डॉल्फिन बचेगी तब, अगर . . .

Submitted by admin on Sat, 10/10/2009 - 08:07
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5 अक्टूबर को सम्पन्न गंगा प्राधिकरण की पहली बैठक में जो महत्वपूर्ण निर्णय हुआ वह यह कि गंगा में निवास करनेवाली डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलचर घोषित कर दिया गया. बाघ और मोर के बाद डाल्फिन को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा दिया जाना डाल्फिन को उसकी गरिमा तो दिलाता है लेकिन हकीकत यह है कि देश के नदियों के पवित्र जल में निवास करनेवाली डाल्फिन का अस्तित्व खतरे में है. वर्ष 1979 में जहां देश की विभिन्न नदियों में डॉल्फिन की संख्या चार से पांच हजार थी, वहीं अब इनकी संख्या सिमट कर महज दो हजार के लगभग रह गई है।

मां गंगा का सवारी समझी जाने वाले जलचर डॉल्फिन का अस्तित्व खतरे में है, इसे संरक्षित करने की कवायद बड़े जोरशोर से शुरू की गई है, नदियों के प्रदूषण ने इसके जीवन को सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है, डॉल्फिन को बचाने की पहल कितनी सार्थक होगी इस पर कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता। दरअसल बाघ और मोर की तरह डॉल्फिन भी कागज की शोभा बनने के कगार पर आ खडी हुई हैं।

उत्तर भारत की पांच प्रमुख नदियों यमुना, चंबल, सिंध, क्वारी व पहुज के संगम स्थल ‘पंचनदा’ डॉल्फिन के लिये सबसे खास पर्यावास समझा जा रहा है। क्योंकि यहां पर एक साथ 16 से अधिक डॉल्फिनों को एक समय में एक साथ पर्यावरण विशेषज्ञों ने देखा, तभी से देश के प्राणी वैज्ञानिक पंचनदा को डाल्फिनों के लिये संरक्षित स्थल घोषित करने का मांग कर रहे थे। फलस्वरुप बाघ और मोर के बाद डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा प्रदान करके डॉल्फिन को बचाने की दिशा में केन्द्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। पूरे देश में करीब 2000 डॉल्फिन इस वक्त आंकी जा रही है।

गंगा और इसकी सहायक नदियों में डॉल्फिन पाई जाती हैं। वन्य जीवों के संरक्षण की दिशा मे काम कर रही देश की एक बडी पर्यावरणीय संस्था डब्लूडब्लूएफ के 2008 के सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश में चंबल नदी में 78,यमुना नदी में 47,बेतवा नदी में 5,केन नदी में 10,सोन नदी में 9,गंगा में 35 और घाघरा नदी में सबसे अधिक 295 डॉल्फिनों को रिकार्ड किया गया। इसके अलावा पूरे देश में डालफिन गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना के भारत, नेपाल और बंग्लादेश तक पाई जाती हैं।

डॉल्फिन स्तनघारी जीव हैं जो मीठे पानी में रहने के कारण मछली होने को भ्रम पैदा करती है, सामान्यत इसे लोग सूंस के नाम से पुकारते है, इसमें देखने की क्षमता नहीं होती हैं लेकिन सोनार यानी घ्वनि प्रक्रिया बेहद तीब्र होती हैं, जिसके बलबूते खतरे को समझती है। मादा डॉल्फिन 2.70 मीटर और वजन 100 से 150 किलो तक होता है, नर छोटा होता है, प्रजनन समय जनवरी से जून तक रहता है। यह एक बार में सिर्फ एक बच्चे को जन्म देती है।

डॉल्फिन को बचाने की दिशा में सबसे पहला कदम 1979 में चंबल नदी में राष्ट्रीय सेंचुरी बना कर किया गया। डॉल्फिन को वन्य जीव प्राणी संरक्षण अघिनियम 1972 में शामिल किया गया। 1991 में बिहार के विक्रमशिला में गंगा नदी के सुल्तानगंज से लेकर पहलगांव तक ‘गैंगटिक रिवर डॉल्फिन संरक्षित क्षेत्र’ बना कर किया गया है।

इनकी सबसे बड़ी खासियत है कि नदियों के संगम स्थलों पर सबसे अधिक डॉल्फिन नजर आती हैं। यही एक कारण है कि उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में पंचनदा पर वर्ष 2000 में एक साथ 16 डॉल्फिन देखी गयीं।

1982 में देश की सभी नदियों में डॉल्फिनों की संख्या 4000 से लेकर 5000 के बीच आंकी गयी थी,जो अब सिमट कर 2000 के करीब रह गई है। हर साल एक अनुमान के मुताबिक 100 डॉल्फिन विभिन्न तरीके से मौत की शिकार हो जाती हैं, इनमें मुख्यतया मछली के शिकार के दौरान जाल में फंसने से होती है, कुछ को तस्कर लोग डॉल्फिन का तेल निकालने के इरादे से मार डालते हैं। दूसरा कारण नदियों का उथला होना यानी प्राकृतिक वास स्थलों का नष्ट होना,नदियों में प्रदूषण होना और नदियों में बन रहे बांध भी इनके आने-जाने को प्रभावित करते हैं।

डॉल्फिन ऐसा जलचर जीव है, जिसका अस्तित्व खतरे में है। पिछले डेढ़ दशक से इनकी संख्या में पचास फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। डाल्फिन को बचाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहल करते हुए इसे राष्ट्रीय जलीय जीव तो घोषित कर दिया है, परंतु जिस प्रकार से देश की नदियों में कारखानों का कचरा गिर रहा है, उससे ऐसा लगता है कि जलीय जीव कहीं किताबों का ही हिस्सा न बन जाएं।

कहना न होगा कि डॉल्फिन के अस्तित्व को बचाने के लिए जिस प्रकार से प्रधानमंत्री ने पहल की है यदि जलीय जीव प्राणी को बचाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे तो इस मनमोहक जीव को बचाया जा सकता है। आंकड़े बताते हैं कि देश में गंगा, घाघरा, गिरवा, चंबल, बृह्मपुत्र सहित गंगा की सहायक नदियों में डॉल्फिन पाईं जातीं हैं। आंकड़े गवाह है कि प्रतिवर्ष तकरीबन एक सैकड़ा से अधिक डॉल्फिन की मौत विभिन्न कारणों से हो रही है जो पर्यावरणविदों के लिए चिंता का सबब बनी हुई है।

अवैध शिकार भी डॉल्फिन की संख्या में लगातार गिरावट ला रहा है। अवैध शिकार की वजह है कि डॉल्फिन के शिकर से इसके जिस्म से निकलने वाले तेल को मर्दानगी बढ़ाने एवं हडि्डयों को मजबूत करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यही कारण है कि इसके तेल की बाजार में कीमतें भी अधिक होती हैं। इसलिए शिकारियों की नजरों में डॉल्फिन एक धन कमाने का जरिया बन चुकी है।

वर्ष 2008 में डॉल्फिन के किए गए अध्ययन से खुलासा होता है कि सबसे अधिक डॉल्फिन घाघरा में पाईं गईं जिनकी संख्या 295 थी और इसके बाद चंबल में 78 थी। जबकि गंगा में 35, यमुना में 47, बेतवा में 5, केन में 10, सोन नदी में 9 डॉल्फिन पाईं गईं थीं। ये आंकड़े सिर्फ उत्तर प्रदेश से गुजरने वाली नदियों के हैं जबकि डॉल्फिन भारत के अतिरिक्त नेपाल और बांग्लादेश की नदियों में भी पाई जातीं हैं।

डाल्फिन को बचाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहल करते हुए इसे राष्ट्रीय जलीय जीव तो घोषित कर दिया है, परंतु जिस प्रकार से देश की नदियों में कारखानों का कचरा गिर रहा है, उससे ऐसा लगता है कि जलीय जीव कहीं किताबों का ही हिस्सा न बन जाएं। डॉल्फिन की संख्या में दिनों दिन आ रही कमी से जलीय जीव विशेषज्ञ चिंतित हो रहे हैं। हालांकि प्रधानमंत्री की पहल के बाद इन विशेषज्ञों में उत्साह आया है परंतु इन्हें बचा पाना कितना आसान होगा, इसका जबाब शायद किसी के पास नहीं है। प्रख्यात जलीय जीव विशेषज्ञ सोसायटी फॉर कन्जरवेशन ऑफ नेचर के डॉ. राजीव चौहान डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किए जाने से बेशक उत्साहित हैं। परंतु वे कहते हैं कि डॉल्फिन को बचाने के लिए सभी को पहल करनी होगी। वे डॉल्फिन के बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं कि डॉल्फिन शुड्यूल वन प्रजाति का जलीय जीव है जो पूरी तरह से नेत्रहीन है। यह जीव किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है बल्कि मानव के साथ मित्रवत संबंध बनाने को आतुर रहता है। उनकी मांग है कि पंचनदा को डालफिन के संरक्षण केन्द्र हो सकता है।

डॉल्फिन का शिकार दंडनीय अपराध है। शिकार करते हुए पकड़े जाने पर आरोपी को छ: साल के कारावास तथा पचास हजार रुपये जुर्माना का प्रावधान है। सामाजिक वानिकी प्रभाग के प्रभागीय निदेशक सुदर्शन सिंह बताते हैं कि डॉल्फिन के अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट प्रदूषित पानी ने डाला है। वे बताते हैं कि डॉल्फिन पानी से निकल कर पांच मिनट में खुले में सांस लेती है और फिर आठ घंटे तक यह गहरे पानी में चली जाती है और आसानी से पानी के अंदर सांस लेती रहती है। सांस लेने के लिए जब यह पानी से उछाल लेती है तो इसका उछाल देखने लायक होता है।

प्रदूषित, उथली और मर रही नदियों को बचाए बिना डॉल्फिन कैसे बचेगी, पता नहीं।
 

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दिनेश शाक्यदिनेश शाक्यइटावा के रहनेवाले दिनेश शाक्य १९८९ से मीडिया में कार्यरत.

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