उपस्थान

Submitted by Hindi on Wed, 03/09/2011 - 11:19
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गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
भिन्न-भिन्न अवसरों पर भारतवर्ष की जिन नदियों के दर्शन मैंने किये, उनमें-से कुछ नदियों का यहां स्मरण किया गया है। यहां मेरा उद्देश्य भूगोल में दी जाने वाली जानकारी का संग्रह करने का नहीं है, न नदियों का हमारे व्यापार-वाणिज्य पर होनेवाला असर बताने का यहां प्रयत्न है। यह तो केवल हमारे देश की लोक माताओं का भक्तिपूर्वक किया हुआ नए प्रकार का उपस्थान है।

हमारे पूर्वजों की नदी-भक्ति लोक-विश्रुत है। आज भी वह क्षीण नहीं हुई है। यात्रियों की छोटी-बड़ी नदियां तीर्थस्थानों की ओर बहकर यही सिद्ध करती हैं कि वह प्राचीन भक्ति आज भी वैसी की वैसी जागृत है।

भक्त-हृदय भक्ति के इन उद्गारों का श्रवण करके संतुष्ट हों। युवकों में लोकमाताओं के दर्शन करने की और विविध ढंग से उनका स्तन्यपान करके संस्कृति-पुष्ट होने की लगन जागृत हो।

हिन्दुस्तान के सभी सुन्दर स्थलों का वर्णन करना मानव-शक्ति के बाहर की बात है। खुद भगावन व्यास जब भारत की नदियों के नाम सुनाने बैठे, तब उनको भी कहना पड़ा कि जितनी नदियां याद आयीं उन्हीं का यहां नाम-संकीर्तन किया गया है। बाकी की असंख्य नदियां रह गयी हैं।

मेरी देखी हुई नदियों में से बन सकें उतनी नदियों का स्मरण और वर्णन करके पावन होने का मेरा संकल्प था। आज जब इस भक्ति-कुसुमांजलि को देखता हूं, तो मन में विषाद पैदा होता है कि कृतज्ञता व्यक्त हो सके उतनी नदियों का भी उपस्थान मैं कर नहीं सका हूं। जिनका वर्णन नही कर सका, उन्हीं नदियों की संख्या अधिक है। जिस प्रांत में मैं करीब पाव सदी तक रहा, उस गुजरात की नदियों का वर्णन भी मैंने नहीं किया है नर्मदा और साबरमती के बारे में तो अभी-अभी कुछ लिख सका हूं। ताप्ती या तपती के बारे में कुछ नहीं लिखा। उसका परिताप मन में है ही। इस नदी का उद्गम-स्थान मध्यप्रांत में बैतुल के पास है। बरहानपुर और भुसावल होकर वह आगे बढ़ती है। उसकी मदद लेकर एक बार मैं सूरत से हजीरा तक हो आया हूं। ताप्ती से भगवान सूर्यनारायण के प्रेम के बारे में पूछा जा सकता है और अंग्रेजों ने व्यापार के बहाने सूरत में कोठी किस प्रकार डाली और बाजीराव ने यही महाराष्ट्र का स्वातंत्र्य अंग्रेजों को कब सौंप दिया, इसके बारे में भी पूछा जा सकता है।

गोधरा जाते समय जो छोटी-सी मही नदी मैंने देखी थी, वही खंभात से कावी बंदरगाह तक महापंक कीचड़ का विस्तार किस तरह फैला सकती है, यह देखने का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ है। पूर्व की महानदी और पश्चिम की मही नदी, दोनों का कार्य विशेष प्रकार का है। सूर्या, दमणंगगा, कोलक, अंबिका, विश्वामित्री, कीम आदि अनेक पश्चिमवाहिनी नदियों का मीठा अतिथ्य मैंने कभी न कभी चखा है। उन्हें यदि अंजलि अर्पण न करूं तो मैं कृतघ्न माना जाऊंगा। और जिस आजी नदी के किनारे महात्मा जी ने छुटपन की शरारतें की थीं, वह तो खास तौर पर मेरी अंजली की अधिकारिणी है। बढ़वाण की भोगावो के बारे में मैंने शायद कहीं लिखा होगा किन्तु वह भोगावो की अपेक्षा राणकदेवी के स्मरण के तौर पर ही होगा।

गुजरात के बाहर नजर घुमाकर दूसरी नदियों का स्मरण करता हूं, तब प्रथम याद आता है सबसे बड़ा ब्रह्मपुत्र। उसका उद्गम-स्थान तो हिमालय के उस पार मानस-सरोवर के प्रदेश में है। हिमालय के उत्तर की ओर बहते हुए पानी की एक-एक बूंद इकट्ठी करके वह हिमालय की सारी दीवार पार करता है और पहाड़ों तथा जंगलों के अज्ञात प्रदेशों में बहता हुआ आसाम की ओर उन्हें छोड़ देता है। बाद में सदिया, डिब्रुगढ़, तेजपुर, गौहाटी, ढुब्री, आदि स्थानों को पावन करता हुआ वह बंगाल में उतरता है। और उसे गंगा से मिलना है, इसी कारण वह कुछ दूरी तक यमुना नाम धारण करते हुए आगे पद्मा बनता है। ‘इतिहास के उषाकाल’ से लेकर जापानियों के अभी-अभी के आक्रमण तक का सारा इतिहास ब्रह्मपुत्र को विदित है। किन्तु इस ताजे इतिहास के कई प्रकरण तो मणिपुर की इम्फाल नदी बता सकती है। फिर भी इन नदी को पूछने पर वह कहेगी कि मुझसे पूछने के बदले यह सब आपकी इरावती की सखी छिंदवीन से ही पूछ लीजिये। और मणिपुर की ओर से भागकर आये हुए लोगों का कुछ इतिहास तो सुर्माघाटी की बराक नदी से पूछना होगा।

मैंने नदियां तो कई देखी हैं किन्तु जिसकी गूढ़-गामिता और चिता-रहित लापरवाही पर मैं सबसे अधिक मुग्ध हुआ हूं, वह है कालीम्पोंग तरफ की तीस्ता नदी। कैसा उसका उन्माद! और कैसा उसका आत्मगौरव का भान!

उत्कल में मैं अनेक बार हो आया हूं। वहां की महानदी, काटजुड़ी और काकपेया तो हैं ही। किन्तु बरी-कटक से वापस लौटते समय खरस्रोता के किनारे देखा हुआ सूर्योदय और अन्य अवसर पर सुना हुआ ऋषिकुल्या नदी का इतिहास तथा उसके किनारे का सौंदर्य मैं भला कैसे भूल सकता हूं? जौगढ़ का अशोक का प्रख्यात शिलालेख देखने गया था, तब मैंने ऋषिकुल्या के दर्शन किए थे, और यदि मैं भूलता न होऊं तो धवली का हाथीवाला शिलालेख देखने गया था, तब एक नदी की दो नदियां बनती हुई मैंने देखी थीं। दो नदियों का संगम देखना एक बात है। दो नदियां इकट्ठी होकर अपनी जलराशि बढ़ाती हैं और संभूय-समूत्थान के सिद्धांत के अनुसार बड़ा व्यापार करती हैं। यह तो शक्ति बढ़ाने का प्रयास है। किन्तु एक ही नदी दूर से आकर जब देखती है कि दोनों ओर के प्रदेश को मेरे जल की उतनी ही आवश्यकता है, तब भला वह किसका पक्षपात करे? अपना जल बांटकर जब दो प्रवाहों में वह बहने लगती है, तब दो बच्चो की माता के जैसी मालूम होती है। उसको विशेष भक्तिपूर्वक प्रणाम किए बिना रहा नहीं जा सकता।

क्या आपने काली नदी के सफेद होने की बात कभी सुनी है? छुटपन में कारवार में मैंने एक काली नदी देखी थी वह समुद्र से मिलती है तब तक काली ही काली रहती है। किन्तु गोवा की ओर एक नदी है, जो सागर से मिलने की आतुरता के कारण पहाड़ की चोटी पर से नीचे इस तरह कूदती है कि उसका दूध के समान काव्यमय सफेद प्रपात बन जाता है। उसका नाम ही दूधसागर पड़ गया है। इस दूधसागर का दृश्य ऐसा है, मानों किसी लड़की ने नहाने के बाद सुखाने के लिए अपने बाल फैलाये हों। शरावती के जोग के प्रपात का वर्णन मैंने तीन बार किया है, तो दूधसागर के गंभीर ललित काव्य का मनन मुझे दस बार करना चाहिये था।

हिमालय जाते समय देखी हुई रामगंगा का और हिमालय के उस पार से आने वाली सरयू घाघरा का वर्णन तो रह ही गया है। किन्तु लंका (सीलोन) में देखी हुई सीतावाका और अन्य दो-तीन गंगाओं के बारे में मैंने कहां लिखा है? मध्य-प्रांत में देखी हुई धसान के बारे में मैंने लिखा और वेत्रवती को छोड़ दिया, यह भला कैसे चल सकता है? उज्जयिनी जाते समय देखी हुई शिप्रा नदी को स्मरणांजलि न दूं, तो कालिदास ही मुझे शाप देंगे। मुरादाबाद में देखी हुई गोमती का स्मरण करते ही द्वारका की गोमती का स्मरण हो आता है और इसी न्याय से सिंध की सिंधु के साथ मध्य भारत की नन्हीं-सी सिंधु की भी याद हो आती है।

काठियावाड़ में चोरवाड़ के पास समुद्र से मिलने जाते-जाते बीच में ही रुक जाने वाली मेगल नदी मैंने देखी नहीं है। किन्तु इसी प्रकार की एक नदी अड्यार मद्रास के पास मैंने देखी है, जिसकी समुद्र से बनती नहीं। अड्यार नदी समुद्र की और हृदय-समृद्धि का खाद या गोबर लेकर आती है और समुद्र चिढ़कर उसके सामने बालू का एक बांध खड़ा कर देता है। खंडिता का यह दृश्य इतना करूण है कि उसका असर बरसों तक मेरे मन पर रहा है।

इससे तो केरल के ‘बैक वाटर’ अच्छे हैं। वहां समुद्र के समानान्तर, किनारे-किनारे एक लम्बी नदी फैली हुई है, मानो समुद्र से कह रही हो कि तुम्हारे खारे पानी के तूफान मैं भारत की भूमि तक पहुंचने नहीं दूंगी।

इसका एक छोटा-सा नमूना हमें जुहू की ओर देखने को मिलता है। जुहू के नारियल वाले प्रदेश के पश्चिम में समुद्र है, और पूर्व की ओर कभी-कभी पानी फैला हुआ दीख पड़ता है। यही स्थिति यदि हमेशा की हो जाये और पानी यदि उत्तर-दक्षिण की ओर सौ पचास मील तक फैल जाये, तो बंबई के लोगों को केरल के ‘बैक वाटर्स’ का कुछ खयाल हो सकेगा। किन्तु केरल के उस हिस्से का सृष्टि-सौंदर्य प्रत्यक्ष देखे बिना ध्यान में नहीं आयेगा।

सिंध के कमल-सुंदर मंचर सरोवर के बारे में मैंने थोड़ा-सा लिखा है। किन्तु उत्कल मे देखे हुए चिल्का सरोवर के बारे में लिखना अभी बाकी है। लॉर्ड कर्जन ने एक बार कहा था कि “हिन्दुस्तान में श्रेष्ठ सौंदर्य-धाम यदि कोई है तो वह चिल्का सरोवर ही है।” स्वीडन और नार्वे की समुद्र-शाखा के चित्र जब-जब मैं देखता हूं, तब-तब मुझे एक बार देखे हुए चिल्का सरोवर का स्मरण हुए बिना नहीं रहता। उत्कल के एक कवि ने इस सरोवर पर एक सुन्दर सुदीर्घ काव्य लिखा है।

नदियों और सरोवरों के बारे में लिखने के बाद जीवन-तर्पण पूरा करने के लिए मुझे हिन्दुस्तान, ब्रह्मदेश और सीलोन के किनारे किए हुए विशिष्ट समुद्र-दर्शनों का वर्णन भी लिख डालना चाहिये। कराची, कच्छ और काठियावाड से लेकर बम्बई, दाभोल, कारवार या गोकर्ण तक का समुद्र-तट, उसेक बाद कालिकट से लेकर रामेश्वरम् और कन्याकुमारी तक का दक्षिण का किनारा, वहां से ऊपर पांडिचेरी, मद्रास, मछलीपट्टम्, विजगापट्टम आदि सूर्योदय का पूर्व किनारा और अन्त में गोपालपुर, चादीपुर, कोणार्क और पुरी जगन्नाथ से लेकर ठेंठ हीराबंदर तक का दक्षिणाभिमुख समुद्र-तट जब याद आता है, तब कम से कम पचास-पचहत्तर दृश्य एक ही साथ नजर के सामने विश्वरूप दर्शन की तरह अद्भुत ज्वार-भाटा चलाते हैं? सीलोन और रंगून के दृश्य तो अपना व्यवक्तित्व रखते ही हैं। दिल में यह सारा आनन्द इतना भरा हुआ है कि वाणी के द्वारा उसे एक साथ यदि वहां दूं, तो समुद्र-से निकलकर अनेक दिशाओं में बहनेवाली एक नयी अलौकिक सरस्वती पैदा हो जायेगी। कुछ नही तो दिल को हलका करने के लिए ही इन सब संस्मरणों को गति देनी होगी।

हिन्दुस्तान के पहाड़ और जंगल, रेगिस्तान और मैदान, शहर और गांव, सब प्रतीक्षा कर रहे हैं। गांवों का पुरस्कार करने के हेतु मैं शहरों की कितनी ही निन्दा क्यों न करूं और काम पूरा होने के पहले ही शहरों से भागने की इच्छा भी क्यों न करूं, फिर भी शहरों का व्यक्तित्व मैं पहचान सकता हूं। उनके प्रति भी मैं प्रेम भक्ति का भाव रखता हूं। क्या भारत के सब शहर मेरे देशवासियों के पुरुषार्थ के प्रतीक नहीं हैं? क्या शहरों में संस्कारिता की पेढ़ियां हमारे लोगों ने स्थापित नहीं की हैं? क्या हरेक शहर ने अपना वायुमंडल, अपनी टेक, अपना पुरुषार्थ अखंड रूप से नहीं चलाया है? शहर यदि गांवों के भक्षक या शोषक मिटकर उनके पोषक बन जायें, तो उन्हें भी हरेक समाज-हितचिंतक के आशीर्वाद मिले बिना नहीं रहेंगे।

मेरी दृष्टि से तो हिन्दुस्तान में देखे हुए अनेकानेक श्मशान भी मेरी भक्ति के विषय हैं। फिर वह चाहे हरिश्चंद्र द्वारा रक्षित काशी का श्मशान हो, दिल्ली के आसपास अनेक राजधानियों के श्मशान हों, या महायुद्ध के बाद अभी आसाम में देखे हुए मृतक हवाई जहाजों के अवशेष रूप दो तीन चमकीले श्मशान हों। श्मशान तो श्मशान ही हैं। उन्हें देखते ही मनुष्यों के तथा राजवंशों के, साम्राज्यों के और संस्कृतियों के जन्म मरण के बारे में गहरे विचार मन में उठे बिना नहीं रह सकते।

जिसमें खुद मुझे जाना है, उस एक श्मशान को छोड़कर बाकी के सब श्मशानों का वर्णन करने की इच्छा हो आती है। यदि संभव न हो तो जिस प्रकार युद्ध में ‘काम आये हुए’ अज्ञात वीरों को और श्राद्ध के समय अज्ञात सम्बन्धियों को एक सामान्य पिंड या अंजलि अर्पण की जाती है, उसी प्रकार हरिश्चन्द्र, विक्रम, भर्तृहरि और महादेव के उपासक असंख्य योगियों ने जिस श्मशान को अपना निवास बनाया, उस प्रतिनिधिक ‘सर्व सामान्य श्मशान’ को एक अंजलि अर्पण करने की इच्छा तो है ही।

क्या यह सब मैं कर सकूंगा? मुझे इसकी चिंता नहीं है। ऐसी बात नहीं है कि सिर्फ ईश्वर ही अवतार धारण करता है। जिस जिसके मन में संकल्प उठते हैं, उस उसको अवतार लेने ही पड़ते हैं। यह भी मानने की आवश्यकता नहीं है कि एक ही जीवात्मा अनेक अवतार धारण करता है। अवतार धारण करना पड़ता है अदम्य संकल्प को। अदम्य संकल्प ही सच्चा विधाता है। संकल्प पैदा हुआ कि उसमें से सृष्टि उत्पन्न होगी ही। फिर वह भले ब्रह्मदेव की पार्थिव सृष्टि हो, साहित्य की शब्द-सृष्टि हो, या केवल कल्पना की चित्र-सृष्टि हो।

इस सृष्टि के द्वारा जीवन-देवता अपना अनंत-विध उल्लास प्रकट करता ही रहता है।

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