जल प्रदूषण के कारण

Submitted by admin on Tue, 01/25/2011 - 18:40
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Submitted by Anonymous (not verified) on Sat, 01/31/2015 - 18:38

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good very nice

Submitted by Anonymous (not verified) on Tue, 08/04/2015 - 22:38

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एक दिन की बात है। धरती ने बादल से कहा- ‘तुम्हें पीठ पर बिठाते-बिठाते मैं थक गई हूं। मैं अकेले कहीं दूर घूमने जाना चाहती हूं।’बादल ने कहा- ‘तो जा न, किसने रोका है। मगर याद रखना, जल्दी लौट आना। मैं तुझे याद करूंगा।’बादल हंसते हुए कहने लगी- ‘तुम मुझे याद करोगे? लेकिन मुझे कैसे पता चलेगा?’बादल सोचने लगा। फिर बोला - ‘तेरी याद आने पर मैं बरसने लगूंगा। खूब बारिश करूंगा। जब बारिश हो तो समझ लेना कि मैं याद कर रहा हूं। लेकिन याद रखना। बस लौट आना। नहीं तो मैं नाराज हो जाऊंगा।’धरती शरमा गई। सकुचाते हुए उसने नजरें झुका लीं। फिर पूछने लगी, ‘तुम नाराज हो जाओगे? लेकिन मुझे कैसे पता चलेगा?’बादल फिर सोचने लगा। कहने लगा- ‘नाराज होने पर मैं ओले गिराऊंगा। तूझे ओलों से ढक दूंगा। समझ लेना कि मैं नाराज हूं।’ धरती घूमने चली गई। धरती नीचे और नीचे की ओर टपक पड़ी।कई दिन बीत गए। बादल धरती को याद करने लगा। याद में बरसने लगा। इतना बरसा कि बस बरसता रहा। धरती हरी-भरी हो गई। धरती पर पेड़ उग आए। पहाड़ बन गए। नदियां बन गईं। समुद्र बन गया। खेत लहलहाने लगे। पशु-पक्षियों ने धरती को बसेरा बना लिया। धरती भारी हो गई। अब अपनी धुरी पर घूमने लगी। तभी से धरती घूम रही है। आज भी बादल धरती को याद करता है। खूब बरसता है। और हां, जब नाराज होता है तो ओले बरसाता है।

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मीनाक्षी अरोरामीनाक्षी अरोराराजनीति शास्त्र से एम.ए.एमफिल के अलावा आपने वकालत की डिग्री भी हासिल की है। पर्या्वरणीय मुद्दों पर रूचि होने के कारण आपने न केवल अच्छे लेखन का कार्य किया है बल्कि फील्ड में कार्य करने वाली संस्थाओं, युवाओं और समुदायों को पानी पर ज्ञान वितरित करने और प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करने का कार्य भी समय-समय पर करके समाज को जागरूक करने का कार्य कर रही हैं।

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