड़े पैरोकार जापान ने गैस उत्सर्जन में कटौती करने का वायदा नहीं निभाया। हैरत की बात है कि यूरोपीय देश उपदेश दे रहे हैं कि, यदि भारत, चीन और ब्राजील गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित कर लें, तो वे अपना उत्सर्जन स्तर 2020 तक 20 प्रतिशत और 2030 तक 30 प्रतिशत कम कर देंगे। भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन अभी मात्र 0.87 टन है। यह अमेरिका के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का चार प्रतिशत, जर्मनी का आठ प्रतिशत, इंग्लैंड का नौ प्रतिशत और जापान का 10 प्रतिशत है। ऐसे में विकसित देशों के उपदेश पर सिर्फ हंसा जा सकता है। भारत का यह तर्क उचित है कि विकासशील देश होने के नाते अभी उसे औद्योगिक विकास की आवश्यकता है।

कानकुन सम्मेलन में विकसित राष्ट्रों की मंशा कुछ और ही थी। दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक देशों के समूह जी-आठ की यह बैठक मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के बहाने बहुत बड़े पूंजी निवेश से तैयार की गई मशीनरी को बेचने के लिए बाजार ढूंढने के लिए आयोजित थी। सर्वाधिक उत्सर्जन विकसित देश ही कर रहे हैं। अब विकासशील देशों की बारी आई, तो वे परेशान भी हुए और उन्हें एक नया बाजार भी दिखा। स्वच्छ तकनीक के नाम पर इन देशों ने नए-नए उपकरण, नई-नई मशीनें तैयार की हैं, लेकिन ये बिकें कैसे, इसके लिए रास्ता ढूंढा जा रहा था। पहले हेपेटाइटिस के नाम पर डराकर दुनिया भर में इसके इंजेक्शन बेचे गए। इसी तरह अब स्वच्छ तकनीकी बेची जाएगी। इस पर भारत का पक्ष था कि बिना बौद्धिक संपदा अधिकार के मशीनरी न ली जाएं, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण मशीनरी बेचने वाले देशों का भी उतना ही कर्तव्य है, जितना खरीदने वालों का।

कायदे से गैस प्रतिरोधी उपाय अपनाने का सबसे ज्यादा दबाव अमेरिका और चीन पर होना चाहिए। लेकिन अमेरिका इस पर अड़ा रहा है कि चीन और भारत पर भी अंकुश लगाना चाहिए। उसका तर्क है कि दोनों विकासशील देश इन गैसों के उत्सर्जन में और आगे बढ़ेंगे, वे विकास की दौड़ में तेजी से अग्रसर हैं। ग्रीनहाउस उत्सर्जन की बड़ी मात्रा ऊर्जा निर्माण के लिए जलने वाले ईंधन के कारण है। इसके लिए औद्योगिक देश ही जिम्मेदार हैं, लेकिन उनके लिए उत्सर्जन में कमी करना मुश्किल है। वर्ष 1997 में धनी देश उत्सर्जन में छोटी कटौती पर सहमत हो गए थे, लेकिन वे उस पर अमल नहीं कर सके। वर्ष 1990 से 2005 के बीच इन देशों का उर्त्सजन 11 प्रतिशत बढ़ा है, वहीं इसके लिए विकास में प्रयुक्त ईंधन की बढ़ोतरी 15 फीसदी तक हुई है। ऑस्ट्रेलिया का कार्बन उत्सर्जन 37 प्रतिशत बढ़ा और अमेरिका का 20 फीसदी। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े उद्योगों का उत्सर्जन 24 प्रतिशत बढ़ा, जबकि यातायात जनित उत्सर्जन 28 फीसदी।

कानकुन सम्मेलन ने तीन अनुत्तरित सवाल अपने पीछे छोड़ दिए। पहला तो यही कि विकासशील देशों में उत्सर्जन कम करने की निगरानी तभी संभव होगी, जब कटौती के लिए पश्चिमी देश पैसा देंगे। दूसरा यह है कि क्योटो प्रोटोकॉल का भविष्य क्या होगा? इसके भविष्य को लेकर सर्वाधिक विवाद है। इसमें विकसित देशों से 2012 तक उत्सर्जन कम करने के लिए कहा गया था, पर समझौते में क्योटो प्रोटोकॉल 2012 के बाद बढ़ाने की बात नहीं थी। तीसरा प्रश्न यह कि विकसित देशों के लिए लक्ष्य कैसे निर्धारित होंगे। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए विकसित देशों के लक्ष्य को लेकर अस्पष्टता है। समझौते का विरोध करने वाले एकमात्र देश बोलीविया ने भी अमीर देशों से 2017 तक उत्सर्जन को 1990 के स्तर से आधा करने की मांग की।

ऐसे में, कहा जा सकता है कि बाजार पर कब्जा करने की होड़ में ताप साम्राज्यवाद ने पृथ्वी को जीने लायक नहीं छोड़ा। जब तक विकसित मुल्क अपनी जीवन शैली व उपभोक्तावादी सोच नहीं छोड़ेंगे, तब तक विकासशील देश केवल तकनीकी बदलाव से उत्सर्जन कम करने में सफल नहीं होंगे
 

 

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