यमुना

Submitted by Hindi on Tue, 04/26/2011 - 09:52
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जमना खड़ी बाजार में, मांगे सबसे खैर (पुस्तक से साभार)

कहा जाता है कि पहले यमुना घग्गर की सहायक नदी थी। इसे वैदिक सरस्वती के नाम से भी जाना जाता था। इसे सप्त सिन्धु सात झरने, स्रोत भी कहते थे एक बड़ी प्राकृतिक घटना (टेक्टोनिक) में यमुना ने रास्ता बदला और यह गंगा की सहायक नदी बन गई। आज गंगा-यमुना का व्यापक विशाल क्षेत्र है।

यमुना को यमी नाम से जाना जाता है। यमुना, जमुना, जुमना, जमना आदि नाम से भी इसी पुकारते हैं। कालिंद पर्वत से निकलने के कारण इसको कालिंदी भी कहा जाता है। इसका पानी नीला, श्यामल है जो काला दिखता है। इसलिए भी इसे कालिंदी कहते हैं। यमुना के पिता तेजस्वी सूर्य भगवान तथा माता विश्वकर्मा की पुत्री ‘संजना’ है। यमुना सूर्यवंशी हैं तथा इसका भाई यम मौत का देवता है। यमुना और यम दोनों भाई बहनों में अगाध, प्रगाढ़ प्रेम रहा है। इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि माता संजना अपने पति तेजस्वी सूर्य का तेज बर्दाश्त नहीं कर पा सकीं इसलिए अपनी छाया पैदा करके स्वयं दूर चली गई। ऐसे में दोनों भाई-बहनों ने एक दूसरे का खूब ख्याल रखा तथा परस्पर इनका प्रेम और प्रगाढ़ हो गया। यमुना बहन और यम भाई के परस्पर प्रगाढ़ प्रेम की याद में ही“भैया दूज” का पर्व, त्यौहार, उत्सव मनाया जाता है। इसे “यम द्वितीया” के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यमुना ने यम को इस दिन अपने यहां भोजन पर बुलाया था। यह पर्व आज भी भाई-बहन के प्रेम के रूप में मनाया जाता है जो कि भाई बहन के प्रेम को दर्शाता है। भाई-बहन सुखी रहें, दीर्घायु हों, इसी कामना से यमुना देवी एवं यम देवता की विशेष पूजा इस दिन की जाती है। मान्यता है कि जो श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, निष्ठा, समर्पण भाव से यमुना में स्नान करेगा, यमुना की पूजा-पाठ-ध्यान करेगा, उसको यम का भय नहीं सतायेगा, उसका जीवन स्वस्थ एवं सुखी होगा।

यमुना की बात हो और उसमें कृष्ण की चर्चा न हो तो बात अधूरी ही रह जाती है। यहां हम कृष्ण का स्मरण मात्र ही करेगें, विस्तार से चर्चा नहीं। मथुरा, वृंदावन, बरसाने की धरती का यमुना और कृष्ण के साथ बहुत ही गहरा रिश्ता रहा है। यमुना नदी घाटी में अनेक तीर्थ स्थल, महत्वपूर्ण स्थान हैं। मगर हम उनकी चर्चा यहां नहीं कर सकें है। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल, तुलसीदास, सुरदास के जन्म एवं कर्मस्थल आदि।

कृष्ण का तो यमुना से जन्म से ही गहरा रिश्ता, संबंध रहा है। जन्म लेते ही कृष्ण को वासुदेव टोकरी में लेकर मथुरा से वृंदावन जा रहे थे तो यमुना मैया मध्य में पड़ीं। वासुदेव ने सोचा कि इतनी गहरी नदीं कैसे पार करूंगा। उन्होंने सोचा, प्रार्थना करनी शुरू की तथा यमुना मैया का ध्यान करते हुए नदी में प्रवेश किया, यमुना का जल स्तर बढ़ने लगा, वासुदेव जी मन में घबराए, उन्हें अपने से ज्यादा बच्चे कृष्ण की चिंता थी। यमुना कृष्ण के चरण छूने के लिए ऊपर उठ रही थीं। पिताजी की घबराहट की हालात देखकर कृष्ण ने टोकरी से अपना पांव लटकाया और यमुना ने कृष्ण के चरण छूकर शांत, प्रसन्न होकर वासुदेव को रास्ता प्रदान किया। वासुदेव जी ने कृष्ण को सुरक्षित वृंदावन में नंद-यशोदा के घर पहुंचा दिया।

कृष्ण का बचपन यमुना के किनारे ही गुजरा। कृष्ण की लीलाएं यमुना के आसपास ही हुईं। यमुना और कृष्ण लीला के अनेक किस्से हैं। यहां यमुना के महत्व के लिए ही इसकी झलक या चर्चा की है, इसकी विस्तार से व्याख्या करने का यह स्थान नहीं है। कृष्ण एवं यमुना के अनेक रोचक, प्रेरणा देने वाले किस्से भी हैं। हम इनका अध्ययन करेंगे तो कृष्ण-यमुना का रिश्ता, प्रेम, लगाव हमें स्पष्ट होगा। यमुना में कृष्ण का खेलना, उसके किनारे कुंजों में बंसी बजाना, सफाई करना, कदम्ब के पेड़ पर चढ़ना, छुपना, स्नान करना, उसके आस-पास गाय चराना, मक्खन लूटना, ग्वाल बालों एवं गोपियों के साथ रास रचाना, नाचना, खेलना, लीलाएं करना आदि उनके जीवन की यमुना के साथ अद्भुत घटनाएं हैं।

अनेक भक्त, ऋषि, कवि, लेखकों का यमुना के साथ गहरा रिश्ता, संबंध रहा है। उन सबको याद करते हुए यमुना या किसी भी नदी के संरक्षण, बचाव, सुरक्षा, सेवा कार्य में जो भी व्यक्ति, संगठन, समूह कार्य कर रहे है उनके प्रति हम अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए आशा करते है कि नदियां साफ, स्वच्छ, निर्मल पानी के साथ पुनः अपनी रंगत में आएंगी।

यमुनोत्री से पहले यमुना हिमखंडों में रहती है। यमुना हिम नदी है जो हिम खंडों के पिघलने से बनती है। यमुना यमुनोत्री बंदरपुंछ के पास से (30 58’N, 78 27’ E) हिमालय के लगभग 6320 मीटर ऊंचाई से निकलती है। यमुना की धाराओं को वसुधारा, सप्तधारा, सहस्त्रधारा, गुप्तधारा, गिरिजा नाम से भी जाना जाता है। कुछ दूरी आने पर गरूड़ गंगा, ऋषि गंगा, भैरवघाटी, खरसाली में तथा हनुमान चट्टी में हनुमान-गंगा यमुना में मिलती है। बदियर, कमलाद, बदरी, अस्लौर नदी को समाकर यमुना आगे बढ़ती रहती है। शिवालिक पहाड़ियों के मध्य दून घाटी होती हुई टोंस जिसे सुप्पीन भी कहते है, के साथ असान, आशानदी, गिरी, सिरमौर आदि नदियां यमुना में मिलती हैं। सहारनपुर जिले के फैजाबाद ग्राम के पास यमुना मैदान में उतरती है। इसमें मस्करी, कठ, हिंडन, कृष्णी, काली, सबी, करबत, गंभीर, सेंगर, छोटी सिंध, बेतवा, केन, चंबल आदि नदियां मिलती हैं। यमुनोत्री में तप्त (उष्ण, गर्म) कुण्ड भी हैं जिन्हें सूर्य कुण्ड, गौरी कुण्ड, द्रौपदी कुण्ड कहते है। गर्म कुण्ड में गर्म पानी देखकर प्रकृति का अद्भुत नजारा याद आता है। एक तरफ हाड़ कंपाने वाला ठण्डा पानी दूसरी ओर गर्म पानी के कुण्ड, प्रकृति के क्या नजारे हैं। प्रकृति अजूबों से भरी है, देखने, समझने, जानने वालों को दृष्टि चाह, इच्छा, रूचि, तपस्या, साधना, दिशा, खोज, तप की जरूरत है।

यह भी कहा जाता है कि पहले यमुना घग्गर की सहायक नदी थी। इसे वैदिक सरस्वती के नाम से भी जाना जाता था। इसे सप्त सिन्धु सात झरने, स्रोत भी कहते थे एक बड़ी प्राकृतिक घटना (टेक्टोनिक) में यमुना ने रास्ता बदला और यह गंगा की सहायक नदी बन गई। आज गंगा-यमुना का व्यापक विशाल क्षेत्र है। यमुना के बारे में ऋग्वेद, अथर्वेद, ब्राह्ममणस, अत्रेय ब्राह्ममण, शतपथ ब्राह्ममण में भी चर्चा मिलती है। राजा सिकंदर के साथी सेल्यूकस एवं ग्रीक यात्री मेगस्थनीज ने भी यमुना की चर्चा अपने लेखन में की है। तुगलक ने नहरे-बहिस्त (स्वर्ग की नहर) यमुना से निकाली, मुगलों ने इसकी मरम्मत की और इसे बेनवास से शाहजहांनाबाद तक बढ़ाया।

यमुना के क्षेत्र में हाथी भी पाए जाते हैं। शिवालिक पहाड़ियों पर साल, खैर, चीड़ रोजवुड के वृक्ष (वन) पाए जाते हैं। हथिनी कुण्ड, ताजेवाला में यमुना का पानी रोका जाता है। जहां से पश्चिमी यमुना नहर और पूर्वी यमुना नहर निकाली गई। पश्चिमी यमुना नहर (डब्ल्यू वाई सी) हरियाणा के उत्तरी जिलों को जल प्रदान करती है। पश्चिमी यमुना नहर, यमुना नगर, करनाल, पानीपत होते हुए हैदरपुर ट्रीटमेंट प्लांट पहुंचती है, यहां से दिल्ली को पानी की पूर्ति की जाती है। दिल्ली, हांसी, सिरसा इसकी मुख्य शाखाएं हैं। पूर्वी यमुना नहर (ईवाईसी) सहारनपुर जिले में फैजाबाद से यमुना के बाएं किनारे से निकलकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों को जल प्रदान करती हुई दिल्ली के निकट फिर से यमुना में आ मिलती है। आगरा नहर दिल्ली के ओखला बैराज से निकलकर आगरा के पास फिर यमुना नदी में मिल जाती है। यमुना गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है।

यमुना घाटी का क्षेत्र भी विशाल है विभिन्न काल खंड की दृष्टि से मशहूर शहर कुरूक्षेत्र, इन्द्रप्रस्थ, मथुरा, वृंदावन (महाभारत), चित्रकूट (रामायण), उदयपुर, जयपुर, बूंदी, चितौड़गढ़ (राजपूताना), झांसी, ओरछा, महोबा, काल्पी (बुंदेलखंड) इंदौर, ग्वालियर (मराठा), आगरा, भोपाल, पानीपत (मुगल) और भारत का राजनैतिक दिल दिल्ली भी यमुना की घाटी में आते हैं।

यमुना के किनारे दिल्ली जैसे महानगर के साथ-साथ बागपत, नोएडा, मथुरा, आगरा, इटावा, काल्पी, हमीरपुर, इलाहाबाद, आदि शहर बसे हैं। टोंस, चम्बल, बेतवा, केन, हिंडन आदि यमुना की सहायक नदियां हैं। यमुना 1376 कि.मी. की दूरी तय करके इलाहाबाद में प्रयागराज में गंगा से जा मिलती है। इस तरह दोनों जुड़वा बहनें एक दूसरे में समा जाती है और यहां के बाद गंगा नाम से आगे बढ़ती है।

इसकी एक झलक हमें निम्न तालिका से कुछ स्पष्ट चित्र के रूप में प्राप्त होगीः

यमुना नदी-एक झलक


- कुल दूरी (लम्बाई) 1376 कि.मी., यमुनोत्री से प्रयागराज, इलाहाबाद
- प्रारंभ (उत्पत्ति): यमुनोत्री (जमुनोत्री) उत्तराखंड से
- संगम प्रयागराज, इलाहाबाद (उ.प्र.) में

भाग

राज्य कि.मी.

दूरी/लंबाई/नाले

सहायक नदी/

बांध/बैराज

नहर

हिमालय यमुनोत्री से हथिनी कुण्ड

उत्तराखंड

उ.प्र. हिमाचल

172 कि.मी.

कमल, गिरी,

टोंस, असान

डाक पत्थर

बैराज, असान

बैराज

डाक पत्थर

नहर, असान

नहर

ऊपरी स्रोत (अपर स्ट्रीम) दिल्ली (समतल) हथिनी कुण्ड से वजीराबाद बैराज

हरियाणा

उ.प्र. दिल्ली

224 कि.मी.

सोम नदी

छोटी यमुना

नाला नं. 2,8

हथिनी कुण्ड

बैराज

पश्चिमी

यमुना नहर,

 पूर्वी यमुना

नहर

दिल्ली वजीराबाद बैराज से यमुना (आई.टी.ओ.) बैराज, ओखला बैराज

दिल्ली

22 कि.मी.

22 नाले

(सूची अलग

स्थान

पर है)

हिण्डन

वजीराबाद

बैराज,

यमुना बैराज

(आई.टी.ओ.)

आगरा नहर

निचला स्रोत (डाउन स्ट्रीम) दिल्ली-ओखला बैराज से चंबल संगम

उ.प्र.

हरियाणा

490 कि.मी.

हिण्डन,

भूरिया

नाला, मथुरा-

वृंदावन

नाला आगरा नाला

ओखला

बैराज

आगरा

नहर,

गुड़गांव

नहर

पुनर्जागृत, बहती यमुना, चंबल मिलन से गंगा संगम

उ.प्र.

468 कि.मी.

चंबल, केन,

काली, सिंध, बेतवा

-

-

कुल लम्बाई

-

1376 कि.मी.

-

-

-



यमुना नदी घाटी क्षेत्र


यमुना नदी घाटी क्षेत्र को जानने के लिए इसके विभिन्न पहलुओं को जानना, समझना उपयोगी एवं जरूरी है। इसकी मिट्टी कैसी है? इसमें क्या-क्या खनिज पाए जाते है? भूजल की स्थिति क्या है? क्षेत्र का तापमान कैसा रहता है, उसमें वाष्पीकरण एवं वर्षा की क्या स्थिती है? घाटी का भौगोलिक वर्गीकरण किस रूप में और कितना है? भूमि का उपयोग कैसे, किस रूप में हो रहा है? घाटी में कौन सी फसलें पैदा की जाती हैं? जलग्रहण क्षेत्र का क्या प्रभाव है? कौन सी सहायक नदियां यमुना को समृद्ध बनाती रही हैं? प्रदूषण की क्या स्थिति है? इन एक-एक मुद्दे पर हम अब कुछ जानकारी साझा करते है।

मिट्टी


यमुना नदी घाटी में विभिन्न तरह की मिट्टी पाई जाती है। कछारी (अल्यूविअल) सबसे ज्यादा 42%,मध्यम काली (मिडियम ब्लैक) 25.5%, लाल एवं काली मिश्रित 15%, गहरी काली 5.5%, लाल एवं पीली 5%, भूरी पहाड़ी (ब्राउन पहाड़ी) 4%, लाल बलुई (रेड सेंडी) 2.5%, तथा चूनेदार (कैल्केरिअस सिरोजेमिक) 0.5%।

खनिज


खनिजों में यमुना नदी घाटी का क्षेत्र बहुत धनी नहीं है। कुछ सीमित ही खनिज क्षेत्र में उपलब्ध है जिनमें चूना का पत्थर की खदान मसूरी हिल्स तथा राजस्थान के कुछ हिस्सों में, पत्थर की खदान दिल्ली एवं झासी (उ.प्र.) तथा कुछ स्थानों पर राजस्थान एवं मध्यप्रदेश में पाई जाती है। इसके साथ ही हीरा की खदानें पन्ना (म.प्र.) में है। उदयपुर और खेतड़ी में तांबे की भी खदान हैं। खनिज के मामले में यमुना क्षेत्र सामान्य है।

भूजल की उपलब्धता


यमुना नदी घाटी में भूजल की उपलब्धता में भी पर्याप्त अंतर है। उत्तर-पूर्व के समतल में 15% क्षेत्र में अच्छा, व्यापक भूजल उपलब्ध है। यहां भूजल का स्रोत अच्छी मात्रा में है। सीमित मात्रा में भूजल 19% क्षेत्र में जयपुर, सवाई माधोपुर, भरतपुर, कोटा, ग्वालियर, जालौन, हमीरपुर और बांदा जिलों में उपलब्ध है। बहुत कम तथा प्रतिबंधित भूजल, हमीरपुर, बांदा जिलों के कुछ हिस्सों तथा पन्ना, दमोह जिले में उपलब्ध है, यह क्षेत्र लगभग 4% है। प्रतिबंधित भूजल के साथ खारा एवं ब्रेकिश (सलाईन) लगभग 10% क्षेत्र भिवानी, रोहतक, महेन्द्रगढ़, गुड़गांव, रेवाड़ी, मथुरा, आगरा, जिलों के साथ-साथ दिल्ली आदि में उपलब्ध है। बहुत ही प्रतिबंधित स्थानीय भूजल हिस्सों में विभक्त 52% क्षेत्र में सारा पहाड़ी क्षेत्र, पठार (प्लेटू) समतल का हिस्सा टोंक, अलवर तथा उ.प्र. सीमा पर उपलब्ध है।

तापमान


यमुना नदी घाटी क्षेत्र में कार्यरत मौसम विभाग, भारत सरकार के शिमला देहरादून, नई दिल्ली, हिसार, जयपुर, उज्जैन, भोपाल एवं इलाहाबाद स्टेशन के आंकड़ों पर नज़र डालें तो क्षेत्र के तापमान की स्थिति स्पष्ट होती है कि आमतौर पर एक जैसा ही सारे क्षेत्र में होता है। मध्य या मई अंत में तापमान सबसे ज्यादा तथा दिसंबर और जनवरी प्रारम्भ में तापमान सबसे निम्न स्तर पर रहता है। देहरादून, शिमला, स्टेशनों को छोड़ दें तो आमतौर पर तापमान 40 सी. से 42 सी. के आसपास अन्य क्षेत्रों में तथा 36 सी. से 25 सी. देहरादून-शिमला में रहता है। निम्न तापमान अन्य क्षेत्रों में 5 सी. से 9 सी. तथा शिमला, देहरादून पहाड़ी क्षेत्र में निम्न स्तर तक भी जाता है। रात और दिन के तापमान में लगभग 15 सी. का अंतर गर्मी एवं सर्दी में आता है तथा वर्षा ऋतु (मानसून) में 6 सी. से 10 सी. का अंतर अन्य क्षेत्रों में पाया जाता है इसलिए कहा जा सकता है कि यमुना नदी घाटी क्षेत्र में पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर शेष अन्य क्षेत्रों में तापमान का मिजाज, स्वभाव, ढंग एक जैसा ही पाया जाता है तथा तापमान 5 सी. से 42 सी. के बीच रहता है।

वाष्पीकरण


यमुना नदी घाटी क्षेत्र में वाष्पीकरण भी सामान्यता एक जैसा ही पाया जाता है। निम्नतम वाष्पीकरण दिसम्बर-जनवरी में तथा अधिकतम मई के आसपास होता है। फरवरी माह में थोड़ा-बहुत बढ़ना शुरू होता है जो मई तक बढ़ता है तथा वर्षा के साथ कम होने लगता है जो अगस्त में कुछ स्थानों पर कम हो जाता है। सितम्बर-अक्टूबर में फिर हल्का बढ़ता है, वर्षा के बाद और फिर सर्दी के मौसम में कम होने लगता है। मई माह में अलग-अलग स्थानों पर लगभग अधिकतम वाष्पीकरण उज्जैन में 450 मि.मी., जयपुर-दिल्ली में 350 से 400 मि.मी., हिसार, भोपाल एवं इलाहाबाद में 300 मि.मी., देहरादून में 250 एम.एम. तथा शिमला में 200 मि.मी. से नीचे रहता है।

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