विपदा की बरसात

Submitted by Hindi on Sat, 01/01/2011 - 09:44
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पूरे उत्तराखण्ड में बरसात तबाही बनकर बरसी। पहाड़ी इलाकों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। सबसे भयावह मंजर रहा कुमाऊं में। अल्मोड़ा जिले के बल्टा तथा देवली गांव में कई घर उजड़ गए। अल्मोड़ा शहर में पचास से अधिक मकान ढह गए हैं। गढ़वाल में टिहरी बांध में पानी बढ़ने के कारण पच्चीस गांव डूब गए है। चारधाम यात्रा मार्ग जगह-जगह धंस जाने से तकरीबन पांच सौ यात्री फंसे हुए हैं। गांव के गांव उजड़ गए हैं। पूरे पहाड़ में कोई ऐसी जगह नहीं बची है जहां प्रकृति के कहर ने अपना निशान न छोड़ हो। पूरा राज्य सड़क संपर्क मार्ग से कट गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश भर में 172 से अधिक लोगों की मौत हो गई। दस हजार से अधिक मकान जमींदोज हो गए। पचास हजार क्षतिग्रस्त हुए हैं। लोग द्घर छोड़ सुरक्षित स्थानों की तलाश में भटक रहे हैं। कहीं सरकारी स्कूल-कॉलेज सहारा बने हैं तो कहीं प्रशासन टेंट एवं नाकाफी सहायता राशि बांट रहा है। लेकिन एक साथ आई इतनी बड़ी आपदा से निपटने के लिए शासन-प्रशासन के संसाधन छोटे पड़ गए हैं। मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने राहत राशि की द्घोषणा के साथ केंद्र से मदद की गुहार लगाई तथा राज्य को आपदाग्रस्त द्घोषित करने की मांग की है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरफ से सहायता के लिए पांच सौ करोड़ की राशि देने की द्घोषणा हो गई है। यूपीए अआँयक्ष सोनिया गांधी तथा रक्षा मंत्री ने राज्य का हवाई सर्वेक्षण भी कर लिया है। इस सबके बाद भी पूरे पहाड़ में संपर्क मार्ग कट जाने के चलते लोग खाद्यान्न संकट से जूझ रहे हैं। द्घरों से बेद्घर हो गए लोगों का और बुरा हाल है। लेकिन इनके पास सरकारी मदद के इंतजार के अलावा कोई रास्ता नहीं। ध्वस्त सड़कों से सरकारी मदद पहुंचाने में कितना वक्त लगेगा यह कहा नहीं जा सकता ।

उत्तराखण्ड में इस साल की बरसात कई परिवारों को अपने सैलाब में बहा ले गई। क्या गांव क्या शहर बारिश के कहर ने किसी को नहीं बख्शा। कई द्घर जमींदोज हो गए। मकानों में दरारें आ गईं। सरकारी स्कूल क्या बड़े-बड़े गैरसरकारी स्कूल के भवनों पर बरसात और भू-स्खलन का असर पड़ा। लोग दहशत में अपने द्घर छोड़ आसरे की तलाश में यहां वहां भटक रहे हैं। पहाड़ से लेकर तराई तक बारिश, भू-स्खलन एवं उफनती नदियों से जन-जीवन तहस-नहस हो गया। पूरे राज्य में बरसात से हुई तबाही ने 172 से अधिक लोगों की जान ले ली। दौ सौ से अधिक द्घायल हैं। दस हजार मकान जमींदोज हो गए हैं। पचास हजार द्घर क्षतिग्रस्त हैं। तेरह सौ मवेशी बाढ़ में बह गए। बाइस हजार हेक्टेयर कूषि भूमि नदी-नालों की भेंट चढ़ गई। सड़क, रेल से लेकर पैदल मार्ग तक इस बारिश से नहीं बचे हैं।अनुमान है कि अब तक 95 लाख लोग वर्षा के कारण आई आपदा से प्रभावित हुए हैं। कई हजार लोग बेद्घर हो गए हैं। प्रदेश की करीब बारह सौ सड़कों के ध्वस्त हो जाने से आवाजाही ठप हो गयी। बारिश एवं भू-स्खलन ने करीब पैतीस सौ गांवों की पच्चीस सौ पेयजल योजनाओं को ध्वस्त कर दिया। बरसात से उपजी इस आपदा से उबरने में पहाड़वासियों को लंबा समय लगेगा। लेकिन इस समय उनके सामने विस्थापन के साथ खाद्यान्न संकट मुंह बाए खड़ा है। अनाज, केरोसिन एवं सब्जियों के साथ दवाइयों एवं रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं सड़क मार्ग बाधितहोने के कारण यहां नहीं पहुंच पा रही हैं। सैकड़ों यात्री चारधाम यात्रा मार्ग में फंसे हुए हैं। लगातार बारिश के चलते उन तक राहत पहुंचाने में प्रशासन को मुश्किल हो रहा है।

मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर लोगों को हर संभव मदद के साथ ही मृतकों को एक-एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने की द्घोषणा की है। 21 सितम्बर को यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा रक्षामंत्री एके एंटनी ने उत्तराखण्ड के बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य के लिए पांच सौ करोड़ की राशि देने की द्घोषणा की है। लेकिन प्रदेश के मौजूदा हालात में ये सरकारी दौरे, द्घोषणाएं आदि कहीं राहत देती नहीं लगती। मुख्यमंत्री निशंक ने पहले केन्द्र सरकार से पांच हजार करोड़ की राहत राशि की मांग की थी। जिसे प्रधानमंत्री ने स्वीकृत कर लिया। लेकिन अब मुख्यमंत्री ने आपदा का जमीनी स्तर पर जायजा लेने के बाद केन्द्र से 21 हजार करोड़ रुपए की मांग की है।

कई दिनों से लगातार हो रही बारिश से पूरे उत्तराखण्ड का जन-जीवन अस्त- व्यस्त हो गया है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित कुमाऊं क्षेत्र हुआ है। अल्मोड़ा में बल्टा तथा देवली में 27 जानें चली गई हैं। नैनीताल जिले में 13 लोग भू-स्खलन की चपेट में आ गये। इस बार प्रकूति की मार ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में ही नहीं पड़ी बल्कि इसकी जद में शहरी इलाके भी आ गए हैं। अकेले अल्मोड़ा शहर में पचास मकान टूट गए हैं। चौखुटिया में रामगंगा नदी के पानी तथा द्वाराहाट के बाजार में द्घुस आये पानी ने लोगों को अपने द्घरों में कैद रहने को मजबूर कर दिया। कुथलाड नदी ने कई गांवों को अपनी चपेट में ले लिया। नदियों के रास्ते बदलने से सैकड़ों द्घर पानी में जलमग्न हो गए। खेती चौपट हो गई। स्थानीय लोगों की मानें तो पिछले ढाई दशक के इतिहास में आसमान से बारिश के रूप में इतनी आफत कभी नहीं बरसी।

कुमाऊं के नैनीताल, रानीखेत, द्वाराहाट, चौखुटिया, अल्मोड़ा, बागेश्वर और पिथौरागढ़ में लोगों को बरसात के साथ अनाज संकट से भी जूझना पड़ रहा है। राशन की दुकान पहले से ही बंद है। रही सही कसर बाजारों में बंद पड़ी अधिकतर परचूनों की दुकानों ने निकाल दी है। पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल-डीजल नहीं पहुंच पा रहा है तो गैस के गोदामों में खाली सिलेण्डरों के अंबार लग गए हैं। इन क्षेत्रों में परिवहन, बिजली, पानी और दूरसंचार की सेवाएं बाधित हो गई हैं। गांवों और शहरों को जोड़ने वाले संपर्क मार्गों के साथ नेशनल हाइवे तक जगह-जगह से टूटे हुए हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों में बीच रोड पर लंबी-लंबी दरारे बन गई हैं। बिजली के खंभे और तार टूटने से अधिकतर क्षेत्र अंधेरे में डूबे हुए हैं।

लमगड़ा ब्लॉक के चोमू और अलसीमा तथा हवालबाग के द्घनेली गांव के करीब 300 परिवार कभी भी भू-स्खलन की चपेट में आ सकते हैं। इन गांवों के डरे-सहमे लोगों ने गांव के ही जीआईसी में शरण ले रखी है। भारत-नेपाल की सीमा रेखा, काली नदी धारचूला में खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। जिससे उसके किनारे स्थित बस्तियां खतरे में हैं। भू-स्खलन के चलते मुन्स्यारी मार्ग एवं पिथौरागढ़ के मैदानी क्षेत्रों सहित देश के अन्य भागों से जोड़ने वाले पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, हल्द्वानी, तथा पिथौरागढ़, टनकपुर मार्ग बंद हो गए। 19 सितंबर को कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी कर भारत लौट रहा यात्रा का अंतिम सोलहवां दल हिमपात के कारण भारत-तिब्बत सीमा में फंस गया। जिसे आईटीबीपी के जवानों ने निकाल कर सुरक्षित स्थानों में पहुंचाया।

हल्द्वानी-नैनीताल राजमार्ग भजियाद्घाट के निकट करीब सौ मीटर 50 फुट नीचे धंस गया है। उफनायी गोला ने काठगोदाम पुल के नीचे के एक हिस्से को क्षतिग्रस्त कर पुल के लिए खतरा बढ़ा दिया है। हल्द्वानी रेलवे स्टेशन पर गोला नदी के कटाव से पटरी भी क्षतिग्रस्त हो गई है। जिसके चलते रेल यातायात अवरुद्ध हो की सीमा रेखा, काली नदी धारचूला में खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। जिससे उसके किनारे स्थित बस्तियां खतरे में हैं। भू-स्खलन के चलते मुन्स्यारी मार्ग एवं पिथौरागढ़ के मैदानी क्षेत्रों सहित देश के अन्य भागों से जोड़ने वाले पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, हल्द्वानी, तथा पिथौरागढ़, टनकपुर मार्ग बंद हो गए। 19 सितंबर को कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी कर भारत लौट रहा यात्रा का अंतिम सोलहवां दल हिमपात के कारण भारत-तिब्बत सीमा में फंस गया। जिसे आईटीबीपी के जवानों ने निकाल कर सुरक्षित स्थानों में पहुंचाया।

हल्द्वानी-नैनीताल राजमार्ग भजियाद्घाट के निकट करीब सौ मीटर 50 फुट नीचे धंस गया है। उफनायी गोला ने काठगोदाम पुल के नीचे के एक हिस्से को क्षतिग्रस्त कर पुल के लिए खतरा बढ़ा दिया है। हल्द्वानी रेलवे स्टेशन पर गोला नदी के कटाव से पटरी भी क्षतिग्रस्त हो गई है। जिसके चलते रेल यातायात अवरुद्ध हो गया। कालाढूंगी रोड पर एकसिया नाले ने उफान पर आकर मार्ग को अवरुद्ध किया। बिठोरिया नंबर एक और कुसुमखेड़ा क्षेत्र के मकानों में पानी द्घुस गया। टनकपुर में शारदा नदी उफनाई जिसके चलते शारदा चुंगी के आस-पास रह रहे लोगों के द्घरों में पानी द्घुस जाने से अफरा-तफरी मच गई। भारी वर्षा के चलते पूर्णागिरी मार्ग भी कई जगहों पर बंद हो गया। जिससे तीर्थयात्रियों के अलावा ग्रामीणों को भी आवाजाही में काफी पेरशानी रही।

देहरादून में भारी बरसात के चलते जन- जीवन अस्त-व्यस्त रहा। बरसात के पानी से 250 ज्यादा मकान प्रभावित हुए। देहरादून-हरिद्वार मार्ग अवरुद्ध हो गया। देहरादून -दिल्ली सड़क मार्ग भी अवरुद्ध रहा। ऋषिकेश एवं हरिद्वार में गंगा खतरे के निशान पर आ गई। दिल्ली हरिद्वार हाइवे कई मीटर कट कर बह गया। देवप्रयाग में गंगा खतरे के निशान से ऊपर वह रही है। हरिद्वार के विसनपुर कुंजी में तटबंध टूटने का खतरा उत्पन्न हो गया है। एहतियात के तौर पर आसपास के गांव खाली कराये गए हैं। कालागढ़ डैम में भी जल स्तर बढ़ने के कारण एक लाख 73 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया।

गढ़वाल मंडल में भी भू-स्खलन से कई गांव विलीन होने के मुहाने पर खड़े हैं। लोग अपने पैतृक द्घर छोड़कर जाने को विवश हैं। प्रशासन के पास भी फिलहाल इन प्रभावितों के विस्थापिन करने की कोई कारगर नीति नहीं है। प्रशासन राहत के नाम पर फिलहाल टेंट व कुछ राहत राशि दे रहा है। उत्तरकाशी जनपद में चिन्यालीसौड़ का अधिकांश भाग टिहरी झील में समा गया है। लोग अपने द्घरों को छोड़कर जा रहे हैं। नौगांव प्रखण्ड के मंजियाली गांव में हुए भू-स्खलन से छह मकान क्षतिग्रस्त हो गये हैं। टिहरी जिले के रौलाकोट गांव में दरार से ग्रामीण डरे हुये हैं। कीर्तिनगर क्षेत्र में 32 सड़कों के क्षतिग्रस्त हो जाने से आवागमन पूरी तरह ठप हो गया है। भू-स्खलन एवं टूट- फूट के कारण 20 परिवारों ने अन्यत्र शरण ले रखी है।

लैंसडाउन क्षेत्र से सटे सीला पट्टी के अन्तर्गत ग्राम नौगांव में एक आवासीय मकान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया। क्षेत्र के नयारद्घाटी में भारी बारिश से आम जीवन अस्त व्यस्त हो गया। क्षेत्र सतपुली-पाटीसैण-पौडी, सतपुली-दुधारखाल, सतपुली-औडल सहित आधा दर्जन सड़कों एवं सम्पर्क मार्गों के क्षतिग्रस्त हो जाने से लोग जान जोखिम में डाल कर अपने गंतव्यों को पहुंच रहे हैं। यहां दूध,सब्जी एवं दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी बाधित हो गयी है। रूद्रप्रयाग से लेकर गौरीकुण्ड तक राष्ट्रीय राजमार्ग चलने लायक नहीं रह गया है। बांसवाडा में जहां भू-स्खलन मौत के समान खड़ा है वहीं तिलवाडा एवं विजयनगर में बरसाती नाला लोगों के द्घरों में द्घुस रहा है। लगातार हो रही बारिश से गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ एवं बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग जगह जगह क्षत्रिग्रस्त होने से उफान पर चल रही चारधाम यात्रा पर बे्रक लग गया है। उत्तरकाशी जिले के गंगोत्री मार्ग में आठ सौ, यमुनोत्री में दो सौ बम्हखाल और बढ़कोट में 150 तथा हनुमान पट्टी में 50 यात्रियों के फंसे होने की खबर है। संपर्क मार्ग पूरी तरह टूट जाने के कारण इन क्षेत्रों में राहत पहुंचाने में प्रशासनखुद को असमर्थ बता रहा है। कई यात्री मार्ग में फंसें हुये हैं।

राज्य के सीमांत जनपद चमोली में तो स्थिति और भी भयावह है। पहले ही आपदा की दृष्टि से संवेदनशील इस जनपद में हो रहे भू-स्खलन ने लोगों की रात की नींद उड़ा दी है। गांव के कई परिवारों ने अपना द्घर छोड़ दिया है। स्थानीय निवासी इंन्द्र सिह ने बताया कि नगर गांव के नीचे से लगातार हो रहे भू-स्खलन से लोग रात को सो नहीं पा रहे हैं। यही हाल धार्मिक नगरी जोशीमठ का है। जहां सैफ गेंम के नाम पर औली में अत्यधिक खुदाई के चलते यहां का सारा मलबा सीधे जोशीमठ शहर में लोगों के द्घरों में द्घुस रहा है। प्रभावितों ने पूर्व में कई बार जिला प्रशासन से इसके उचित ट्रीटमेंट की गुहार भी लगाई। पर इससे लोगों को अभी तक निजात नहीं मिल सकी। जोशीमठ से तपोवन जाने का रास्ता जगह-जगह क्षत्रिग्रस्त हो गया है। सीमा पर जाने वाला एक मात्र मलारी मोटर मार्ग के कई स्थानों पर टूटने से लोगों के सामने आवागमन एक बड़ी चुनौती बन गयी है। जनपद के भीमतल्ला से लगे राष्ट्रीय राजमार्ग पर बादल फटने से भू-स्खलन की जद में आये कई मकान क्षतिग्रस्त हो गये हैं। लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने से भी कतराने लगे हैं।े संचार सेवा पूरी तरह ठप है।

हरिद्वार के लक्सर तहसील के अन्तर्गत 40 गांव की लगभग 2 लाख से ज्यादा आबादी बाढ़ की चपेट में है। 60 से अधिक गांव बाढ़ से अत्यधिक रूप से प्रभावित हुए हैं। बाढ़ के चलते तीर्थनगरी हरिद्वार का सड़क एवं रेल यातायात सम्पर्क देश से कट गया है। सरकारी उदासीनता के चलते बाढ़ से पीड़ित लोग भूखे मरने को मजबूर हैं। एक-दो सामाजिक संगठनों को छोड़कर कोई भी राजनीतिक दल आपदा पीड़ित ग्रामीणों की मदद के लिए नहीं आया। हरिद्वार में लक्सर तहसील एवं रुड़की का भगवानपुर क्षेत्र बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। इसके अतिरिक्त तीर्थनगरी हरिद्वार में भी 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ हुई बरसात ने जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। मनसा देवी पहाड़ी से आये मलबे ने रेल यातायात को ठप कर दिया वहीं हरकी पैड़ी एवं मोतीबाजार जैसे व्यापारिक स्थान भी इसकी चपेट में आ गये। बजरीवाला के निकट बैरागी कैम्प में रहने वाले पांच हजार परिवारों के द्घर बाढ़ में उजड़ गए। प्रशासन इन परिवारों को सांत्वना देने के अलावा कोई मदद नहीं कर पाया है। अब ये प्रभावित खुले आसमान के नीचे मदद की उम्मीद में बैठे हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार बाबुओं की जेब भरने पर सरकारी मुआवजा मिलने की बात सामने आ रही है। देवनगरी में दैवीय आपदा से हुए भारी नुकसान को देखते हुए केन्द्र सरकार द्वारा भी तत्काल 100 एनडीआरएफ के जवान उत्तराखण्ड के लिए रवाना किये गये। मुख्यमंत्री ने हरिद्वार जिले के बाढ़ग्रस्त लक्सर क्षेत्र का हेलीकॉप्टर से और हरिद्वार में क्षतिग्रस्त हिल बाईपास व बाढ़ग्रस्त सतीद्घाट का निरीक्षण सड़क मार्ग से किया। इसके बाद उन्होंने मंडलायुक्त को निर्देश दिया कि पहाड़ी पर बसे लोगों को वहां से निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाएं। लक्सर के गांवों में तेजी से राहत कार्य किये जाएं। संसाधन विहीन जनपद पुलिस ने बाढ़ पीड़ितों की मदद में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसके प्रयास से कई जानें बचीं। हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजय गुंज्याल एवं जिलाधिकारी आर मिनाक्षी सुन्दरम की पहल से बाढ़ में फंसे हजारों नागरिकों को हरिद्वार प्रशासन बहने से बचा पाया।

सितारगंज-शक्तिफार्म में कैलाश, बैग्डल, सूखी, देवहा एवं कटना नदियों में आई बाढ़ से हालात बेकाबू हो गये। क्षेत्र के हजारों द्घरों में बाढ़ का पानी घुस गया। शक्तिफार्म में हजारों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। बाढ़ से बचने के लिए लोगों ने मकानों की छतों और स्कूलों में शरण ली। यहां पानी का स्तर सड़क से पांच फुट के आस-पास हो गया। सितारगंज की सम्पूर्णनन्द जेल में बाढ़ का पानी द्घुस आने से 800 कैदी एवं कर्मचारियों ने छतों पर चढ़कर जान बचाई। बाद में कैदियों को शिविर से हटाकर निर्माणाधीन सेंट्रल जेल में शिफ्ट किया गया है। नानकसागर डैम का जल स्तर 699.5 फीट पहुंच गया।

गूलरभोज में भारी बारिश के चलते बौर एवं हरिपुरा जलाशय उफान पर है। पानी के दबाव को कम करने के लिए दोनों ही जलाशयों से लगातर पानी की निकासी करनी पड़ रही है। कालागढ़ डैम से छोड़े गए लाखों क्यूसेक पानी से ग्राम हरेवली, भूत पुरी एवं बिडला फार्म में आई बाढ़ में सैकड़ों ग्रामीण फंस गए। रामनगर के ऊपर पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के चलते कोसी नदी ने भयानक रुख अपना लिया। कोसी बैराज रामनगर को खतरा होने के चलते दसों गेटों में जमा लगभग सवा लाख क्यूसेक पानी छोड़ना पड़ा। जिससे करीब बीस फीट गहरी कोसी- दाबका नदियां किनारों तक आ गईं। पानी का वेग अत्यधिक तीव्र होने से नदियों से लगने वाले गांवों में कटाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिकारियों ने ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा है। बाजपुर में लेवडा एवं अन्य नदियों में आयी बाढ़ से दो दर्जन से भी अधिक गांवों में पानी भर गया। सुल्लतानपुर पट्टी में भी कोसी का पानी मुकंदपुर गांव में घुस जाने से लोगों ने सुरक्षित स्थानों पर शरण ली। राम गंगा नदी में आई बाढ़ ने चौखुटिया, मासी और भिक्यिासैंण के कई इलाकों में द्घुस गया। बरसात के चलते रामनगर-कर्णप्रयाग मार्ग भी अवरुद्ध रहा। तराई के प्रमुख डैम तुमडिया डैम में जल स्तर बढ़ जाने से 41 हजार क्यूसेक पानी ढेला नदी में छोड़ा गया। जिससे जबर्दस्त भू-कटाव हुआ।

साथ में हरवंश बिष्ट, अहसान अंसारी, गुरूवेन्द्र नेगी
 

 

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