शुष्क बागवानी

Submitted by Hindi on Wed, 02/02/2011 - 14:28
Source
कुदरतनामा

ग्रीष्मकाल की चिलचिलाती धूप और तपतपाती गरमी से त्रस्त आंखों को चंद हरे-भरे पौधों के गमले या हरियाली युक्त बाग-बगीचे कितनी अधिक राहत दे सकते हैं, इससे तो सभी भली-भांति परिचित होंगे।

परंतु इन्हें बनाए रखने के लिए पानी की भी बहुत जरूरत पड़ती है, और गरमियों में पानी की बहुत बार विकट कमी हो जाती है। बागवानी में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिए अपने बगीचे के नाजुक पौधों को कुम्हलाने से बचाना एक कठिन परीक्षा बन जाती है। अनेक शहरों में पीने का पानी भी बड़ी मुशकिल से प्राप्त होता है। ऐसे में पौधों को नियमित रूप से सींचना अत्यंत दुष्कर है। इसी परिप्रेक्ष्य में शुष्क-बागवानी या जेरीस्केप काफी लोकप्रिय होती जा रही है। इसमें ऐसे पौधे उगाए जाते हैं जिन्हें बहुत कम पानी चाहिए। शुष्क बागवानी के जरिए विस्तृत क्षेत्रों में सुंदर बाग-बगीचे बिछाए जा सकते हैं, और इसके लिए पानी भी बहुत कम लगता है। पौधों का सही चुनाव और आयोजन की सूझ-बूझ इस प्रकार की बागवानी की सफलता की कुंजी है। शुष्क बागवानी के कुछ मूलभूत तत्व निम्ननुसार हैं। थोड़े पानी से बहुत लाभ पाने के इन तरीकों को अपनाकर गरमियों में भी अपने बगीचे को हरा-भरा रखें:-

• ऐसे पौधों को चुनें जिन्हें बहुत कम पानी की आवश्यकता पड़ती हो। इस प्रकार के बहुत से पौधे हैं, जैसे बोगनविला आदि छोटे आकार के पेड़, कनेर आदि झाड़ियां, और कैक्टस। जहां तक हो सके स्थानीय पौधों को ही बगीचे में स्थान दें। ये पौधे स्थानीय वातावरण में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होते हैं और इन्हें पानी देना नहीं पड़ता। इस संबंध में परामर्श के लिए अपने पौधशाला आयोजक से मिलें।
• बाग का आयोजन इस प्रकार करें कि ऐसे पौधे जिन्हें समान मात्रा में पानी आवश्यक हो, एक ही स्थान पर हों। इन्हें उतना ही पानी दें जितना बिलकुल आवश्यक हो, न कम न ज्यादा।
• पानी की खपत की दृष्टि से लॉन बड़ा खर्चीला होता है। अतः अपने बगीचे में लॉन के क्षेत्रफल को घटाएं। इसके लिए क्यारियों, झाड़ियों आदि आधिक संख्या में लगाएं, तथा शैल-संग्रहों (रॉक गार्डन),कंकरीले रास्तों तथा ईंट से ढंके क्षेत्रों के कलात्मक समन्वय से बगीचे के सौंदर्य में अभिवृद्धि करें।
• टपक सिंचाई विधि अपने बगीचे में अपनाएं। इसमें बगीचे के सभी पौधों की जड़ों तक पतली पाइपें बिछाई जाती हैं। इन पाइपों में पौधों की जड़ों के पास एक छोटी छेद रहती है, जिनमें से पानी टपकता रहता है। इससे पौधे को उतना ही पानी प्राप्त होता है जितना उसे बिलकुल आवश्यक हो। इस विधि में क्यारी को पूरा-पूरा पानी से भर देने में लगने वाले पानी से बहुत कम पानी लगता है।
• पौधों को हमेशा शाम के वक्त ही पानी दिया करें। दिन में पानी देने से अधिकांश पानी वाष्पीकृत हो जाता है और पौधों को पूरा फायदा नहीं मिल पाता। पानी देने के बाद क्यारियों को सूखी पत्तियों आदि जैविक कचरे से ढका रखें। इससे वाष्पीकरण द्वारा पानी के अपव्यय को कम किया जा सकता है।
• रसोईघर में सब्जी, दाल, चावल आदि को धोने के बाद बचे पानी को नाली में फेंकने के बजाए उससे पौधों को सींचें।
 

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