विश्वबैंक, मुद्राकोष और डब्ल्यूटीओ हैं असली नीति निर्माता

Submitted by Hindi on Thu, 03/10/2011 - 10:02
पानी की बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और उनके एसोसिएशन- यूएस कोलिशन ऑफ सर्विस इण्डस्ट्री और यूरोपियन फोरम आन सर्विसेज- विश्व व्यापार संगठन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि पानी के सम्बन्ध में सदस्य देशों के कानूनों को समाप्त कर डब्ल्यू.टी.ओ. के कानून लागू करवाना। विश्वबैंक कहता है ”पानी मानवीय जरूरत है न कि मानव अधिकार“। जरूरत को पैसे से व अन्य तरीकों से पूरा किया जा सकता है, लेकिन मानव अधिकार की तो खरीद फरोख्त नहीं हो सकती। और इसलिये इस जरूरत को पूरा करने के लिये विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की मदद से बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ आ रही हैं। दस सबसे बड़े खिलाड़ी- फ्रांस की स्वेज और विवोंदी, जर्मनी की आर.डब्ल्यू.ई- ए.जी. वायगूस सौर टेम्स वाटर, अमरीका की बैश्टेल और एनरान आदि- दुनिया के प्रत्येक कोने में पानी का व्यापार कर रही है। अभी तक दुनिया केवल 10 प्रतिशत जल व्यापार ही इनके लिये खुला है। 90 प्रतिशत अभी खुलना बाकी है। एक दशक पहले विवोंदी ने 5 अरब डालर का मुनाफा कमाया जो 2002 में 12 अरब डालर हो गया। आर.डब्ल्यू.ई. ने पिछले 10 वर्षों में अपने मुनाफे में 9,786 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की। इन दो कम्पनियों का ही 2001 में कुल राजस्व 160 अरब डालर रहा और यह 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रहा है।

इन कम्पनियों के कारोबार में इतना इजाफा न हुआ होता यदि विश्वबैंक और मुद्राकोष की मदद इन्हें न मिलती। तीसरी दुनिया के देशों में पानी के निजीकरण के लिये 99 प्रतिशत फण्ड मुद्राकोष और विश्वबैंक द्वारा उपलब्ध कराये गये हैं। इन फण्डों के बदले ये दोनों संस्थाएं पानी के निजीकरण की शर्त रखती हैं। यूरोपियन इनवेस्टमेंट बैंक, इण्टर अमेरिकन डेवलपमेंट बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाओं की भी यही भूमिका रही है।

विश्वबैंक ने पिछले दशक में 20 अरब डालर की मदद को पानी के निजीकरण की शर्त पर उपलब्ध कराया है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और विश्वबैंक ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कई संस्थाओं को स्थापित करवाया है जो पानी के निजीकरण पर चल रही बहस को वैचारिक मजबूती देते हैं ये संस्थाएं हैं- ग्लोबल वाटर पार्टनरशिप और वर्ल्ड वाटर काउंसिल जो 1996 में संयुक्त राष्ट्र के अन्तर्गत स्थापित हुई। इनके लिये फण्ड विश्वबैंक ने उपलब्ध कराये। 175 सदस्य देशों से बनी वर्ल्ड वाटर काउंसिल हर तीसरे वर्ष वर्ल्ड वाटर फोरम का आयोजन करती है जहाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अधिकारी मिलते हैं। 1998 में गठित 21वीं शताब्दी के लिये जल विश्व आयोग (World Commission on Water for 21st Century) भी ऐसी ही संस्था है। इन तीनों संस्थाओं के उच्च पदों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रतिनिधि बैठाए गये हैं जहाँ से वे अपनी संस्था इण्टरनेशनल प्राइवेट वाटर एसोसिएशन के साथ मिलकर विश्वबैंक, मुद्राकोष और संयुक्त राष्ट्र की जल नीतियाँ बनवाते हैं।

डब्ल्यू.टी.ओ. के गेट्स समझौते ने पुख्ता किया पानी की बिक्री का इन्तजामः विश्व व्यापार संगठन समझौते का एक अध्याय है जिसका नाम है जनरल एग्रीमेण्ट आन ट्रेड इन सर्विसेज (GATS)। सेवाओं के व्यापार सम्बन्धी नियम इस अध्याय में लिखे हैं। विश्व व्यापार संगठन ने विश्वबैंक और मुद्राकोष की सलाह पर जलापूर्ति, जल प्रबन्धन को व्यापार योग्य सेवा माना है। पानी की बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और उनके एसोसिएशन- यूएस कोलिशन ऑफ सर्विस इण्डस्ट्री और यूरोपियन फोरम आन सर्विसेज- विश्व व्यापार संगठन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि पानी के सम्बन्ध में सदस्य देशों के कानूनों को समाप्त कर डब्ल्यू.टी.ओ. के कानून लागू करवाना। डब्ल्यू.टी.ओ. को यह अधिकार है कि वह वस्तुओं- पानी भी-की मुक्त आवाजाही में रुकावट बनने वाली कानूनी अड़चनों को दूर करवाये।

इस समय गैट्स (GATS) के तहत पानी के मुक्त व्यापार पर वार्ताएं चल रही हैं। वाताओं में यूरोपियन यूनियन का दबाव है कि सभी सदस्य देश जल सेवा को पर्यावरण सेवा (Environmental Services) के तहत लायें। इन वार्ताओं के केन्द्र मे है ‘घरेलू नियमों’ (Domestic Regulation) से सम्बन्धित अनुच्छेद। VI का प्रस्तावित विस्तार जिसके तहत सार्वजनिक सेवा से सम्बन्धित किसी भी सरकारी नियम को ‘अनिवार्य परीक्षण’ (Necessity Test) के लिये मजबूर किया जायेगा। सरकारें डब्ल्यू.टी.ओ. के नियम कानूनों के अनुसार अपने घरेलू कानूनों का इस तरह फेरबदल करेगी कि पानी के मुक्त व्यापार में कम से कम (या बिल्कुल नही) रुकावट पड़ें।

केवल गैर व्यापारिक आधार पर चलने वाली जल सेवाएं ही गैट्स समझौते के दायरे से बाहर होगी। ऐसी सेवाएँ जहाँ सरकार सीधे लोगों को बिना मुनाफा लिये जल आपूर्ति करती हो। यदि एक बार किसी नगरपालिका ने अपने जलापूर्ति संस्थान का निजीकरण करना शुरू किया तो किसी भी देश की बहुराष्ट्रीय कम्पनी को सीधा अधिकार होगा कि वह भी घरेलू कम्पनियों की तरह प्रतियोगिता में शामिल हो।

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