नदी का सरोवर

Submitted by Hindi on Fri, 02/25/2011 - 10:21
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
हमारे देश में इतने सौंदर्य-स्थान बिखरे हुए हैं कि उनका कोई हिसाब ही नहीं रखता। मानों प्रकृति ने जो उड़ाऊपन दिखाया उसके लिए मनुष्य उसे सजा दे रहा है। आश्रम मे जिन्हें चौबीसों घंटे बापूजी के साथ रहने तथा बातें करने का मौका मिला है, वे जैसे बापू जी का महत्त्व नहीं समझते और बापू जी का भाव नहीं पूछते, वैसा ही हमारे देश में प्रकृति की भव्यता के बारे में हुआ है।

हम माणिकपुर से झांसी जा रहे थे। रास्तें हरपालपुर और रोहा के बीच हमने अचानक एक विशाल सुंदर दृश्य देखा। पता ही नहीं चला कि यह नदी है या सरोवर? आसपास के पेड़ किनारे के इतने समीप आ गये थे कि इसके सिवा दूसरा कोई अनुमान ही नहीं हो सकता था कि यह नदी नहीं हो सकती। मगर सरोवर की चारों बाजू तो कमोबेश ऊंची होनी चाहिये। यहां सामने एक ऊंचा पहाड़ आसपास के जंगल को आशीर्वाद देता हुआ खड़ा था, और पानी में देखने वाले लोगों को अपना उलटा दर्शन देता था। दाढ़ी रखकर सिर मुड़ाने वाले मुसलमानों की तरह इस पहाड़ ने अपनी तलहटी में जंगल उगाकर अपने शिखर का मुंडन किया था।

पुलकी बाई ओर पानी के बींचो-बीच एक छोटा-सा टापू था- दो एक फुट लंबा और एक हाथ चौड़ा, और पानी के पृष्ठभाग से अधिक नहीं तो छः इंच ऊंचा। उसका घमंड देखने लायक था। वह मानों पास के पहाड़ से कह रहा था, ‘तू तो तट पर खड़ा-खड़ा तमाशा देख रहा है; मुझको देख, मैं कितना सुंदर जल-विहार कर रहा हूं।’

तब यह नदी है या सरोवर? अभी-अभी बेलाताल स्टेशन गया। इसलिए लगा कि इस प्रदेश में जगह-जगह तालाब होंगे। किन्तु विश्वास न हुआ। डिब्बे में बैठे हुए लोगों को अवश्य पूछा जा सकता था। मगर एक तो पैसेंजर गाड़ी होते हुए भी दीपावली के दिन होने के कारण उसमें स्थानिक यात्री नहीं थे; और यदि होते भी तो उनसे अधिक जानकारी पा सकने की उम्मीद थोड़ी ही रखी जा सकती थी! युगों तक जीवन-यात्रा विषम बनी रही, इस कारण लोगों के जीवन में से सारा काव्य सूख गया है। इसलिए जो भी सवाल पूछा जाय, उसका जवाब विषादमय उपेक्षा के साथ ही मिलता है। लोगों की भलमनसाहत अभी कुछ बाकी है, किन्तु काव्य, उत्साह और कल्पना की उड़ान अब स्मृतिशेष हो गये हैं।

पर इतना सुन्दर दृश्य देखने के बाद क्या विषाद के विचारों का सेवन किया जा सकता है? यात्रा में मैं हमेशा एक-दो नक्शे अपने साथ रखता ही हूं। बलिहारी आधुनिक समय की कि ऐसे साधन अनायास मिल जाते हैं। मैने ‘रोड मैप ऑफ इंडिया’ निकाला। हरपालपुर और मउरानीपुर के बीच से एक लंबी नदी दक्षिण से उत्तर की ओर दौड़ती हुई, बेतवा से जा मिलती है और बेतवा की मदद से हिंमतपुर के पास अपना नीर यमुना के चरणों में चढ़ा देती है। ‘मगर इस नदी का नाम क्या है?’ मैंने नक्शे से पूछा। वह आलसी बोलाः ‘देखो, कहीं लिखा हुआ होगा!’ और सचमुच उसी क्षण नाम मिला-धसान! इतने सुंदर और शांत पानी का नाम ‘धसान’ क्यों पड़ा होगा? यह तो उसका अपमान है। मैं इस नदी का नाम प्रसन्ना रखता। मंदस्रोता कहता या हिमालय से माफी मांगकर उसे मंदाकिनी के नाम से पुकारता।

मगर हमें क्या मालूम कि जिस लोक कवि ने इस नदी का नाम धसान रखा, उसने उसका दर्शन किस ऋतु में किया होगा? वर्षा मूसलाधार गिर रही होगी, आसपास के पहाड़ बादलों को खींचकर नीचे गिरा रहे होंगे, और मस्ती में झूमने वाले नीर हाथी रफ्तार से उत्तर दिशा की ओर तेजी से दौड़ रहे होंगे। शंका पैदा हुई होगी कि समीप की टेकरियां कायम रहेंगी या गिर पड़ेगी। ऐसे समय पर लोक कवि ने कहा होगा, ‘देखो तो इस धसान नदी की शरारत, मानों महाराज पलुकेशी की फौज उत्तर को जीतने के लिए निकल पड़ी है!’

किन्तु अब यह नदी इतनी शांत मालूम होती है, मानों गोकुल में शरारत करने के बाद यशोदा माता के सामने गरीब गाय बना हुआ कन्हैया हो!

सुबह नाश्ते के समय इतनी अनसोची मेजबानी मिलने पर उसे कौन छोड़ेगा?

अघाकर खाने के बाद रिश्तेदारों का स्मरण तो होता ही है। अब इस धसान का मंगल दर्शन इष्ट मित्रों को किस प्रकार कराया जाय? न पास कैमरा है, न ट्रेन से फोटो खिंचने की सुविधा है। और फोटो की शक्ति भी कितनी होती है? फोटो में यदि सारा आनंद भरना संभव होता, तो घूमने की तकलीफ कोई न उठाता। मैं कवि होता तो यह दृश्य देखकर हृदय के उद्गारों की एक सरिता ही बहा देता। मगर वह भी भाग्य में नहीं है। इसलिए ‘दूध की प्यास छाछ से बुझाने’ के न्याय से यह पत्र लिख रहा हूं। भारत की भक्ति करने वाला कोई समानधर्मी झांसी से करीब पचास मील के अंदर आये हुए इस स्थान का दर्शन करने के लिए जरूर आयेगा।

स्टेशन बरवासागर, 14-11-1939

ता. 16-11-1939

धसान से आगे बढ़े और ओरछा के पास बेतवा नदी देखी। यह नदी भी काफी सुन्दर थी। उसके प्रवाह में कई पत्थर और कई पेड़ थे। उसके लावण्य में फीका कुछ भी नही था। दूर-दूर तक ओरछा के मंदिर और महल दिखाई देते थे; कीचड़ का दर्शन कहीं भी नहीं हुआ। यह अनाविला नदी देखकर हम झांसी पहुंचे। वहां श्रीमैथिलीशरण जी के भाई-सियारामशरण जी और चारुशीलाशरणजी अपने परिवार के अन्य लोगों के साथ भोजन लेकर आये थे। मेरे मन में संदेह था कि काव्य पढ़-पढ़कर काव्य का सर्जन करने वाले हमारे कवि जिस तरह प्रकृति का प्रत्यक्ष दर्शन हृदय से नहीं करते, उसी तरह इन कवि-बन्धुओं ने भी धसान और बेतवा के बारे में शायद कुछ भी न लिखा होगा। इसलिए मैंने उनसे साफ-साफ कह दिया कि ‘आपने यदि इन दो नदियों पर कुछ भी न लिखा हो, तो आप निंदा के पात्र हैं!’ सियारामशरण जी ने अपने विनय से मुझे पराजित किया। उन्होंने कहा, ‘भैया जी ने (मैथिलीशरणजी ने) इन नदियों के बारे में गाते हुए कहा है कि सौंदर्य में बुंदेलखंड की ये नदियां गंगा-यमुना से भी बढ़कर हैं। इसलिए मेरे बड़े भाई तो आपके उपालंभ में नहीं आयेंगे। हां, मैंने खुद इन नदियों के बारे मे कुछ नहीं लिखा है। मगर मैं कहां अभी बूढ़ा हो गया हूं। मुझे तो अभी बहुत लिखना है।’

उनसे मालूम हुआ कि धसान का मूल नाम था दशार्ण। और यह तो मुझे मालूम था कि बेतवा का नाम था वेत्रवती। दशार्ण-दशाअण=दशाण=धसान। इतना ध्यान में आने के बाद धसान नाम के बारे में मैंने जो ऊंटपटांग कल्पना की थी, वह पत्तों के महल की तरह गिर पड़ी। किसी तरह के सबूत के बिना केवल कल्पना के सहारे खोज करने वाले मेरे जैसे कई लोग इस देश में होंगे। उनकी गलती बताने के लिए जो जानकारी चाहिये उसके अभाव में ऐसी निरी कल्पनाएं भी इतिहास के नाम से रूढ़ हो जाती हैं, और आगे जाकर रूढ़ियों के अभिमानी लोग जोश के साथ ऐसी कल्पनाओं से भी चिपटे रहते हैं।

मैंने एक दफा ‘वती-मती’ वाली नदियों के नाम इकट्ठे किये थे। इसीलिए वेत्रवती ध्यान में रही थी। जिसके किनारे बेंत उगते हैं वह है वेत्रवती। दृषद्वती (पथरीली), सारस्वती, गोमती, हाथमती, बाघमती, ऐरावती, साबरमती, वेगमती, माहिष्मती (?), चर्मण्वती (चंबल), भोगवती (?) शरावती। इतनी नदियां तो आज याद आती हैं। और भी खोजने पर दूसरी पांच-दस नदियां मिल जायेंगी। महाभारत में जहां तीर्थयात्रा का प्रकरण आता है, वहां कई नाम एक साथ बताये गये हैं। परशुराम, विश्वामित्र, बलराम, नारद, दत्तात्रेय, व्यास, वाल्मीकि, सूत शौनक आदि प्राचीन घुमक्कड़ भूगोल वेत्ताओं से यदि पूछेंगे, तो काफी नाम बतायेंगे या पैदा कर लेंगे। हमारी नदियों के नामों के पीछे रही जानकारी, कल्पना, काव्य और भक्ति के बारे में आज तक भी किसी ने खोज नहीं की है। फिर भारतीय जीवन भला फिर से समृद्ध किस तरह हो?

नवंबर, 1939

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा