बचाने होंगे हिमाचल के पहाड़ नदियां और कृषि भूमि

Submitted by Hindi on Wed, 02/09/2011 - 15:02
Printer Friendly, PDF & Email
Source
दिव्य हिमाचल, 10 जनवरी 2011

सत्ताधारियों से मिलकर नौकरशाही और दलाल, हालात ही ऐसे बना देते हैं कि किसान अपनी उर्वर कृषि भूमि को बेचने के लिए मजबूर हो जाए…

प्रातः बिस्तर से उठकर प्रथम पांव जब पृथ्वी पर डालते हैं, तो अत्यंत आदरपूर्वक यह कहते हैं ‘‘मातुः पृथ्व्या पुत्रोऽहम्’’ पृथ्वी मां हैं और मैं उनका पुत्र हूं। भारतीय संस्कृति में अत्यंत उदात्तभाव धरती के प्रति उद्घाटित हैं। धरती, माता की भांति भरण-पोषण करती है, तो मां की तरह ही व्यवहार करने की पुत्रों से कामना की गई है। धरती यानी प्रकृति। जिस तरह मां से दुग्धपान करती अथवा भरण-पोषण पाती सन्तान माता का लहू कदापि पान नहीं करती, बल्कि अत्यंत स्नेह और आदर देती है। मां के हर सुख दुख और हर स्थिति में उनका सदैव ध्यान रखती है, उसी भांति प्रकृति मां का ध्यान रखना भी संतान का प्रथम कर्त्तव्य है। माता च मातृ भूमि स्वर्गादपि गरीयसी। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें, तो प्रकृति माता के प्रति कृतघ्नता की सारी हदें पार की जाने लगी हैं। कोयला निकालने के लिए सीवान के वृक्षों के अंधाधुंध दोहन ने न केवल पशुपालन व्यवसाय पर प्रभाव डाला, बल्कि बंदरों को भी आबादी की ओर दौड़ने को मजबूर कर दिया। सीवान के पत्तों को किसान सर्दी में चारे के रूप में संभाल कर रखते थे। सीवान की वानगुली बंदर बड़े चाव से खाते हैं। दुर्लभ कीट-पतंगे और पंछी सीवान के घने पेड़ों में आश्रय स्थली बनाते हैं। वनों में वान के वृक्षों की क्षति ने प्राकृतिक संतुलन को भी प्रभावित किया है। वर्षा के जल का संग्रहण करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले सीवान के रोपण हेतु हिमाचल जैसे प्रांत में कितने किसानों को पौधे आबंटित किए गए या कितने सीवान के जंगल आबाद किए गए किसी को चिंता नहीं शायद। भूक्षरण रोकने और भूमि की उर्वरता बढ़ाने वाले सीवान वृक्ष की चिंता मात्र पर्यावरण प्रेमियों की चिंता तक सीमित हो गई। असंख्य अन्य वृक्षों की तस्करी की तो बात ही अलग है। इसी भांति वनों से जंगली फल वाले वृक्ष और झाडि़यों को बचाने वाले हाथ भी निष्क्रिय हैं। फलतः वनों के विनाश से अनेकों मानव मित्र कीट-पतंगे, पंछी-पशु भी बेघर होते गए और शेष का जीवन-मृत्यु से संघर्ष जारी है। पानी के स्रोतों, पानी के भंडारों, वर्षा लाने वाले, प्राणवायु के संवाहक पूजनीय पर्वतों का तिरस्कार और सीमेंट के कारखानों के लिए कच्चे माल हेतु बलि देने वाले सियासतदानों ने मानव की चिंता के विपरीत कार्य करते लाखों प्राणियों, कीट-पतंगों, पंछी-पशुओं, असंख्य वृक्षों, तृण-झाडि़यों, औषधियों की परवाह किए बिना विकास के ढकोसले के नाम पर धनवालों को सहर्ष आबंटन स्वीकार करने में अपनी ख्याति समझी।

कृषि भूमि बचाने और किसानों की सुरक्षा के लिए नई सोच और जिम्मेदारी की अनदेखी करने वाले सत्तासीन, किसानों के अत्यंत पौष्टिक परंपरागत अनाजों को बचाने के लिए कुछ नहीं कर पाए। रासायनिक खादों, हाईब्रिड बीजों, कीटनाशकों के प्रयोग, पोली हाउसों की ओर किसानों को बरगलाया जाने लगा है। किसान कीमती समय बर्बाद कर खाद-बीजों के लिए दौड़ता रहे, फिर लाइनों में खड़ा रहे। फिर मजबूर होकर किसानी छोड़ मनरेगा में मजदूर बने या किसी सीमेंट फैक्टरी में। भूमि माता का अनादर किस दिशा की ओर ले जाएगा? फिर किसान यदि भूमि माता की ओर से पीठ फेर लेगा, तो गिद्ध दृष्टि जमाए कोई कंपनी या पूंजीपति किसानों के परिश्रमी बुजुर्गों द्वारा निर्मित खेतों और किसानों की पवित्र कृषि भूमि को कागज के टुकड़ों के बदले खरीद कर सीमेंट कारखाना लगा देगा। सभी के द्वारा शोषित किसान आत्महत्या को मजबूर बना दिया जाता है, क्योंकि किसान कभी विरोध नहीं करता। सत्ताधारियों से मिलकर नौकरशाही और दलाल हालात ही ऐसे बना देते हैं कि किसान अपनी पावन-उर्वर कृषि भूमि को बेचने के लिए मजबूर हो जाए। किसी सीमेंट कारखाने द्वारा उजाड़े लोगों और उसके करीब गांवों में बसने वाली आबादी के मानवाधिकारों की किसी को चिंता नहीं होती। बेशक पत्थरबाजों, हत्यारों देश के दुश्मनों, नक्सलियों के पक्ष में हाय-तौबा मच जाती है। किसानों के लिए, असंख्य पंछी पशुओं के लिए प्राणवायु के लिए भी चिंता करने की आवश्यकता है। विकास का भोथरा नारा देने वालों, सपने बेचने वाले सौदागर किसानों के मन-मस्तिष्क पर पर्दा डालने का कुप्रत्यत्न करते हैं। प्रकृति से बलात्कार करते हुए विकास-विकास का हल्ला डाला जाता है, किंतु वास्तव में सर्वनाश की आहट की अनदेखी हिमाचल को किस ओर ले जाएगी? भूकंप के प्रति संवेदनशील प्रदेश की स्वार्थ और लालच के लिए अनदेखी, जीवनदायिनी नदियों का अदूरदर्शितापूर्वक दोहन, वन-वृक्ष, पर्यावरण, प्राकृतिक असंतुलन प्राणियों का विकास नहीं विनाशक की भूमिका ही निभाएगा। विस्थापन के दंशों का भुगतान पैसा कभी नहीं कर सकता। स्वार्थी विकास का नारा और लालची विकास का हल्ला वर्तमान को ही नहीं भविष्य के लिए भी खतरनाक सिद्ध होगा।
 

इस खबर के स्रोत का लिंक:

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा