विकास की भेंट चढ़ते मैंग्रोव वन

Submitted by admin on Sun, 01/30/2011 - 09:21
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अपनी खास वनस्पतियों और जलीय विशेषताओं के कारण पहचाने जाने वाले मैंग्रोव वन कुछ ही दशकों में मिट सकते हैं। यह आकलन अमेरिकी शोधकर्ताओं के एक दल का है।शोधकर्ताओं ने दुनिया भर के मैंग्रोव वनों का व्यापक अध्ययन कर पाया कि इस वनस्पति की कम से कम सत्तर प्रजातियों का वजूद खतरे में है और इनके संरक्षण-संवर्द्धन पर अगर तुरंत ध्यान न दिया गया तो दो दशक के भीतर ये लुप्त हो सकती हैं। इस तरह का आकलन केवल अमेरिकी दल का ही नहीं है। हाल में इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर यानी आईयूसीएन ने भी रिपोर्ट जारी की है जिसके अनुसार ग्यारह मैंग्राव प्रजातियों का जीवन बिल्कुल ही खतरे में है और बाकी पचास से अधिक प्रजातियों की हालत दयनीय है।

दरअसल पूरी धरती से मैंग्रोव वनक्षेत्र प्रति वर्ष औसतन तीन-चार फीसद की दर से घटता जा रहा है। यह ब्राजील में भी घटा है और इंडोनेशिया में भी। ब्राजील में करीब 25000 और इंडोनेशिया में 21000 वर्ग किलोमीटर में ही मैंग्रोव वन बचे हैं जबकि 1950 के आसपास इन दोनों देशों को मिलाकर एक लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में मैंग्रोव जंगल फैला था। भारत और दक्षिण एशियाई देशों की बात करें तो पिछले पचास सालों में यहां मैंग्रोव वनों का अस्सी फीसद हिस्सा मिट चुका है। अपने देश में भी मैंग्रोव प्रजातियों पर कई स्तरों पर संकट है। समुद्र किनारे होता तीव्र शहरी विकास, समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी, तटीय आबादी की जलीय खेती पर बढ़ती निर्भरता और वनों की अंधाधुंध कटाई इसमें सबसे अहम है।हाल में सुंदरी प्रजाति की मैंग्रोव वनस्पति एक दूसरे कारण से भी तबाह हुई है। इस प्रजाति में ‘टाप डाइंग’ नाम की बीमारी लग गई, जिसने खासतौर से सुंदरवन को काफी नुकसान पहुंचाया। ज्ञात हो कि सुंदरवन का नामकरण इसी सुंदरी प्रजाति की वनस्पति के कारण हुआ है जो वहां बहुतायत में पाई जाती है। सुंदरवन के निचले इलाके में सत्तर फीसद पेड़ इसी प्रजाति के हैं। ‘टाप डाइंग’ का कारण अज्ञात है लेकिन विशेषज्ञ अभी तक जिस नतीजे पर पहुंचे हैं उसका निहितार्थ यही है कि पानी में बढ़ता खारापन और ऑक्सीजन की कमी इसके लिए जिम्मेदार है। इस बिंदु पर जल्द ही गंभीरता से ध्यान देना होगा कि क्योंकि सुंदरवन की सघनता खत्म होने का अर्थ तमाम दुष्प्रभावों के साथ-साथ बाघों के प्रकृतिक आवास छिन जाने से भी है। बाघों का आवास काफी हद तक छिना भी है। जहां इन वनों की सघनता घटी है, वहां बाघ डेल्टा के उत्तरी हिस्से में चले गए हैं जहां मानव आबादी काफी सघन है। बाघों के इस प्रवास का प्रतिफल ही है कि मानव के साथ उनका संघर्ष बढ़ा है।

मैंग्रोव वनस्पति सिर्फ सुंदरवन में प्रभावित हुई हो ऐसा नहीं है। खासतौर से समुद्र तटीय शहरी विकास का प्रभाव तो मैंग्रोव से जुड़े हर क्षेत्र में है बल्कि पश्चिमी किनारे इस कारण अधिक प्रभावित हैं। पश्चिमी किनारे में शहरी विकास के चलते चालीस फीसद मैंग्रोव वन खत्म हो चुके हैं। मुंबई की स्थिति और भी विकट है। यहां दो तिहाई से अधिक मैंग्राव वन खत्म हो गए हैं। इधर के कुछ वर्षों में वहां जल जमाव की जो स्थिति पैदा हुई है, इसके पीछे भी वैज्ञानिक मैंग्रोव का खात्मा मानते हैं। इसी तरह गुजरात के तटीय इलाके भी तेजी से उघोगीकृत हो रहे हैं। वहां सीमेंट और तेलशोधक कारखाने, पुराने जहाजों को तोड़ने की इकाइयां, नमक बनाने की इकाइयां काफी विकसित हुई हैं। इन कारणों से समुद्री किनारों पर बस्तियों का भी जमाव हो रहा है और वन तेजी से काटे जा रहे हैं।हमें यह भी समझना होगा कि झींगापालन जैसे व्यवसाय ने भी मैंग्रोव वनों का काफी नुकसान किया है। इसने आर्थिक सुरक्षा तो दी है लेकिन मैंग्रोव पर इससे पड़ने वाले दुष्प्रभाव ने पर्यावरणीय असुरक्षा से भर दिया है। दरअसल जलीय खेती के दौरान प्रदूषक पदार्थ काफी मात्र में निकलते हैं जिनसे मैंग्रोव वनों को नुकसान होता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण यह तथ्य भी सामने आया है कि एक सदी के भीतर सागर तल में 10-15 सेंटीमीटर तक उछाल आया है और इसका सीधा प्रभाव मैंग्रोव वनों के वानस्पतिक चरित्र में बदलाव के तौर पर दिख रहा है।

जरूरत इस बात की है कि हम इन वनों की भूमिका को गहराई से महसूस करें। मैंग्रोव के जंगल कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैस को बढ़ने से ही नहीं रोकते बल्कि सूनामी जैसी आपदा रोकने में सहायक होते हैं। घने मैंग्राव वन चक्रवाती तूफान की गति कम कर तटीय इलाकों में होने वाली तबाही पर अंकुश लगाते हैं। मैंग्रोव वनों का इतना महत्व होते हुए और सूनामी के अनुभव के बाद भी हम इसके संरक्षण की दिशा में विशेष प्रयास नहीं कर रहे। न तो संसद में इसके लिए चिंता दिखती है और न सड़कों पर। इन अमूल्य वनों को विनाश से बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि उनके अनेक पारिस्थितिक उपयोग हैं और आर्थिक मूल्य भी कुछ कम नहीं।
 

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