ऋषिकुल्या का क्षमापन

Submitted by Hindi on Thu, 02/24/2011 - 16:51
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गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
आज महाशिवरात्रि का दिन है। रोज के सब काम एक तरफ रखकर सरिता, सरित्पिता और सरित्पति का ध्यान करने के निश्चय से मैं बैठा हूं। सरिताएं लोक माताएं हैं। उनकी ‘जीवनलीला’ को अनेक प्रकार से याद करके मैं पावन हुआ हूं। पूर्वजों ने कहा है कि नदी का पूजन स्नान, दान और पान के त्रिविध रूप से करना चाहिए। मुझे लगा केवल स्नान-दान-पान ही क्यों? भक्ति ही करनी है तो फिर वह चतुर्विधा क्यों न हो? ऐसा सोचकर मैंने नदी का गान करने का निश्चय किया। ‘लोकमाता’ और प्रस्तुत ‘जीवनलीला’ इन दो ग्रंथों में यह गान सुनने को मिल सकता है।

अब जबकि प्रवास कम हो गया है और सरित्पति सागर का निमंत्रण भी कम सुनाई देने लगा है, मैं दिल में सोच रहा था कि सरित्पिता पहाडों का कुछ श्राद्ध करूं। इतने में एक छोटी-सी पवित्र नदी ने आकर कान में कहाः “क्या मुझे बिल्कुल भूल गये?” मैं शरमाया और तुरन्त उसको स्मरणांजलि अर्पण करके उसके बाद ही पहाड़ों की तरफ मुड़ने का निश्चय किया। यह नदी है कलिंग देश में केवल सवा सौ मिल की मुसाफिरी करने वाली ऋषिकुल्या।

ऋषिकुल्या नदी का नाम तक मैंने पहले नहीं सुना था। मैं अशोक के शिलालेखों के पीछे पागल हुआ था। जूनागढ़ के शिलालेख मैंने देखे थे। फिर उड़ीसा के भी क्यों न देखूं? ऐसा ख्याल मन में आया। कलिंग देश का हाथी के मुंहवाला धौली का शिलालेख मैंने देखा था। फिर इतिहास-दृष्टि पूछने लगी कि थोड़ा दक्षिण की ओर जाकर वहां का जौगढ़ का विख्यात शिलालेख कैसे छोड़ सकते हैं? उसको तृप्त करने के लिए गंजाम की तरफ जाना पड़ा। वह प्रवास बहुत काव्यमय था लेकिन उसका वर्णन करने बैठूं तो वह ऋषिकुल्या से भी लम्बा हो जायेगा।

यह नदी चिलका सरोवर से मिलने बजाय गंजाम तक कैसे गई और समुद्र से ही क्यों मिली, इसका आश्चर्य होता है। शायद सागर पत्नि का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए उसने गंजाम तक दौड़ लगाई होगी। लेकिन यहां के समुद्र में कोई उत्साह दिखाई नहीं देता। रेत के साथ खेलते रहना ही उसका काम है।

ऋषिकुल्या वैसे छोटी नदी है, फिर भी शायद नाम के कारण उसकी प्रतिष्ठा बड़ी है। क्योंकि इतनी छोटी-सी नदी को कर-भार देने के लिए पथमा और भागुवा ये दो नदियां आती हैं। और भी दो-तीन नदियां उसे आकर मिलती हैं। लेकिन दारिद्रय के संमेलन से थोड़े ही समृद्धि पैदा होती है? गर्मी के दिन आये कि सब ठनठन गोपाल।

ऋषिकुल्या के किनारे आस्का नाम का एक छोटा-सा गांव है। छोटा सा गांव सुन्दर नहीं हो सकता, ऐसा थोड़े ही है? जहां नदियों का संगम होता है, वहां सौंदर्य को अलग से न्यौता नहीं देना पड़ता। और यहां, पर तो ऋषिकुल्या से मिलने के लिए महानदी आयी हुई है! दोनों मिलकर गन्ना उगाती हैं, चावल उगाती हैं और लोगों को मधुर भोजन खिलाती हैं। और जिनको उन्मत ही हो जाना है, ऐसे लोगों के लिए यहां शराब की भी सुविधा है। इस ‘देवभूमि’ में लोगों के सुरा-पान को उचित कहें या अनुचित? जो सुरा पीते हैं सो सुर यानी देव; और जो नहीं पीते सो असुर-ईरानी लोगों की सुर-असुर की व्याख्या इस प्रकार है।

ऋषिकुल्या नाम किसने रखा होगा? इसके पड़ोस की दो नदियों के नाम भी ऐसे ही काव्यमय और संस्कृत हैं। ‘वंशधारा’ और ‘लांगुल्या’ जैसे नाम वहां के आदिवासियों के दिए हुए नहीं प्रतीत होते।

यह सारा प्रदेश कलिंग के गजपति, आंध्र के वेंगी तथा दक्षिण के चोल राजाओं की महत्त्वाकंक्षाओं की युद्धभूमि था। तब ये सब नाम चोल के राजेन्द्र ने रखे या कलिंग के गजपतियों ने, यह कौन कह सकेगा?

जौगढ़ का इतिहास-प्रसिद्ध शिलालेख देखकर वापस लौटते हुए शाम के समय ऋषिकुल्या के दर्शन हुए। संस्कृत साहित्य में दधिकुल्या, घृतकुल्या, मधुकुल्या जैसे नाम पढ़कर मुंह में पानी भर आता था। ऋषिकुल्या का नाम सुनकर मैं भक्तिनम्र हो गया और उसके तट पर हमने शाम की प्रार्थना की।

छोटी-सी नदी पार करने के लिए नाव भी छोटी सी ही होगी! उस दिन का हमारा दैव भी कुछ ऐसा विचित्र था कि यह छोटी-सी नाव भी आधी-परधी पानी से भरी हुई थी। अंदर का पानी बाहर निकालने के लिए पास में कोई लोटा-कटोरा भी नहीं था। इसलिए जूते हाथ में लेकर हमने नाव में खुले पांव प्रवेश किया। इच्छा थी कि नदी में पांव गीले न हो जायें। लेकिन आखिर नाव में जो पानी था उसने हमारा पद-प्रक्षालन कर ही दिया। खड़े रहते हैं तो नाव लुढ़क जाती है। बैठते हैं तो धोती गीली होती है। इस द्विविध संकट में से रास्ता निकालने के लिए नाव के दोनों सिरे पकड़कर हमने कुक्कुटासन का आश्रय लिया और उसी स्थिति में बैठकर वेद कालीन और पुराणकालीन ऋषियों का स्मरण करते-करते उनकी यह कुल्या पार की। तब से इस ऋषिकुल्या नदी के बारे में मन में प्रगाढ़ भक्ति दृढ़ हुई है। कुक्कुटासन का ‘स्थिरसुख’ जब तक या रहेगा, तब तक निशीथ-काल का वह प्रसंग भी कभी भूला नहीं जायेगा।

वहां से एक शिक्षक के पास के ऋषिकुल्या के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की। उन्होंने उड़िया भाषा में लिखा हुआ एक दीर्घकाव्य परिश्रमपूर्वक मेरे पास भेज दिया। अब तक उस काव्य का आस्वाद मैंन नहीं ले सका हूं। ऋषिकुल्या के प्रति भक्तिभाव दृढ़ करने के लिए आधुनिक काव्य की जरूरत भी नहीं है। मेंरे खयाल से महाशिवारित्र के दिन किया हुआ ऋषिकुल्या का यह क्षमापन – स्रोत उसको मंजूर होगा और वह मुझे अचलों का उपस्थान करने के लिए हार्दिक और सुदीर्घ आशीर्वाद देगी।

महाशिवरात्रि,

27 फरवरी, 1957

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