टौंस घाटी में पर्यावरण व मानवाधिकार पर हमला

Submitted by Hindi on Fri, 05/06/2011 - 09:14
Source
माटू जनसंगठन

प्रस्तावित नैटवाड - मोरी जल विद्युत परियोजना (60 मेवा) 03.05.2011 की जन सुनवाई में असली मुद्दे गायब


03.05.2011 की जन सुनवाई स्थगित मानी जाये और पुनः मांगो के अनुसार हो


टौंस घाटी में प्रस्तावित 16 जल विद्युत परियोजनाओं में पहली जल विद्युत परियोजना, प्रस्तावित नैटवाड-मोरी जल विद्युत परियोजना (60 मेवा) की जनसुनवाई 3.5.2011 को हुई। यहां पर भी वही हुआ जैसा आज तक उत्तराखंड में होता आया है कि लोगों को जनसुनवाई में कोई जानकारी नहीं दी जाती है, वैसा ही हुआ। इसके नतीजे यह होते हैं कि परियोजना को तुरंत पर्यावरण स्वीकृति तो मिल जाती है किन्तु परियोजना पूर्ण होने के बाद भी विस्थापन व पर्यावरण के लिये लोगों का संघर्ष चलता रहता है। मनेरी-भाली चरण दो इसका ज्वलंत उदाहरण है कि बांध बनने के बाद मालूम हो पाया कि डूब कहां तक आयेगी।

टौंस घाटी में मोरी ब्लाक के नैटवाड गांव में आयोजित इस जन सुनवाई के यहां घाटी के लोगों को पता तक नहीं था कि क्या होने वाला है। बांध कंपनी सतलुज जल विद्युत निगम का यह प्रयास सफल भी रहा है कि लोगों को मालूम ही ना हो पाये कि जनसुनवाई क्या है? क्यों है? इसका क्या अर्थ है? यह किन कागजातों के आधार पर होती है? जिन कागजों पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट और प्रबंध योजना, के आधार पर जन सुनवाई होती है वे क्या है? क्या ये बांध कंपनी द्वारा कहीं-कहीं पर दिये गये चालाकीपूर्ण 25-26 पन्नों के कागजात ही होते है? इस परियोजना से भविष्य में क्या होगा?

अंग्रेजी के सैकड़ो पन्ने के पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट और प्रबंध योजना की मात्र सार-संक्षेप जो कुछ लोगों को बांटा गया है। इस सार-संक्षेप में चालाकी से परियोजना के बुरे असरो को ना बता कर इस बात पर जोर दिया गया है कि पुनर्वास के लिये कितना पैसा कैसे खर्च किया जायेगा। लोगों को पूरी जानकारी होना घाटी के भविष्य के लिये आवश्यक है। पहले हम जान तो ले कि बांध है क्या? कोई आफत नहीं आ रही है। जब तक सही रुप में बांध के असरों को नहीं जानेंगे तब तक बांध से लाभ या मांग रखना भी गैर वाजिब है।

बिना सही व पूर्ण जानकारी दिये यह जन सुनवाई करना पर्यावरण एंव वन मंत्रालय की 15 सितबंर 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना के शब्दों व अर्थ का उल्लंघन है और क्षेत्र के साथ धोखा है।

सतलुज जल विद्युत निगम ने क्षेत्रिय जनता को भ्रम में रखा है। लगातार कानूनों का उल्लंघन किया है। जिस गोविंद वन्यजीव विहार में वाहनों का आना-जाना बंद है, विस्फोट करने पर तो पूरी ही पाबंदी है वहां कैसे नवम्बर 2010 में एक विस्फोटकों से भरी गाड़ी पहुंच गई। फिर उसकी जांच दबा दी गई। यह जांच का विषय है। यह बांध कंपनी के कुकर्मों का एक उदाहरण है। यह धोखा देने का क्रम इस जन सुनवाई में भी दिखा है। जनसुनवाई के लिये पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट व पर्यावरण प्रबंध योजना का सार-संक्षेप कुछ लोगों को बांटा गया है वह अपूर्ण व दिग्भ्रमित करने वाला है।

जो 24 पन्नों का सार-संक्षेप देखा उसमें महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट नहीं है जैसे-
प्रभावितों कि सूची ग्रामीणों को क्यों नहीं दी है? 97 परिवारों को ही प्रभावित माना है। पर प्रभावित तो पूरी घाटी होगी। कितने प्रतिशत स्थानीय लोगों को नौकरी मिलेगी? जलाशय के चारों ओर क्या कोई सुरक्षा पट्टी बनेगी? यदि बनेगी तो उसका आधार क्या होगा? सुरक्षा दिवारें कहां बनेगी? उनके स्थान चुनने का क्या आधार है? सिदरी, कासला, गंगाड़, नैटवाड, गैचवाणगांव एंव ताल्लुका जैसी बस्तियां और फफराला गाड, हलारा गाड, मियांगाड, छिबाडा गाड, गियागाड आदि गाड पूरी तरह से भूस्खलन की चपेट मे है। इसका कोई जिक्र नहीं। बांध संबंधी संकटकालीन प्रबंधन, भूमि कटाव पर नियंत्रण व आपात कालीन उपाय ये सब लोगों की जिन्दगी से जुड़े मुद्दे हैं। इनकी पूरी जानकारी यानी कब? क्या? क्यों? कैसे? बांध से पर्यावरण पर क्या-क्या प्रभाव असर होंगे? यह मालूम ही नहीं होता। पशुओं के चारे का क्या होगा? चारागाह व उसके रास्तों का क्या होगा? गोविंद पशु विहार व अभ्यारण्य इस परियोजना के क्षेत्र में आते हैं। हमारे क्षेत्र के कई गांवो में इसके कारण वाहन ले जाने पर पाबंदी है, सड़क नहीं बनी है और अब इसी क्षेत्र में विशालकाय बांध का निर्माण हो रहा है, तो क्या इस बांध के कारण पशु-पक्षियों पर पड़ने वाले असरों का कोई अध्ययन हुआ है? यमुना की सहायक नदियाँ टौंस, पब्बर आदि पर बांध के बाद बांध बन रहे हैं। क्या इनका कोई गुणात्मक या अतंरसंबंधी अध्ययन नहीं किया गया है?

बांध परियोजनाओं के विकल्पों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। जबकी पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिर्पोट में ये अध्ययन होना जरूरी होता है। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट और प्रबंध योजना सार-संक्षेप परियोजना के पक्ष में ही बात कहता है जिससे मालूम पड़ता है कि ये निष्पक्ष नहीं है। जबकि ये होना चाहिये था। टौंस नदी में पानी भी पहले से कम होता जा रहा है, तो ग्लेशियर की क्या स्थिति है? बांध के बनने के बाद नदी में लगातार कम से कम कितना पानी होगा?

जब इस परियोजना में हजारों लोग काम करेंगे तो महिलाओं की सुरक्षा का क्या होगा? परियोजना के जलाशय से खेती पर क्या असर पडे़गा? जलाशय में जल-स्तर ऊंचा-नीचा होगा? रवांई घाटी की सुंदरता और संस्कृति पर क्या प्रभाव पडे़गा? देश में बांधों के टूटने का लंबा इतिहास है। इसके उदाहरण श्रीनगर परियोजना का कॉफर बांध 2 बार टूटा, कोटेश्वर बांध की प्रत्यावर्तन सुरंग ही धंस गई, किन्तु फिर भी सार-संक्षेप में कोई आपदा प्रबंध योजना का जिक्र नहीं हैं?

जबकि इआईए बनाने का ठेका श्रीनगर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं। हिमाचल की रोहड़ू तहसील में चीड़ गांव में बने पावर हाउस के टूटने से, चीड़ गांव में तो तबाही आई ही उसके लगभग 60 किलोमीटर नीचे त्युनी कस्बे तक बाढ़ आई थी और सार-संक्षेप में इआईए ठेकेदार मात्र नदी पर विभिन्न बांध की कंपनियों के आपसी तालमेल की बात कही गई है। तो क्या ये कंपनियां सिर्फ आपस में मात्र बात ही करेंगी? इसमें जो नक्शा दिया गया है वह इतने छोटे अक्षरों मे है कि पढ़ना पूरी तरह मुश्किल है।

ऐसे अनेक प्रश्न टौंस घाटी के भविष्य को लीलने को आतुर हैं उनका कहीं कोई जिक्र नहीं था। जन सुनवाई की कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए ही सारा नाटक चला। असली मुद्दों पर कहीं चर्चा ही नहीं है। लोगों को इन शंकाओं का उत्तर मात्र कुछ मिनटों में नहीं वरन सही तरह से गांव-गांव में जाकर समझाया जाये। क्यों सरकारें/बांध कंपनी और लोगों के बीच आने से डरती है?

जन सुनवाई में विभिन्न निवेदनों में हमने ये ही मांग उठाई हैः-
• नैटवाड-मोरी जल-विद्युत परियोजना (60 मेवा) की आज 3.5.2011 की जन सुनवाई को रद्द माना जाये।
• पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट व पर्यावरण प्रंबध योजना उपर दिए सभी मुद्दों को सही रूप में जोड़ कर, पुनः दोनों कागजात पर्यावरण विशेषज्ञों आदि से बनवाए जाए।
• नयी बनने वाली पूरी पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट व पर्यावरण प्रबंध योजना हिन्दी में अगली जन सुनवाई से एक महीना पहले प्रत्येक गांव में दी जाए व समझायी जाए, ताकि परियोजना प्रभावों की सम्पूर्ण जानकारी के साथ हम अपनी टिप्पणी/प्रतिक्रियाएं दे सकें।

यदि यह नहीं होता तो सरकारें क्षेत्र में, भविष्य में होने वाले आंदोलनों व पर्यावरण विनाश के जिम्मेदार होगें। जिला प्रशासन व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भी यह जिम्मेदारी है कि वो अपनी रिपोर्ट में ये तथ्य सही रूप में दें।

विमलभाई व राजपाल रावत, माटू जनसंगठन, प्रहलाद सिंह जयसिंह राणा, टौंस घाटी जाग्रत समिति

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