जैविक खेती

Submitted by Hindi on Tue, 03/01/2011 - 09:30
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ग्रामीण सूचना एवं ज्ञान केन्द्र
भारत एक कृषि प्रधान तथा कृषि देश की अर्थ व्यवस्था का प्रमुख साधन है । भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है और अन्न से ही जीवन है, इसकी पूर्ति के लिए 60 के दशक में हरित क्रान्ति लाई गई ओर अधिक अन्न उपजाओं का नारा दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप रासायनिक उर्वरकों ओर कीटनाशकों का अन्धा-धुन्ध व असन्तुलित उपयोग प्रारम्भ हुआ । इससे उत्पादन तो बढ़ा उत्पादकता में स्थिरता आने के कारण पूर्व वर्षो की उत्पादन वृद्धि पर असर पड़ने लगा ।

पिछले कुछ समय से रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के अन्धा-धुन्ध व असन्तुलित प्रयोग का प्रभाव मनुष्य व पशुओं के स्वास्थ्य पर नहीं हुआ, बल्कि इसका कुप्रभाव पानी, भूमि एंव पर्यावरण पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है ।

रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का भूमि में प्रयोग, भूमि को मृत माध्यम मान कर किया गया है । अत: भूमि के स्वास्थ्य की रक्षा करके खेती की ऐसी प्रणाली जिसमें भूमि को एक जीवित सजीव माध्यम माना जाए, क्योंकि मृदा में असंख्य जीव रहते हैं जो कि एक दूसरे के पूरक तो होते ही हैं साथ में पौधों की बढ़वार हेतु पोषक तत्व भी उपलब्ध करवाते हैं । अत: जैविक खेती पद्धति में उपलब्ध अन्य कृषक हितैषी जीवों के मध्य सामंजस्य रख कर खेती करना है ।

मिट्टी पौधों में वृद्धि एवं विकास का माध्यम है । पौधों के समुचित विकास एवं फसलोत्पादन के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीज, खाद एवं उर्वरा होना नितांत आवश्यक है।

जैविक खेती क्या है:-


जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा खरपतवारनाशियों के स्थान पर जीवांश खाद पोषक तत्वों (गोबर की खाद कम्पोस्ट, हरी खाद, जीवणु कल्चर, जैविक खाद आदि) जैव नाशियों (बायो-पैस्टीसाईड) व बायो एजैन्ट जैसे क्राईसोपा आदि का उपयोग किया जाता है, जिससे न केवल भूमि की उर्वरा शक्ति लम्बे समय तक बनी रहती है, बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता तथा कृषि लागत घटने व उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ने से कृषक को अधिक लाभ भी मिलता है ।

जैविक खेती वह सदाबहार कृषि पद्धति है, जो पर्यावरण की शुद्धता, जल व वायु की शुद्धता, भूमि का प्राकृतिक स्वरूप बनाने वाली, जल धारण क्षमता बढ़ाने वाली, धैर्यशील कृत संकल्पित होते हुए रसायनों का उपयोग आवश्यकता अनुसार कम से कम करते हुए कृषक को कम लागत से दीर्घकालीन स्थिर व अच्छी गुणवत्ता वाली पारम्परिक पद्धति है।

जैविक खेती के सिद्धांत:-


1. प्रकृति की धरोहर है ।
2. प्रत्येक जीव के लिए मृदा ही स्त्रोत है ।
3. हमें मृदा को पोषण देना है न कि पौधे को जिसे हम उगाना चाहते है ।
4. उर्जा प्राप्त करने वाली लागत में पूर्ण स्वतंत्रता ।
5. परिस्थितिकी का पुनरूद्धार ।

जैविक खेती का उद्देश्य:-


इस प्रकार की खेती करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि रासायनों उर्वरकों का उपयोग न हो तथा इसके स्थान पर जैविक उत्पाद का उपयोग अधिक से अधिक हो लेकिन वर्तमान में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए तुरंत उत्पादन में कमी न हो अत: इसे (रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को) वर्ष प्रति वर्ष चरणों में कम करते हुए जैविक उत्पादों को ही प्रोत्साहित करना है। जैविक खेती का प्रारूप निम्नलिखित प्रमुख क्रियाओं के क्रियान्वित करने से प्राप्त किया जा सकता है ।

1. कार्वनिक खादों का उपयोग ।
2. जीवाणु खादों का प्रयोग ।
3. फसल अवशेषों का उचित उपयोग
4. जैविक तरीकों द्वारा कीट व रोग नियंत्रण
5. फसल चक्र में दलहनी फसलों को अपनाना ।
6. मृदा संरक्षण क्रियाएं अपनाना ।

जैविक खेती के महत्व:-


1. भूमि की उर्वरा शक्ति में टिकाउपन
2. जैविक खेती प्रदुषण रहित
3. कम पानी की आवश्यकता
4. पशुओं का अधिक महत्व
5. फसल अवशेषों को खपाने की समस्या नहीं ।
6. अच्छी गुणवत्ता की पैदावार ।
7. कृषि मित्रजीव सुरक्षित एवं संख्या में बढोतरी ।
8. स्वास्थ्य में सुधार
9. कम लागत
10. अधिक लाभ

जैविक खेती के मार्ग में बाधाएं:-


1. भूमि संसाधनों को जैविक खेती से रासायनिक में बदलने में अधिक समय नहीं लगता लेकिन रासायनिक से जैविक में जाने में समय लगता है ।

2. शुरूआती समय में उत्पादन में कुछ गिरावट आ सकती है, जो कि किसान सहन नहीं करते है । अत: इस हेतु उन्हें अलग से प्रोत्साहन देना जरूरी है।

3. आधुनिक रासायनिक खेती ने मृदा में उपस्थिति सूक्ष्म जीवाणुओं का नष्ट कर दिया, अत: उनके पुन: निमार्ण में 3-4 वर्ष लग सकते हैं ।

उद्यान विभाग द्वारा चलाई जाने वाली स्कीमों का विवरण
जैविक खेती को हरियाणा राज्य में प्रचारित करने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अन्तर्गत निम्न कार्यक्रमों के लिए 50 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है ।

1. जैविक खेती अपनाने के लिए रूपये 10000/- प्रति है एक कृषक को 4 है, क्षेत्र अनुदान की सुविधा प्राप्त है।
2. केंचुआ खाद उत्पादन इकाई स्थापित करने के लिए रूपये 30000/- प्रति इकाई
3. जैविक खेती पजींकरण हेतु 50 है क्षेत्र सामुदायिक के लिए 5.00 लाख रूपये

अनुदान


उपरोक्त अनुदान निम्नलिखत जिलों के लिए उपलब्ध है ।

पंचकूला, अम्बाला, यमुनानगर, करनाल, सोनीपत, फरीबाद, गुड़गांव, मेवात, रोहतक, झज्जर, भिवानी, हिसार, फतेहाबाद और सिरसा ।

भूमि की उपजाऊ शक्ति : जैविक खाद


भारत में शताब्दियों से गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद व जैविक खाद का प्रयोग विभिन्न फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। इस समय ऐसी कृषि विधियों की आवश्यकता है जिससे अधिक से अधिक पैदावार मिले तथा मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित न हो, रासायनिक खादों के साथ-साथ जैविक खादों के उपयोग से मिट्टी की उत्पादन क्षमता को बनाए रखा जा सकता है। जिन क्षेत्रों में रासायनिक खादों का ज्यादा प्रयोग हो रहा है वहां इनका प्रयोग कम करके जैविक खादों का प्रयोग बढाने की आवश्यकता है। जैविक खेती के लिए जैविक खादों का प्रयोग अतिआवश्यक है, क्योंकि जैविक कृषि में रासायनिक खादों का प्रयोग वर्जित है। ऐसी स्थिति में पौंधों को पोषक तत्व देने के लिए जैविक खादों, हरी खाद व फसल चक्र में जाना अब आवश्यक हो गया है। थोड़ी सी मेहनत व टैक्नोलॉजी का प्रयोग करने से जैविक खाद तैयार की जा सकती है जिसमें पोषक तत्व अधिक होंगे और उसे खेत में डालने से किसी प्रकार की हानि नहीं होगी और फसलों की पैदावार भी बढ़ेगी।

अच्छी जैविक खाद तैयार करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान देना आवश्यक है :

1- जैविक खाद बनाने के लिए पौधों के अवशेष, गोबर, जानवरों का बचा हुआ चारा आदि सभी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए।
2- जैविक खाद बनाने के लिए 10 फुट लम्बा, 4 फुट चौड़ा व 3 फुट गहरा गङ्ढा करना चाहिए। सारे जैविक पदार्थों को अच्छी तरह मिलाकर गङ्ढें को भरना चाहिए तथा उपयुक्त पानी डाल देना चाहिए।
3- गङ्ढे में पदार्थों को 30 दिन के बाद अच्छी तरह पलटना चाहिए और उचित मात्रा में नमी रखनी चाहिए। यदि नमी कम है तो पलटते समय पानी डाला जा सकता है। पलटने की क्रिया से जैविक पदार्थ जल्दी सड़ते हैं और खाद में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है।
4- इस तरह यह खाद 3 महीने में बन कर तैयार हो जाती है।

खेत में खाद डालकर शीघ्र ही मिट्टी में मिला देना चाहिए। ढेरियों को खेत में काफी समय छोड़ने से नत्रजन की हानि होती है जिससे खाद की गुणवत्ता में कमी आती है। गोबर की खाद में नत्रजन की मात्रा कम होती है और उसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अनुसंधान कार्यों से कुछ विधियां विकसित की गई हैं। जैविक खाद में फास्फोरस की मात्रा बढ़ाने के लिए रॉक फास्फेट का प्रयोग किया जा सकता है। 100 किलाग्राम गोबर में 2 किलोग्राम रॉक फास्फेट आरम्भ में अच्छी तरह मिलाकर सड़ने दिया जाता है। तीन महीने में इस खाद में फास्फोरस की मात्रा लगभग 3 प्रतिशत हो जाती है। इस विधि से फास्फोरस की घुलनशीलता बढ़ती है और विभिन्न फसलों में रासायनिक फास्फोरस युक्त खादों का प्रयोग नहीं करना पड़ता। अगर खाद बनाते समय केंचुओं का प्रयोग कर लिया जाए तो यह जल्दी बनकर तैयार हो जाती है और इस खाद और इस खाद में नत्रजन की मात्रा अधिक होती है। खाद बनाते समय फास्फोटिका का एक पैकेट व एजोटोबैक्टर जीवाणु खाद का एक पैकेट एक टन खाद में डाल दिया जाए तो फास्फोरस को घुलनशील बनाने वाले जीवाणु व एजोटोबैक्टर जीवाणु पनपते हैं और खाद में नत्रजन व फास्फोरस की मात्रा आधिक होती है। इस जीवाणुयुक्त खाद के प्रयोग से पौधों का विकास अच्छा होता है। इस तरह वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके अच्छी गुणवत्ता वाली जैविक खाद बनाई जा सकती है जिसमें ज्यादा लाभकारी तत्व उपस्थित होते हैं।

इसके प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाई जा सकती है। जैविक खाद किसानों के यहां उपलब्ध संसाधनों के प्रयोग से आसानी से बनाई जा सकती है। रासायनिक खादों का प्रयोग कम करके और जैविक खाद का अधिक से अधिक प्रयोग करके हम अपने संसाधनों का सही उपयोग कर कृषि उपज में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं और जमीन को खराब होने से बचाया जा सकता है।

जैविक खादों के प्रयोग से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं :

1- रासायनिक खाद के साथ-साथ जैविक खादों के उपयोग से पैदावार अधिक मिलती है तथा भूमि की उपजाऊ शक्ति भी कम नहीं होती।
2- इससे सूक्ष्म तत्वों की कमी पूरी होती है जो फसलों के लिए अति आवश्यक है।
3- इसके उपयोग से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है जिससे उसकी उपजाऊ शक्ति बढ़ती है।
4- जैविक खाद से मिट्टी में लाभदायाक सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है जो फसलों को उपयोगी तत्व उपलब्ध करवाते हैं।
5- जैविक खादों के उपयोग से जल व वायु प्रदूषण नहीं होता है जो कि सामान्य जीवन के लिए अति आवश्यक है।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोग प्राय: फसल अवशेषों और पशुओं के मलमूत्र को नष्ट होने देते हैं। गोबर व अन्य अवशेषों का सड़कों या गलियों में ढेर लगा दिया जाता है या गोबर के उपले बनाकर जला दिया जाता है। इस प्रकार यह अवशेष सड़ते-गलते नहीं हैं और वातावरण प्रदूषित होता है। इन अवशेषों को खेत में डालने से दीमक, खरपतवार व पौध रोगों को बढ़ावा मिलता है।

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