काठेवाडी गाँव का कायाकल्प

Submitted by Hindi on Tue, 02/22/2011 - 13:54
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महाराष्ट्र के नांदेड जिले का एक छोटा सा गाँव है काठेवाडी। गाँव की आबादी मात्र ७०० है। तहसील डेगलुर के इस छोटे से गाँव का आज दूर-दूर तक नाम है। नाम है अच्छाई है लिए। इस गाँव को लोग पहले भी जानते थे पर बदमाशी के लिए। गाँव का नाम लेते ही लोगों में डर भर जाता था। गाँव की ज्यादातर आबादी पियक्कड़ थी। लोग पूरे दिन जमकर दारू पीते और बीड़ी फूँकते थे।

गाँव में किसी तरह की कोई सुविधा नहीं थी। लोग पक्के पियक्कड़ थे सो लड़ाई-झगड़े में आगे रहते थे। जिसने टोका, उसी को ठोक दिया। आसपास के लोग गाँव के नजदीक आने-जाने से भी डरते थे। लोग खूब पीते थे, इस कारण कोई दूसरे को कुछ समझता भी नहीं था। गाँव की हालत यह हो गई कि ज्यादातर लोग बीमार पड़ने लगे। ऐसे में आर्ट ऑफ लिविंग ने गाँव को सुधारने का बीड़ा उठाया।

पियक्कड़ों का गाँव पूरी तरह शराब और तंबाकू से मुक्त, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सम्मानित किया, केंद्र सरकार ने ५० हजार रुपए दिए, अब हर घर में है शौचालय, महाराष्ट्र सरकार ने भी सम्मानित किया। आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने यह काम सौंपा एक अध्यापक को। आज यह गाँव पूरे देश के लिए एक मिसाल बन गया है। गाँव में कोई दारू-बीड़ी नहीं पीता। लगता है जैसे गाँव में रामराज्य है। लोग दुकान से सामान खरीदते हैं, तिजोरी में पैसा डालते हैं और चल देते हैं। यह गाँव में सबसे बड़ा बदलाव है। रोजाना की जरूरत की हर चीज दुकान पर मिल जाती है।

श्री श्री रविशंकर ने बताया कि गाँव में रामराज्य लाने का यह विचार उन्हें जर्मनी के एक गाँव की व्यवस्था से आया। जर्मनी में आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम के पास एक गाँव है। इस गाँव में फलों के एक बगीचे में बिना दुकानदार फल बेचे जाते हैं। एक बोर्ड पर फलों के दाम लिखे होते हैं। खरीदार आते हैं, फलों की थैली उठाते हैं और तय दाम एक डिब्बे में डाल देते हैं। उन्होंने बताया कि जब काठेवाडी गाँव की समस्या उनके सामने आई तो, इस विचार को यहां साकार करने के बारे में सोचा गया।

कमाल की बात यह रही है कि दो साल में ही गाँव की काया पलट हो गई। आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवकों ने गाँव में पहला नवचेतना शिविर लगाया। संस्था ने अपने फाइव एच (हेल्थ, होम, हाइजीन, ह्यूमन वैल्यूस, ह्यूमनिटी इन डाइवर्सिटी) कार्यक्रम के तहत गाँववालों को बदलने का काम शुरू किया। आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवकों ने गाँव के स्वास्थ्य, घर, स्वच्छता, मानवीय मूल्यों और मानवीय विविधता (फाइव एच) कार्यक्रम के तहत गाँववालों पर अच्छा असर हुआ। शुरुआत में कम लोग उनके अभियान में शामिल हुए।

गाँव को सबसे पहले दारू और धूम्रपान मुक्त कराने की पहल हुई। इस काम में गाँव के युवकों ने सबसे ज्यादा साथ दिया। सारे गाँववालों से तंबाकू और बीड़ी लेकर जमा की गई। बाद में इसे जला दिया गया। लगभग १३ हजार रुपए का तंबाकू का सामान जलाया गया। छोटे से गाँव के लोगों के लिए यह बड़ी रकम थी। स्वस्थ रहने के लिए उन्होंने तंबाकू के साथ ही दारू पीने से तौबा कर ली। आज हालत यह है कि गाँव पूरी तरह दारू और धूम्रपान से मुक्त है। लिविंग ऑफ आर्ट के स्वयंसेवकों ने बताया कि शुरुआत में गाँववालों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। कुछ दिन बाद कुछ गाँव वाले कार्यक्रम में शामिल होने लगे। आज २०० से ज्यादा गाँव वाले कार्यक्रमों से जुड़े हुए हैं। लगभग ५०० लोग विभिन्न कार्यक्रमों में शरीक होते हैं। इसके साथ ही आसपास के गाँवों के लोगों को भी अच्छा जीवन जीने के लिए प्रेरणा देते हैं। गाँव में सुविधाएँ जुटाने के लिए भी गाँव वाले ही पैसा इकट्‍ठा करते हैं। इसके लिए एक दान पेटी बनाई गई है। सुबह-सुबह दान पेटी पूरे गाँव में घुमाई जाती है। जिसकी जितनी इच्छा होती है दान पेटी में धन डालता है। स्वच्छता अभियान के तहत गाँव के लोग सड़कों, मंदिर, समुदाय भवन और अन्य इलाकों की सफाई करते हैं।

गाँव में दो साल पहले किसी भी घर में शौचालय नहीं था। महिलाओं को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता था। दिन में शौच न जाने के कारण महिलाओं का स्वास्थ्य खराब रहता था। आज गाँव में हर घर में शौचालय है। आर्ट ऑफ लिविंग ने अभियान के तहत 110 शौचायलों का निर्माण कराया। बिना किसी सरकारी सहायता के हर घर में शौचालय के निर्माण को बड़े पैमाने पर प्रशंसा मिली। गाँव को राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने निर्मल गाँव पुरस्कार से सम्मानित किया। केंद्र सरकार की तरफ से गाँव में विकास कार्य के लिए 50 हजार रुपए का अनुदान दिया गया। गाँव को पूरी तरह से दारू और तंबाकू से मुक्त होने पर महाराष्ट्र सरकार ने टंटा मुक्ति अभियान से सम्मानित किया। इसके लिए महाराष्ट्र सरकार ने सवा लाख रुपए भेंट किए।

गाँव में एक और बड़ा बदलाव आया। यह है सूदखोरों से मुक्ति। इसके लिए गाँव में स्वयं सहायता समूह बनाया गया। महिला और पुरुष अलग-अलग समूह में काम करते हैं। हर महीने एक तय राशि बैंक में जमा करते हैं। जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करते हैं। हालत यह है कि गाँव में सूद पर पैसा देने वालों का आना ही बंद कर दिया गया है।

गाँव की कायापलट की प्रशंसा करते हुए रविशंकर कहते हैं कि अगर आप समाज के प्रति समर्पित हो तो समाज का पूरा समर्थन आपको मिलता है। समर्पण से लंबे समय के बाद फायदा मिलता है। अपनी प्रतिबद्धता से इस दुनिया को जीने के लिए अच्छा स्थान बनाओ। सफलता मिलेगी।
 

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