पुन: अपि नर्मदा

Submitted by Hindi on Sat, 02/19/2011 - 12:10
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा

कितना अच्छा हुआ कि संक्रांति के दूसरे ही दिन नर्मदा मैया का काव्यमय दर्शन करके पुनीत हो सके! धुआंधार, चौंसठ योगिनीवाला गौरीशंकर का मंदिर और सफेद, नीले, पीले, हरे, काले पहाड़ों के बीच रास्ता निकालने वाली शांत गंभीर और प्रसन्न शीतल पानी वाली नर्मदा का भेड़ाघाट यह प्रेरणा दायीत्रयी है।

पता नहीं यहां कितनी दफा आया हूं। लेकिन हर दफे नर्मदामाता का नया ही दर्शन होता आया है। केवल सनातन है आस-पास के कुदरत का दृश्य, ऊपर का आकाश और भक्तिभाव से इस स्थान का दर्शन करने वाला भोला सनातनधर्मी यात्री।

पता नहीं हमारी संस्कृति में पुण्य की कल्पना कहां से आयी? पुण्य के स्थान, पुण्य के प्रसंग और पुण्य के प्रकार अनंत दीख पड़ते हैं।

भोले लोगों की पुण्य की कल्पना धन के लोभी या सर्राफों के जैसी ही संकुचित और अनुन्नत होती है। आदमी दूसरा कुछ भी नहीं सोचेगा। पुण्य किसमें हैं, किस लिए है अथवा है या नहीं, इस बात को विचारे बिना पुण्य को इकट्ठा किया जाता है। मेरे मन असली पुण्य के जैसी व्यापक भावना शायद ही दूसरी कुछ होगी। जो भी चीज उन्नतिकारक है, श्रम साध्य् है, और आदर के साथ याद रखने लायक है सबमें पुण्य ही पुण्य है। आज हमने सचमुच पुण्य के ढेर प्राप्त किए और हम उन्नत हुए।

जबलपुर से आते हुए रास्ते में किसी आदिवासी राज्य के पुराने महल दीख पड़ेंगे ऐसी अपेक्षा से ही मैं यहां की यात्रा का प्रारंभ करता हूं।

प्रपातों के सामने बैठकर या खड़े रहकर जब-जब मैंने ध्यान किया है, बड़ा आनंद आया है। चिंतन अच्छा चला है। लेकिन शांत, एकाग्र ध्यान हो नहीं सका। यह पुराना अनुभव है इसलिए इस वक्त भी सच्चे ध्यान की अपेक्षा ही मैंने नहीं की थी। पानी के प्रपात का अखंड स्रोत देखकर थोड़ा चिंतन करूं तो बस है। जिस तरह गाने के लिए तंबूरा या वीणा साथ देते हैं उसी तरह चिंतन के लिए प्रपात का साथ अच्छा रहता है। वीणा या तंबूरे को बजाना पड़ता है। उसकी ध्वनि बंद भी पड़ सकती है। ‘यहां के प्रदेश पर असली अधिकार आदिवासियों का था। इनको हटाकर, दबाकर, इनका राज्य हमने ले लिया’ ऐसी भावना उठकर हमेशा मन में ग्लानि रहती थी। अफ्रिका के काले लोगों को हटाकर, दबाकर, यूरोप के गोरों ने उनकी जमीन ले ली। ऐसे गोरों के साथ हमारे पूर्वजों की मैं तुलना करता था और दुःखी होता था।

जब गोरों ने अफ्रिका की भूमि अपनायी तब वहां सुधरी बस्ती तैयार करने के लिए रास्ते और मकान बांधने के लिए मजदूरों की जरूररत खड़ी हुई। गरम मुल्क में खेती करना भी गोरों के लिए कठिन था। दोनों कामों के लिए मजदूर चाहिये। अफ्रिका के काले बाशिंदे मजदूरी करने के लिए तैयार नहीं थे। चाहे जितनी मजदूरी का प्रलोभन दिखाइये, शराब भी पिलाइये, अफ्रिकावासी काला आदमी मजदूरी के लिए आता ही नहीं था।

सब गोरों ने एक तरकीब निकाली। गोरों ने ‘अपने’ मुल्क में रहने वाले इन काले लोगों पर टैक्स लगाया और कहा टैक्स न दोगे तो हमारे मुल्क मे रह नहीं सकोगे। अब ये काले लोग टैक्स के पैसे कहां से लावें और जायें भी कहां? मजबूरन उनको मजदूरी करनी पड़ी। कहीं-कहीं गोरों ने उनको जानवर जैसा गुलाम भी बनाया। वह सारा इतिहास यहां याद नहीं करना है।

अच्छी जमीन में हम लोग आ बसे और आदिवासियों को जंगल में अथवा बंजर जमीन पर जाकर रहना पड़ा।

यूरोप के गोरों ने अफ्रिका के काले लोगों को जिस तरह से सताया वैसे हम लोगों ने आदिवासियों को सताया सही, किन्तु ‘ये आदिवासी हमारे, जैसे संस्कारी नहीं हैं और हमारे संस्कार सीखने का अधिकार भी इन्हें नहीं है’ ऐसा सोचकर हम लोगों ने उनका सामाजिक बहिष्कार किया। (यूरोप के लोग लोभ और शोषण से प्रवृत्त हुए थे। हम लोग अभिमान से और तिरस्कार से प्रवृत्त हुए थे। यह बड़ा सांस्कृतिक फर्क था।

आज मेरे चिंतन में पुराने ढंग के विचार नहीं रहे हैं। मैं मानता हूं कि जमीन किसी की भी नहीं है। पशु-पक्षी और कृमिकीट जमीन पर रहते हैं इसलिए जमीन उनकी नहीं होती। जमीन पर मालिकी हक किसी का नहीं। हवा, पानी और जमीन कुदरत की देन है। आदिवासी यहां आकर रहे इस वास्ते यहां रहने का उनका अधिकार हो गया। उसके बाद आसपास से हम लोग आये। हमारा भी यहां रहने का अधिकार स्वाभाविक था, शर्त यही कि यहां के आदिवासियों का अग्रिम अधिकार मान्य करके हम उनके साथ रहे, उन्हें हम अपनावें। खेती, गृहनिर्माण, औजारों की बनावट आदि जीवन-कलाएं हम उनकों सीखायें और आदिवासियों के साथ हम घुल-मिल जायें, ओतप्रोत हो जायं, यहीं स्वाभाविक धर्म था। यूरोप के गोरे अफ्रिका में जाकर बसे और वहां की प्रकृति से उन्होंने लाभ उठाया, इसमें आज मैं दोष नहीं देखता। किन्तु गोरे लोग अपने को श्रेष्ठ मानकर अलग ही रहे और कालों को हीन मानकर शोषित प्रजा बनाने का तैयार हुए। यह उनका पाप था, मानवता का द्रोह था। हमारे यहां हम लोग अपने को श्रेष्ठ जाति के मानकर अदिवासियों से अलग रहे, हमने आदिवासियों को अपने साथ न लिया, उनको हमने हटाया और अपनी जीवन-कला उनकों नहीं सिखायी। जातिभेद निर्माण करके ऊंचनीच भेद चलाया। यह था हमारा पाप।

सारी की सारी जमीन पर अपना हक मानना और लोगों को दूर रखना, लड़ाई करके लोगों को हराना यहीं बड़ा पाप था। जीवन-कला और सांस्कृतिक लेन-देन करते रहना और सबको अपनाना यहीं है सार्वभौम मानवधर्म।

हम यात्रा को निकले हैं, चिंतन चलाने के लिए नहीं; इसलिए यह विचार परंपरा यहीं पर छोड़ देना अच्छा है।

दुनिया में मोटरों का आविष्कार हुआ और हर देश में रास्ते बहुत अच्छे हो गये। आना-जाना, माल का लेनदेन करना बड़ा आसान हो गया है।

करीब बीस किलोमीटर या कम की यात्रा करके हम धुआंधार के नजदीक पहुंचे। मोटर से उतरकर पहाड़ी, पत्थरों के बीच हम पैदल जाने लगे। जवानी के दिनों में हम पत्थरों के सिर पर पाँव रखते हुए करीब दौड़ते-दौड़ते धुआंधार के प्रपात तक पहुंच सकते थे। अब वह दिन रहे नहीं। बड़ी मुश्किल से अपना तोल संभाल कर जाना पड़ता था। सारा ध्यान तोल संभालकर जाना पड़ता था। सारा ध्यान तोल संभालने पर देने वाले के लिए कुदरत का निरीक्षण और प्राकृतिक सौंदर्य का पान कठिन होता है। तो भी अनुभवी आंखें बीच-बीच में ठहर कर सौंदर्य का निरीक्षण करती ही चलीं।

इस पहाड़ी प्रदेश में छोटी-सी झोंपड़ी बांधकर रहनेवाले और यात्रियों कसे मुफ्त आहार पाने वाले साधुओं की ईर्ष्या करना स्वाभाविक था। लेकिन यहां अनेक बार आया हूं। इसलिए मैं न यहां के पेड़ों की ईर्ष्या करता हूं, न साधुओं की अदेखाई (दूसरों की अच्छी स्थिति देख न सकने के कारण होने वाला द्वेष)।

मैं इर्द-गिर्द संगजराहत के मुलायम पत्थर ढूंढ़ने लगा। इन पत्थरों की मुझे तो दया आती है। कोई भी आदमी उन्हें उठाकर उनके टुकड़े आसानी से कर सकता है। करवत लेकर लकड़ी के जैसे पत्थरों को काट भी सकता है। संगमरमर की जिस तरह मूर्तियां बनाते हैं उसी तरह संगजराहत की बहुत आसानी से मूर्तियां बन सकती हैं। लेकिन टिकेंगी तभी तो इनकी कीमत! यह भेद न जानने वाले लोग बहुत दाम देकर भी यहां से मूर्तियां और ताजमहल जैसी चींजें खरीदते हैं।

सनातनधर्मी पूजक नर्मदा के किनारे आते ही मजबूत पत्थर के अनेक रंग के शिवलिंग खरीदेंगे। उनका सूत्र है ‘नर्मदा के प्रवाह में जितने हैं कंकर, सब हैं शंकर’।

हमने बचपन में सुना था, नेपाल की गंडकी के किनारे शालिग्राम मिलते हैं और नर्मदा के प्रवाह के पत्थर एक-दूसरे से घिसकर लंबगोल अंडे जैसे शिवलिंग बनते हैं। बाद में हमने देखा की सच्चे शालिग्राम पानी के कीड़े के बनाये हुए उनके घर है। और पानी के प्रवाह की मदद के बिना आदमी नर्मदा के पत्थर घिसकर शिव लिंग बनाता है। जो हो, शालिग्राम और शिवलिंग की पूजा भारत में सर्वत्र होती है और इसीलिए गंडकी और नर्मदा गंगा के जितनी ही पवित्र मानी जाती है।

हम पत्थरों को लांघते और सहयात्रियों को संभालते धुआंधार पहुंच गए। बारिश के दिनों में जब सारा प्रदेश जलाकार हो जाता है। तब कहां का धुआंधार और कहां का पथरीला रास्ता, पानी के विस्तार में सब कुछ डूब जाता है।

गर्मी के दिनों में नदी का प्रवाह जब क्षीण हो जाता है। उस वक्त धुआंधार की शोभा अलग हो ही जाती है। धार तो प्रमाण में क्षीण, लेकिन नीचे पत्थरों पर पटकते ही उसमे से जो तुषार उड़ते हैं उनका धुआं सारी घाटी में व्याप्त हो जाता है। मैंने वहां सौन्दर्य कई बार देखा है। आज वह नहीं था। धार बड़ी तेज थी और धुआं कम। जिसकी शोभा कुछ कम ही कहनी चाहिए।

अबकी बार ऊपर का पानी जोरों से आता था इसलिए प्रपात का रंग बिल्कुल हरा दीखता था उसकी दो बाजुओं की किनारी सफेद नहीं होती तो उसको देखने का मजा भी नहीं आता। अबकी बार बड़ी निराशा इसलिए हुई कि हम जरा जल्दी पहुंचे थे। सूरज सिर पर नहीं आया था और धुआं भी कम था। इसलिए धूप में इंद्रधनुष देखने की मेरी इच्छा तृप्त नहीं हुई। (मैं तो पुराना यात्री। दुनिया में ऐसे अद्भुत और दिव्य दृश्य अनेक देखे हैं। इसलिए पुराने सारे दृश्य कल्पना में जागृत कर सकता हूं और उनका आनन्द ले सकता हूं। लेकिन साथियों को दिखाने का आनंद कहां से खड़ा करूं?)

उभयान्वयी नर्मदा का दर्शन पाते ही वहां बैठकर ध्यान करने की इच्छा प्रबल होती ही है। मैंने आराम से बैठने का स्थान ढूंढ़ा। पुरानी परिचित जगह पर हर किसी यात्री ने धोती सुखाने के लिए फैलायी थी। दूसरी अच्छी जगह थी नहीं। आगे जाकर थोड़ा उतरता तो वहां पर अच्छी जगह मिलती, जहां मैंने पिछली दफे ध्यान किया था। लेकिन वहां तक जाने की अब हिम्मत नहीं रही इसलिए जहां खड़ा था वहां बैठकर द्विविध ध्यान किया, आंखे मूंदकर भी और आंखे खुली रखकर भी।

प्रपातों के सामने बैठकर या खड़े रहकर जब-जब मैंने ध्यान किया है, बड़ा आनंद आया है। चिंतन अच्छा चला है। लेकिन शांत, एकाग्र ध्यान हो नहीं सका। यह पुराना अनुभव है इसलिए इस वक्त भी सच्चे ध्यान की अपेक्षा ही मैंने नहीं की थी। पानी के प्रपात का अखंड स्रोत देखकर थोड़ा चिंतन करूं तो बस है। जिस तरह गाने के लिए तंबूरा या वीणा साथ देते हैं उसी तरह चिंतन के लिए प्रपात का साथ अच्छा रहता है। वीणा या तंबूरे को बजाना पड़ता है। उसकी ध्वनि बंद भी पड़ सकती है। फिर तो केवल उसके स्मरण से ही संतोष मानना पड़ता है। यहां प्रपात का दृश्य और उसकी ध्वनि अखंड चलती रहती है। उसकी मस्ती कुछ अलग ही रहती है। प्रपात के सामने कोई द्यान धरे या वार्तालाप करे कोई फोटे ले या पानी की मछलियों का पकड़े, प्रपात को उसकी परवाह ही नहीं। वह अपनी मस्ती में तल्लीन रहता है। उसकी यह मस्ती चिंतन के लिए अत्यन्त पोषक किन्तु ध्यान के लिए बाधक होती है ऐसा मेरा पुराना अनुभव है। गिरसप्पा के चार प्रपात हिमालय के अनेक प्रपात और पूर्व अफ्रिका में नाइल नदी के उद्गम का छोटा-सा प्रपात सब जगह एक ही अनुभव था। अमेरिका के नायगरा के प्रपात के सामने यात्रियों की भीड़ इतनी थी और दृश्य इतने विविध थे कि उसकी मस्ती का लाभ चिंतने के लिए भी ठीक मिल न सका था।

आज नर्मदा के धुआंधार के सामने बैठते ही एकदम ध्यान लग गया। जिस पत्थर पर बैठा था। वह विशेष अनुकूल नहीं था। उसका विक्षेप क्षण-दो-क्षण सहन करना पड़ा। लेकिन ध्यान की उत्कटता में ऐसे सारे विक्षेप गल गये और प्रपात के सामने पहली बार मैं ध्यान-मग्न हो सका। बड़ा आनंद आया।

बचपन में मैंने मूर्तियों का ध्यान किया होगा। उसमें तो ध्यान नहीं किन्तु कल्पना का ही बाल-विलास था। पत्थर की मूर्ति हो या पूजा का का नारियल हो; उनकी आंखे देखकर में प्रसन्न आशीर्वाद की अपेक्षा करता था। अपेक्षा उत्कट हो गयी तो लगता था कि मूर्ति (अथवा नारियल, मेरी ओर देख रहे हैं। कल्पना में भिन्न-भिन्न भाव जागृत होते थे। कभी लगता था कि आंखें गम्भीर हुई है, कभी लगता था कि आंखें उपेक्षा कर रही हैं। एक दो दफे लगा था कि आंखों में असंतोष या डांट है। मैं तुरन्त अंतर्मुख होकर अपने दोष ढूंढ़ता था। (और बचपन के दोष, बचपन की अतंर्मुखता दोनों की आज स्मरण करता हूं तब उस समय के दत्तु के प्रति आज मन मे कौतुक का ही भाव जागृत होता है।) कभी-कभी मूर्ति की आंखों में और खास करके महीनों तक जिनकी मैंने पूजा कि थी उस नारियल की आंखों में प्रसन्नता दीख पड़ती थी और मैं धन्य होकर उसी की मस्ती में दिन व्यतीत करता था जोरो-जोरों से नाम स्मरण चलाता था- ‘साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव’।

आगे जाकर किसी ने मुझे सिखाया- ‘शिव हर शंकर गौरीशं, वंदे गंगाधरमीशम्।।’

बाल्यकाल के ऐसे ध्यान के दिन चले गये। पौराणिक वार्ताएं पढ़ने से कल्पना शक्ति बढ़ी और ध्यान की जगह नाटक के दृश्य के जैसी मानस-पूजा चली। उसका विस्तार यहां नहीं करूंगा। उसका महत्त्व भी कुछ नहीं है।

बीच के दिनों की बात भी यहां करना अप्रस्तुत है। जब मैं वेदान्त के अध्ययन में मस्त हुआ तब आत्मा-परमात्मा का ध्यान करने की कोशिश मैंने चलायी। तब तो ध्यान माने ज्ञान का स्मरण और संकीर्तन ही बना। उसे मैं चिंतन भी नहीं कहूंगा। अद्वैत वेदान्त का और मायावाद का स्मरण करने में ही सारी शक्ति लगाता था। स्मरण करते-करते नींद आने का अनुभव उन दिनों मुझे नहीं था। किन्तु स्मरण करते-करते लौ लग जाती थी। उसे मैं अपने संतोष के लिए Thoughtlessness कहता था अंग्रेजी में Thoughtlessness का अर्थ अलग है सो मैं जानता था। उसकी मुझे परवाह नहीं थी। निर्विकल्प स्थिति के जैसी ही यह स्थिति थी, ऐसा मैं कह सकता हूं। वह स्थिति ज्यादा देर तक टिकती नहीं थी। उस स्थिति का आनंद तो था लेकिन कबूल करना पडता है कि उस स्थिति का आनंद कम और अभिमान ज्यादा होने लगा और बाद में मैं शरमाया। एक क्षण के लिए निर्विकल्प स्थिति आ गयी तो उसमें बहादुरी कैसी? उसे तो ‘अकस्मात्’ (संयोग आकस्मिक घटना) ही कहना चाहिये। जब तक चित्तशुद्धि नहीं हुई है, वासना विजय नहीं हुई है, तब तक थोड़ी सी ध्यान-सिद्धि का कोई महत्त्व नहीं है। (उस अवस्था का थोड़ा सा अनुभव हुआ इसलिए उस पर विश्वास जम गया और आस्तिकता का उदय हुआ। इतना ही लाभ समझना चाहिए।)

मैने सोचा कि बचपन की मूर्ति-उपासना और सगुण-ध्यान के अनुभव के कारण ‘परमात्मा का ध्यान’ एक तरह का हो सकेगा सही। वह अच्छा भी होगा। लेकिन मुझे तो प्रथम अपना आत्मा का ही ध्यान करना चाहिये। संकल्प-विकल्प से परे वासनाओं से भिन्न, और गुणदोषों से अलिप्त, उसी आत्मा को (Soul या Self को पहचानना और उसके सात तादात्म्य का अनुभव करना, यही सबसे बड़ा काम था। लेकिन मैं ही वह हूं ऐसा साक्षात्कार कैसे हो? वर्षो तक लड़ता रहा। मुश्किल मैं जानता था लेकिन जानने से क्या लाभ? मुश्किलें दूर होनी चाहिए। जब मैं अपने को समझाता था कि दार्शनिक चिंतन को वहीं आत्मा मैं ही हूं तब मैं की जगह आत्मा नहीं किन्तु एक तरह का अभिमान ही स्थानापन्न होता था। अभिमान (Pride) को हटाना आसान था। किन्तु अहम्-प्रत्यय (Personality) को ही आत्मा समझने को मैं तैयार नहीं था। आत्मा उससे परे है यह न समझूं तो मैं जीवात्मदशा में ही रह जाऊंगा, इतना तो मैं जानता था।

इस काल का मेरा ध्यान और चिंतन एक रूप था। अपने ही साथ लड़ना था। शिकायत किसकी करूं? किसके सामने करू? संतों के वचन में जानता था। शास्त्र वचन मुखोद्गत थे सब तरह की नसीहतें मेरे सामने थी। लेकिन मैं कूदकर अपनी आत्मा को, विशुद्ध निर्लिप्त आत्मा को पकड़ नहीं सकता था। मेरे ध्यान चिंतन का मुख्य हिस्सा यही है। इसका सुख-दुःख, इसकी आशा-निराशा किसे कहे?

मैंने मान लिया कि मंत्र के जाप से मदद मिलेगी। जाप जोरों से चलाया। उससे कितनी मदद मिली कह नहीं सकता। ओमकार के जाप की (प्रणव के जाप की) मस्ती कुछ अलौकिक होती है। उसके द्वारा आंतरिक शुद्धि बहुत हुई। अलिप्तता जोरों से बढ़ने लगी। वासनाओं का जोर क्षीण हुआ। लेकिन मेरे दार्शनिक अध्ययन में जो प्रगति हुई उसमें ब्रह्मविद्या की दैवी शक्ति की उपासना आवश्यक है ऐसा विश्वास हुआ। और मैंने शाक्तमंत्र और शाक्त-उपासना चलायी। उसके विविध अनुभव वहां देने नहीं बैठूंगा।

शुद्ध शाक्त-उपासना के साथ मैं हिमालय गया वहां ध्यान करते-करते सगुण निर्गुण का भेद यकायक टूट गया। सगुण साकारमुर्ति अवतारी पुरुषों का चिंतन संत-माहात्माओं के प्रति कृतज्ञता, यह सब गौण होकर ‘विशाल विश्व को ही ईश्वर- का आद्य अवतार’ समझकर उसी की सगुण और सरूप उपासना शुरू हई।

मेरी जीवन साधना में यह सबसे बड़ा और महत्त्व का परिवर्तन हुआ।

बचपन में ही मैं सफर का शौकीन और कुदरत के सौन्दर्य का आशिक था। अपने छः भाइयों में और एक बहन में सबसे छोटा था। बहन ससुराल पहुंची थी। बचपन से धर्मोपदेश सुना था। उसने प्रधान बात थी कि ‘छोटे भाई को बड़े भाई की वैसी ही भक्ति करनी चाहिये, जैसी लक्ष्मण ने राम की थी’। मैं पांच भाइयों की भक्ति करने लगा और पांचों बड़े भाई मेरी भक्ति अथवा आज्ञाकारिता वसूल करने लगे। मेरा दम निकल गया, लेकिन कभी भी बगावत न सूझी। परेशान होकर मैं कुछ अंतर्मुख और एकांत-प्रिय बना। मां-बाप को छोड़कर औरों के संपर्क से कुछ अरुचि पैदा हुई। मनोमंथन की वह उम्र नहीं थी। लेकिन अपने ही सहवास में रहने की आदत बढ़ी। खूब कल्पना चलाने लगा। साथ-साथ समाज में घुलमिल जाने की हिम्मत कम होने लगी।

आसपास के पत्थर कहते हैं। कि देखने को हैं हम पत्थर, लेकिन असल में हैं नर्मदा के प्रवाह के खिलौने। आज एक जगह पर और नर्मदा ने चाहा तो कल दूसरी जगह पहुंच जायेंगे। पता नहीं हम यहां किस वक्त और कैसे आ पड़े हैं? हमारा एक ही अनुभव है कि नर्मदा का प्रवाह जब जोरों से बहता है तब हम एक-दूसरे से घिसकर गोलमटोल बनते हैं। हम हैं प्राचीन, सख्त से सख्त पत्थर। किन्तु हमारे बाजू पर जैसे सफेद पत्थर है। संगजराहत, जिन्होंने पत्थर बनाना चाहा किन्तु उस कला में वे असफल ही रहे उनकों देखकर हमें दया आती है। इस परिस्थिति के कारण मुझे अपना आनंद आसपास की प्रकृति से-कुदरत से लेना सूझा। और कल्पना शक्ति बढ़ने से यथासमय मैं अंतर्मुख होने लगा।

यह मुख्य कारण है कि मुझे बहुत ही जल्दी अध्यात्मवाद प्यार हो गया था। कुदरत के सहवास में मेरी असामाजिकता मुझे तनिक भी नहीं अखरी।

बचपन की इस स्थिति को समझाये बिना मैं कैसे स्पष्ट कर सकता कि हिमालय में जाते ही मेरी सगुणोपासक और ध्यान की आदत कुदरत की ओर मुड़ी? विशाल प्रकृति को मैने अपनी सगुणोपासक साधना का ध्येय या लक्ष्य बनाया। बचपन का प्रकृति-प्रेम-सौंदर्यानुभूति और भव्यता की अनुरक्ति उच्चगामिनी हुई और मेरा कलाप्रेम अध्यात्म की सुगंध से सुगन्धित हुआ। वेदान्त ने दुनिया के प्रति अरुचि अथवा वैराग्य बढ़ाने का सिखाया था मैंने वह सारी अरुचि सामाजिक जीवन के प्रति केंद्रित की।

जब राष्ट्रसेवा का और स्वराज्य-प्राप्ति का आदर्श सिर पर सवार हुआ तब स्वजनों की सेवा उत्साह के साथ करते हुए भी मेरी अलिप्तता खंडित न हो सकी और कुदरत के साथ जो मेरी प्रथम आत्मीयता थी उस पर दैवी तत्व का रंग चढ़ा।

परमात्मा के लिए वेदान्त के उत्तम दो शब्द है ‘भूमा’ और ‘ब्रह्म’। (भूमा शब्द अल्प का विरोधी है। जिसमें विशालता है, समृद्धि है, आनत्य है वह है भूमा। ब्रह्म शब्द भी वृहद पर से आया है। वृहत् याने बड़ा, विशाल। जो सर्वव्यापी है, विशाल, विराट है वही ब्रह्म है।)

प्रारंभकाल में मैंने आत्मा का चिंतन, (अंतरतर आत्मत्व का ध्यान) चलाया था वह जब निराकार निर्गुण हुआ तब आत्मा और परमात्मा भिन्न नहीं हैं इसकी अनुभूति होने लगी थी।

(कॉलेज के दिनों में जर्मन फिलसुफ इमन्युअल कॅन्टका तत्त्वज्ञान पढ़ते Thing-in-itself का वर्णन आता था। पदार्थों के स्वरूप आदि तमाम गुणधर्म बाजू पर रखने से, दूर करने से, जो बाकी रहता है उसे कॅन्ट Thing-in-itself कहते हैं। अब पदार्थों की संख्या भी एक गुण है। उसे भी जब हम दूर करते हैं तब Thing-in-itself का अनेक वचन हो नहीं सकता यह बात ध्यान में आयी और वस्तु परमार्थतः विराट् है इसका साक्षात्कार हुआ। इसका चिंतन करते-करते ध्यान में आया कि जीवात्मा का व्यक्तित्व दूर किए बिना आत्मतत्व प्रगट नहीं होगा। इस तरह जीवात्मा का व्यक्तित्व दूर होते ही वही परमात्मा है, विराट परब्रह्म है इसका विश्वास, इसकी तसल्ली, और इसका साक्षात्कार यकायक हो गया।)

मुझे याद है, कॉलेज के दिनों में सुबह चार बजे अपने कमरे में टेबुल पर बैठकर इस चीज का ध्यान करता था। Thing-in-itself के लिए में तत् कहता था। तत् को पूर्णरूप से समझने की मेरी खोज को मैं “तत्ता की शोध” कहता था।

इस खोज में जब मैं मुकाम पर पहुंच गया और आत्मा-परमात्मा का ऐक्यभाव हृदय में उतर गया तब मुझसे रहा न गया। मैं एकदम टेबुल पर से कूद पड़ा।

कूद पड़ता था तो स्वाभाविक लेकिन बाद में मुझी को उसमें आश्चर्य हुआ कि आत्मा-परमात्मा के ऐक्य का क्षणमात्र अनुभव होने से इतना आनंद और उत्साह हुआ कि मैं आपे से बाहर होकर छलांग मारकर टेबुल पर से नीचे खड़ा हो गया। तब से यह ‘तत्ता की शोध’ मेरे जीवन की एक महत्त्व की बात हो गयी है। इस शोध ने मेरे ध्यान की बहुत कुछ मदद की है।

बहुत वर्षों के बाद जब मैं पातंजल योगदर्शन ले बैठा तब मुझे धारणा, ध्यान और समाधि कि त्रिपुटी के लिए पारिभाषिक शब्द ‘संयम’ मिला। मुझे वह अच्छा लगा। अब ध्यान के लिए जो भी चीज पसंद करूं उस पर संयम करना आसान हो गया।

योगसूत्रों में और हमारे सबके सब धर्मग्रंथों में किसी चीज की जब फलश्रुति बताते हैं तब शास्त्रकार भी ठोस अनुभव को छोड़कर गगनविहार करते हैं और मनमानि फलश्रुति बताते हैं। फलश्रुति में थोड़ा कुछ सत्य रहता होगा, लेकिन कल्पना-विहार ही अधिक है। और जब शास्त्रियों को हम छेड़ते हैं और पूछते हैं कि फलश्रुति कहां तक सही है? फलश्रुति का अनुभव किसी को है तो बताइये, तो निर्लज्ज होकर हंसते-हंसते कहते हैं, रोचनार्था फलश्रुतीः शास्त्र-साधना की ओर लोगों को आकर्षण हो रूचि हो इस वास्ते मनमाना लाभ बताया जाता है।

शास्त्रग्रंथों में भी सत्यनिष्ठा को बाजू पर रखी हुई देखकर बड़ी ग्लानि होती है।

ध्यान में ‘एकाग्रता’ चाहिये इसमें शक नहीं लेकिन एकाग्रता से भी बढ़कर ‘उत्कटता’ चाहिये। इस बारे में मैंने अन्यत्र लिखा है उसकी पुनरुक्ति यहां नहीं करूंगा।

धुआंधार में ध्यान करते नया अनुभव हुआ कि जिसका ध्यान करते हैं वह चीज स्थिर और शांत स्थिति में हो, इसकी आवश्यकता नहीं है। प्रपातों के सामने मैं ध्यान नहीं कर सकता था। यह कमी दूर हुई और अबकी बार पहली दफे यहां ध्यान कर सका। इससे बड़ा लाभ हुआ।

विश्व में सब कुछ गतिशील है। पृथ्वी की तीन गतियां (एक दैनंदिनगति, दूसरी वार्षिकी और तीसरी अयनचलन की। चंद्र, पृथ्वी, ग्रह, सूर्य, तारे, नक्षत्र, निहारिका, विश्व, सब कुछ गतिशील है। उसमें प्रगति हो या न हो।) गति तो चैतन्य का लक्षण ही है। स्वयं आत्मतत्त्व भी हृदिसंस्फुरत् है इसका अनुभव होता गया, तब से मेरा सारा का सारा तत्त्वज्ञान नया रूप धारण कर सका है। यही कारण था कि धुआंधार में ध्यान उत्तम ढंग से हो सका। अबकी बार कूद न पड़ा यही गनीमत।

इसी की मस्ती में धुआंधार से हम लौटे और चौंसठ योगिनियों की टेकरी के नीचे पहुंचे।

मैं चाहता था कि हम पहले भेड़ाघाट जाकर नौकाविहार करें और बाद में गौरी-शंकर का दर्शन करके टूटी-फूटी योगिनियों का आशीर्वाद लेकर वापस लौटें। लेकिन साथियों को यह सूचना पसंद नहीं आयी।

आजकल में सीढ़ियां चढ़ना-उतरना टालता हूं। रहने का प्रबंध और सभाओं का प्रबंध जमीन से ऊंची जगह न हो, सीढ़ियां चढ़नी न पड़े ऐसी सूचनाएं भी देता हूं। ऐसी हालत में एक-सौ आठ सीढ़ियां चढ़ने की हिम्मत कैसे करें? और ये सीढ़ियां भी बूढ़ों के लिए, बच्चों के लिए या बीमारों के लिए बनी हुई नहीं बल्कि तगड़े यात्रियों को ध्यान में रखकर बनाई हुई थीं। बाकी सब लोग दर्शन करके आवें और मैं अकेला नीचे आराम करूं यह भी मन को पसंद न था। धुआंधार के पास बैठकर जो ध्यान किया था उससे शरीर में काफी फुर्ती आयी थी। पेट में ताजा गन्ने का रस भी आश्वासन देता था। मैंने साथियों से कहा “चढ़ने की कोशिश करूंगा। अगर थकान मालूम हुई तो आधे रास्ते से भी वापस आ जाऊंगा। उत्साह से अंधा होकर बेवकूफी नहीं करूंगा। ऊंचाई मुझे हमेशा आमंत्रण ही देती है। उसके सामने हारने को जी नहीं चाहता।”

हम धीरे-धीरे चढ़े सीढ़ियां टालकर बाजू से चढ़ने का भी प्रयोग किया। उत्साह ने पौनी ऊंचाई पार कर दी। अब शक्ति हो या न हो, बाकी की ऊंचाई तय करने में ही बुद्धिमानी थी। (इसका वर्णन करने की भी इच्छा नहीं होती।) किसी तरह चढ़े योगिनियों का दर्शन करते-करते मंदिर की और टेकरि की भी प्रदक्षिणा हो गयी। अंदर जाकर नवविवाहित दंपति के जैसे नंदी पर बैठे शिवपार्वती का दर्शन किया, नृत्यगणपति को नमस्कार किया और बाहर आकर भूमिशायी बन गया। टेकरी पर की ठंडी हवा और सकलगात्रों को शिथिल करने वाले शवासन की मदद से थकान उतर गयी। और हम धीरे-धीरे टेकरी उतरकर अपने तैलवाहन तक पहुंच गये।

लोग कहते हैं आरोहणं तु सायासं अनायासं तु पातनं (इसमें पातन शब्द ठीक नहीं है। ऊपर चढ़ने में आयास-तकलीफ बहुत, नीचे उतरने में कोई आयास नहीं।

मेरा अनुभव ऐसा नहीं है और पर्वतारोहण करने वाले अनेकों का अनुभव भी मेरे जैसा ही है। चढ़ने में परिश्रम है सही, किन्तु हम सुरक्षित रहते हैं। अपनी शक्ति देखकर हम चढ़े। धीरे-धीरे चढ़े। सांस संभालकर चढ़े लेकिन उतरते समय तौल सारे शरीर का संभालना पड़ता है। और जो भी कदम आगे रखते हैं उसको सारे शरीर का भार सहन करना पड़ा है। चढ़ने की हिम्मत हो सकती है। मुझे तो उतरने का डर ही लगता है। और चढ़ने के बाद उतरे बिना चारा ही क्या? लाचार होकर उतरना ही पड़ता है।

खैर, मोटर में बैठकर भेड़ाघाट के आरामगृह तक पहुंच गये। आराम करना तो था ही नहीं। फिर नीचे उतरना पड़ा। बड़ी समस्या थी। लेकिन सामने नर्मदा मैया का शांतस्वरूप और दोनों बाजू ध्यानस्थ खड़े हुए संगमरमर के विशाल पाषाण दोनों ने अपना मूक आग्रह चलाया और हम हिम्मतपूर्वक पानी के किनारे तक उतर गये। वहां एक सज्जन व्यवस्थापक मिले, जिन्होंने कहा “आप चिंता न करें वापस जाते समय आराम कुर्सी पर बिठाकर आपको ऊपर कार तक ले जाने की प्रबंध आसानी से हो जाएगा।” केवल वाणी ने नहीं किंतु हमारी आंखों ने, पांवों ने और सांस लेने वाले फेफड़ों ने उनकों धन्यवाद दिया और हम किश्ती में जा बैठे। हमारी किश्ती का नाम था ज्योति। उसी के नजदीक दूसरी किश्ती थी जिसका नाम ‘अप्सरा’ अन्वर्थक था! लेकिन उसमे जाने का हमारा भाग्य नहीं था। हम थोड़े ही स्वर्ग के देव थे कि अप्सरा का सहारा लें! (जो पानी से निकली है अथवा पानी में सर (चल) सकती है उसी को अप्सरा कहते हैं। अप् यानी पानी।)

धुआंधार और भेड़ाघाट के बीच दो मील का भी अंतर नहीं होगा। दोनों जगह नर्मदा नदी ही है। लेकिन दोनों का वायुमंडल एकदम भिन्न। धुआंधार जाते हम टेढ़े-मेढ़े (किन्तु गोल) छोटे बड़े पत्थर के सिर पर पांव रखकर नर्मदा के प्रवाह का दर्शन करने जाते हैं! और धुआंधारों में नर्मदा नदी का जल मानो उन्मत्त होकर ऊंचाई से नीचे कूद पड़ता है? क्या उसका वेग और क्या संभ्रम! आसपास के पत्थर कहते हैं। कि देखने को हैं हम पत्थर, लेकिन असल में हैं नर्मदा के प्रवाह के खिलौने। आज एक जगह पर और नर्मदा ने चाहा तो कल दूसरी जगह पहुंच जायेंगे। पता नहीं हम यहां किस वक्त और कैसे आ पड़े हैं? हमारा एक ही अनुभव है कि नर्मदा का प्रवाह जब जोरों से बहता है तब हम एक-दूसरे से घिसकर गोलमटोल बनते हैं। हम हैं प्राचीन, सख्त से सख्त पत्थर। किन्तु हमारे बाजू पर जैसे सफेद पत्थर है। संगजराहत, जिन्होंने पत्थर बनाना चाहा किन्तु उस कला में वे असफल ही रहे उनकों देखकर हमें दया आती है।

धुआंधार के आसपास का प्रदेश खुला है। इसलिए यहां पर हवा स्वच्छंद दौड़ती है और सारे प्रदेश को शीतलता बख्शती है।

इधर भेड़ाघाट में संगजराहत का नाम नहीं। भिन्न-भिन्न रंग के संगमरमर की ऊंची-ऊची चट्टानों के पांव धोती नर्मदा के शांत-शीतल ध्यान मग्न प्रवाह में नौका चलाकर सफेद, पीले,नीले, पत्थरों की भव्य शोभा देखते-देखते नौकाविहार करते डर लगता है कि हम जोर से बोलें या नौंका के डांड से पानी की आवाज हो जाय तो घाठी की शांति का भंग होगा और दोनों बाजू के पहाड़ों के शिखर नाराज होकर हमें डांटेंगे।

इस घाटी में जहां से पानी आता है वहां पानी की जरा-सी कलकल सुनाई देती है। दूसरी तरफ भेड़ाघाट को खत्म करके पानी जहां दौड़ता है वहां पर भी प्रवाह मुखर है। लेकिन बीच के सारे प्रवाह में मानों सरोवर की शांति है और किश्ती में बैठकर जब प्रतीप जाते हैं तब ऐसा ही लगता है कि तीन बाजू पहाड़ है। आगे के लिए रास्ता ही नहीं। नजदीक जाने पर आगे का रास्ता प्रगट होता है।

टेढ़े-मेंढ़े प्रवाह में नौकाविहार करते और संगमरमर की शोभा देखते भूल ही जाते हैं कि बाहर की दुनिया कैसी है।

एक जगह प्रवाह के दोनों बाजुओं के ऊचे पहाड़ इतने नजदीक आये हैं कि कहते हैं, मध्यकालीन किसी सरदार ने पहाड़ के एक शिखर से अपना घोड़ा कूदाकर प्रवाह के दूसरे बाजू के शिखर पर छलांग मारी। आज उस स्थान को बंदर-कूद कहते हैं। क्योंकि बड़े-बड़े बंदर यहां प्रवाह के एक बाजू से दूसरे बाजू कूदकर आसानी से अपने खेल खेलते हैं।

जब भेड़ाघाट देखने सबसे पहले आये थे तब मध्यकालीन क्षात्र-जीवन के ऐसे अनेक किस्से सुनते मजा आया था। और मध्यकालीन इतिहास का चित्र खड़ा करते कल्पना को अद्भुत रस चखने को मिला था। अब तो ऐतिहासिक रस पुराना हो गया है अब तो ‘निसर्ग भव्य शांति की ठोस आध्यात्मिकता’ ही चित्त को घेर लेती है और मानो हम बुद्धि के परे कल्पना के अतीत ध्यान-समाधि का अनुभव ले रहे हैं। ऐसी गूढ़ता यहां प्रत्यक्ष होती है।

चांदनी रात में भेड़ाघाट में नौकाविहार करने का काव्य तो और भी अद्भुत होता है। सिर पर का चांद जरा टेढ़ा हो तो थोड़ा पतला सा सुवर्ण प्रकाश और आस-पास घना अंधकार दोनों का साहचर्य भय और कुतूहल का अजीब मिश्रण कर देता है।

नर्मदा का एक नाम है रेवा! रेवा याने कूदने वाली। नदी के आठ सौ मील के प्रवाह में वह इतनी बार कूदती है कि नर्मदा नौका-यात्रा के लिए बिलकुल काम की नहीं है। भेड़ाघाट में नर्मदा इतनी शांत है कि यहां रेवा नाम लेते भी अयुक्त सा लगता है।

जितनी दफे भेड़ाघाट के दर्शन के लिए आया हूं, मन में ख्वाहिश उठी है कि साधना के लिए यहां आकर दो-तीन महीने के लिए पड़ाव डालकर रह जाऊं और एक-एक जगह आकर दो-दो, चार-चार दिन का आनंद लेकर स्थान बदलता जाऊं। नर्मदा का दृश्य, नर्मदा का वायुमंडल और नर्मदा का अध्यात्म अपने जीवन के द्वारा चूस लिये बिना तृप्ति होगी ही नहीं। सचमुच भारतवर्ष के असंख्य रमणीय स्थानों में भेड़ाघाट की स्तब्ध शोभा अजीब है, मंत्रमुग्ध करने वाली है।

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