अकाल के कपाल पर तरक्की की इबारत

Submitted by Hindi on Mon, 01/31/2011 - 10:45
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भारतीय पक्ष डॉट काम 31 जनवरी 2011

बुंदेलखंड में जैसे युद्ध की परंपरा है, वैसे ही खेती की भी समृद्ध परंपरा है। युद्ध में सब मिलकर लड़े हैं तो खेतों में भी पूरा परिवार डटा है। पांच साल से पड़ रहे सूखे में भी चित्रकूट जनपद के भारतपुर गांव के केदार यादव का परिवार संयुक्त परिवार की उसी समृद्ध परंपरा को संजोते हुए दिन-दूनी रात-चैगुनी तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहा है।केदार यादव के चार बेटे श्यामलाल ऊर्फ वैद्य, राजकुमार, बिहारीलाल और राम तीरथ हैं। इन चारों के छह लड़के और दो लड़कियां हैं। पूरा परिवार भरा-पूरा है। परिवार की एक ही रसोई है। मुख्य काम खेती है। केदार यादव की जिंदगी की शुरुआत 3 बीघे खेती से हुई। अब उनके परिवार के पास 40 बीघा खेत है। पहले एक हल से खेती होती थी। अब उनके पास तीन हल है। चार भाइयों में एकमात्र पढ़े-लिखे बिहारीलाल गर्व से बताते हैं कि हमने कभी अपने खेतों में ट्रैक्टर नहीं चलाया। हरित क्रांति के सब्जबागों के बावजूद हमने अपने खेतों को रासायनिक खादों से बचाकर रखा।

खेतों, खलिहानों में 250 से ज्यादा भेड़-बकरियां, 20 गायें और दर्जन भर भैंस देखकर किसी किसान का मन खुशी से बाग-बाग नहीं होगा। इन्हीं ढोरों की बदौलत खेती मुनाफे की है। जिन खेतों में रबी की फसल बोई जाती है। वहां खेतों में जानवर बांध दिए जाते हैं। इन जानवरों को रोज स्थान बदल-बदल कर बांधा जाता है, ताकि उनका गोबर-मूत्र पूरे खेत में फैल सके। जुलाई में भैंसों को खेतों से निकाल कर मड़हे में कर दिया जाता है, लेकिन गायें अक्टूबर तक खेतों में रहती हैं। खरीफ की फसल के लिए इन्हीं जानवरों से शेष दिनों में इकठ्ठा की गई खाद खेतों में डाल दी जाती है। बिहारीलाल बताते हैं कि हमने कभी अपने खेतों में बाजार से खरीद कर बीज नहीं डाला। गेहूं के अलावा ज्वार, चना, अरहर, लाही, सावां, काकून, मूंग, उड़द, रेउझा, जौ, धान और जवा की खेती परंपरा से जुड़ी हुई है।

केदारनाथ के खेतों से होने वाली पैदावार अब हरित क्रांति को भी मुंह चिढ़ा रही है। इस साल 19 बीघे में रबी की खेती की गई। 19 बीधे में 100-125 मन गेहं गेहू 18 मन चना, 15 मन सरसों-लाही, 15 मन सेहुंवा पैदा हुआ। 4 बीधे में 22 मन जौ का उत्पादन हुआ। 19 बीघे में से साढ़े सात बीधे में गेहूं के साथ सरसों, 4 बीघे में जवा के साथ सरसों, 7.5 बीधे में चना के साथ सरसों और अलसी की खेती हुई। यानी 19 बीघे में कुल उत्पादन हुआ 195 मन। इसका मतलब है कि सवा दस मन प्रति बीघा की खेती इस सूखे में भी। और पानी का आधार भी जान लीजिए। यह है पास में बहता हुआ एक नाला। इस वर्ष रबी की फसल में केवल दो पानी ही दिया गया। पिछले साल थोड़ा ज्यादा पानी था। इसलिए खेतों को तीन पानी मिला। उत्पादन हुआ मात्र छह बीघे में 150 मन से ज्यादा गेहूं। मतलब 22 मन प्रति बीघा। क्या आप बता सकते हैं कि इस खेती में लागत क्या है? बिहारीलाल खुद कहते हैं, ‘‘हमारी खेती में खर्चा कुछ नहीं है। पशुओं के लिए हमने कभी चारा बाजार से नहीं खरीदा।’’

आइए, जरा खरीफ की फसल का जायजा लें। सूखे के बावजूद तीन कुंतल प्रति बीघे की खेती खरीफ की। बिहारी कहते हैं कि सूखा न होता तो पैदावार 4 कुंतल प्रति बीघा होती।केदार यादव ने यह साबित कर दिया है कि खेती के पारंपरिक तौर-तरीके आज भी उतने ही कारगर हैं जितना पहले थे।
 

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