प्राकृतिक खेती के चार सिद्धांत

Submitted by Hindi on Fri, 05/20/2011 - 13:26
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

छेड़-छाड़ न करने से प्रकृति-संतुलन बिल्कुल सही रहता है। नुकसानदेह कीड़े तथा बीमारियाँ तो मौजूद हमेशा ही रहती हैं, लेकिन प्रकृति में वे इतनी ज्यादा कभी नहीं हो जाती कि उनके लिए विषाक्त रसायनों का उपयोग किया जाए।

इन खेतों में जरा संभल कर आयें। तरह-तरह के पतंगे और मधुमक्खियाँ उड़ रहे हैं। मधुमक्खियाँ एक फूल से दूसरे की तरफ भागी जा रही हैं। जरा पत्तियों को हटाकर देखें तो आपको कीड़े, मकड़ियों, मेंढक, गिरगिट तथा कुछ और छोटे-बड़े प्राणी ठंडी छांव में इधर-उधर भागते नजर आएंगे। मिट्टी की सतह के नीचे दीमक और केंचुए छिपे हुए हैं। यही है धान के खेतों की संतुलित परिस्थिति की प्रणाली। यहां कीट और पौधों की बिरादरियां एक तरह का सुस्थिर संबंध बनाए रखती है। इस इलाके में से भी पौध व्याधियों को गुजरना कोई नई बात नहीं है, लेकिन वे इन खेतों को अप्रभावित छोड़ देते हैं।

और अब देखिए मेरे पड़ोसी के खेत को। यहां से खरपतवार, शाकनाशियों तथा फसल के द्वारा हटादिए गए हैं। उस जहर ने मिट्टी के जीव तथा कीड़े खत्म कर दिए हैं। रासायनिक उर्वरकों ने मिट्टी के जैव-पदार्थों तथा सूक्ष्म जीव-जंतुओं को जलाकर राख कर दिया है। गर्मियों के मौसम में आप किसानों को हाथ में रबर के दस्ताने तथा गैस मुखौटे लगाए हुए खेतों में काम करते देख सकते हैं। ये धान के खेत, जिन पर किसान डेढ़ हजार साल में खेती कर रहे हैं, एक ही पीढ़ी की शोषक कृषि प्रथाओं के कारण बंजर बना दिए गए हैं।

चार सिद्धांत


पहला सिद्धांत है, खेतों में कोई जुताई नहीं करना। यानी न तो उनमें जुताई करना, और न ही मिट्टी पलटना। सदियों से किसानों ने यह सोच रखा है कि फसलें उगाने के लिए हल अनिवार्य है। लेकिन प्राकृतिक कृषि का बुनियादी सिद्धांत खेत को न-जोतना है। धरती अपनी जुताई स्वयं स्वाभाविक रूप से पौधों की जड़ों के प्रवेश तथा केंचुओं व छोटे प्राणियों, तथा सूक्ष्म जीवाणुओं के जरिए कर लेती है।

दूसरा सिद्धांत है कि किसी भी तरह की तैयार खाद या रासायनिक उर्वरकों का उपयोग न किया जाए।

तीसरा सिद्धांत है, निंदाई-गुड़ाई न की जाए। न तो हलों से न शाकनाशियों के प्रयोग द्वारा। खरपतवार मिट्टी को उर्वर बनाने तथा जैव-बिरादरी में संतुलन स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। बुनियादी सिद्धांत यही है कि खरपतवार को पूरी तरह समाप्त करने की बजाए नियंत्रित किया जाना चाहिए। मेरे खेतों में प्रभावी खरपतवार नियंत्रण के लिए पुआल बिछाने, फसल के बीच-बीच में सफेद मेथी उगाने तथा अस्थाई जैसे तरीके अपनाता हूँ।

चौथा सिद्धांत रसायनों पर बिल्कुल निर्भर न करना है।
जोतने तथा उर्वरकों के उपयोग जैसी गलत प्रथाओं के कारण जब से कमजोर पौधे उगना शुरू हुए, तब से ही खेतों में बीमारियां लगने तथा कीट-असंतुलन की समस्याएं खड़ी होनी शुरू हुई। छेड़-छाड़ न करने से प्रकृति-संतुलन बिल्कुल सही रहता है। नुकसानदेह कीड़े तथा बीमारियाँ तो मौजूद हमेशा ही रहती हैं, लेकिन प्रकृति में वे इतनी ज्यादा कभी नहीं हो जाती कि उनके लिए विषाक्त रसायनों का उपयोग किया जाए। बीमारियों तथा कीटों के बारे में समझदारी वाला तरीका यही है कि स्वस्थ पर्यावरण में हष्ट-पुष्ट फसले उगाई जाएं।

जमीन की जुताई


मिट्टी की जब जुताई की जाती है, तो उसका प्राकृतिक पर्यावरण इतना बदल जाता है कि आप उसे पहचान नहीं सकते। इस तरह के कारनामों के कारण ही किसानों की नींद पीढ़ियों से उड़ती चली आ रही है। मसलन, जब भी किसी प्राकृतिक क्षेत्र में हल चलाया जाता है, वहां की वनस्पतियों पर घास तथा खरपतवार भारी मात्रा में उग कर हावी हो जाते हैं। इस बार इन खरपतवारों की जड़ें जमीन में जम जाने पर किसानों को उनकी निंदाई हर साल करनी पड़ती है और यह काम इतना असंभव हो जाता है कि कई बार उन्हें जमीन को ही त्याग देना पड़ता है।

इस तरह की समस्याओं से निपटने का एक मात्र समझदारी भरा तरीका यही है कि उन अप्राकृतिक प्रथाओं को तत्काल बंद कर दिया जाए जिनके कारण ही यह समस्या खड़ी हुई। जो नुकसान हुआ है उसकी मरम्मत करने की जिम्मेदारी किसान की भी होती है। भूमि का जुताई (हल चलाना, निंदाई, गुड़ाई) बंद कर देना चाहिए। यदि मानव-निर्मित रसायनों तथा मशीनों के जरिए सब कुछ समाप्त कर देनेवाली जंग छेड़ने की बजाए पुआल फैलाने तथा मेथी उगाने जैसे सौम्य तरीके अपनाए जाएं तो पर्यावरण धीरे-धीरे अपने स्वाभाविक संतुलन की तरफ वापस लौटेगा, और हो सकता है, आप परेशानी कर रही खरपतवार का नियंत्रण कर लें।

उर्वरक


भूमि उर्वरता-विशेषज्ञों से बतियाते हुए मैं अक्सर पूछता हूँ: ‘यदि किसी खेत को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए तो इससे उसकी उर्वरता घटेगी या बढ़ेगी?’ अक्सर वे थोड़ा सोचते हैं और फिर कुछ यूं कहते हैं: ‘देखिए... वह तो बिगड़ ही जाएगी।’ नहीं, वह नहीं बिगड़ेगी, यदि आप याद रखें कि एक ही खेत में यदि लंबे समय तक चावल बिना उर्वरक दिए उगाया जाता रहा है तो पैदावार प्रति चौथाई एकड़ 9 बुशेल (250 किलो) पर जम जाती है। जमीन न तो समृद्ध होगी, न वह बिगड़ेगी।

वे विशेषज्ञ उन खेतों का जिक्र कर रहे हैं, जो जल-प्लावित और जोते हुए हैं। यदि प्रकृति के साथ दखलंदाजी न की जाए तो उर्वरता बढ़ती है। पौधों और जीवों के अवशेष एकत्र होते जाते हैं। मिट्टी की सतह पर फफूंद और कीड़ों के द्वारा वे सड़ाए जाते हैं। वर्षा जल के साथ ये मिट्टी के भीतर गहराई तक पहुंच, केंचुओं, सूक्ष्म-जीवाणुओं तथा अन्य प्राणियों की खुराक बनते हैं। पौधों की जड़ें मिट्टी के निचले स्तर तक पहुँचकर वापस इन पोषक तत्वों को खींच कर ऊपरी सतह तक लाती हैं।

यदि आप धरती की स्वाभाविक उर्वरता का जायजा लेना चाहें तो कभी इस पहाड़ी के जंगली इलाकों की सैर करें। आप देखेंगे कि वहां लंबे-तगड़े वृक्ष उग रहे हैं, और उन्हें कभी किसी ने कोई खाद-पानी नहीं दिया। प्रकृति की अपनी खुद की उर्वरता ही काफी होती है।

पुआल को सड़ने के लिए मैं खेत में बत्तखों को खुला छोड़ देता था। यदि इन्हें चूजों के रूप में उस समय खेत में छोड़ा जाए, जब कि पौधे अभी अंकुरित ही हुए हैं तो, बत्तखें भी चावल के साथ-साथ ही बढ़ती हैं। बस, केवल दस बत्तखों की बीट के रूप में चौथाई एकड़ के खेत के लिए पर्याप्त खाद प्राप्त हो जाती है।

प्राकृतिक वन-आवरण को काट दीजिए, फिर वहां जापानी लाल देवदार या तून के झाड़ को कुछ पीढ़ियों तक उगाते रहिए। आप देखेंगे कि वहां की जमीन बिगड़ कर भू-क्षरण होने लगा है। दूसरी तरफ आप लाल चिकनी मिट्टी वाली बंजर पहाड़ी लीजिए, और वहां अल्फा-अल्फा घास तथा मेथी के जमीनी आवरण के बीच देवदार तथा तून के पेड़ बो दीजिए। खाद मिट्टी को नर्म और समृद्ध बनाती है, वृक्षों के नीचे खरपतवार और झाड़ियाँ उगने लगती हैं, और उसके साथ ही पुनर्जनन का एक नया चक्र शुरू हो जाता है। ऐसे भी उदाहरण देखने में आए हैं, जब कि मिट्टी की ऊपरी चार इंच सतह, दस से भी कम वर्षों में समृद्ध हो गई।

कृषि फसलें उगाने के लिए भी तैयार की हुई खाद (उर्वरक) का उपयोग बंद कर दिया जाना चाहिए। अधिकांशतः हरी खाद का स्थाई आवरण तथा सादे-पुआल और भूसे को वापस खेत में फैला देना पर्याप्त होगा। पुआल को सड़ने के लिए मैं खेत में बत्तखों को खुला छोड़ देता था। यदि इन्हें चूजों के रूप में उस समय खेत में छोड़ा जाए, जब कि पौधे अभी अंकुरित ही हुए हैं तो, बत्तखें भी चावल के साथ-साथ ही बढ़ती हैं। बस, केवल दस बत्तखों की बीट के रूप में चौथाई एकड़ के खेत के लिए पर्याप्त खाद प्राप्त हो जाती है। और ये खरपतवार को भी काबू में रखती है।

मैं ऐसा बरसों करता रहा। बाद में यहां राष्ट्रीय राजमार्ग बन जाने से बत्तखों के लिए सड़क पार कर खेतों में जाकर वापस अपने दबड़ों में लौटना मुश्किल हो गया। अब पुआल को सड़ाने के लिए मैं थोड़े से ही चूजों की खाद का उपयोग करता हूँ। अन्य इलाकों में तो बत्तखों या अन्य चरने वाले छोटे प्राणी अब भी काम के हैं।

बहुत ज्यादा उर्वरक देने से भी समस्याएं खड़ी होती हैं। एक साल, चावल रोपने के ठीक बाद, मैंने कोई सवा एकड़ का प्लॉट, जिस पर ताजा-ताजा चावल रोपा गया था, एक वर्ष के लिए किराए पर ले लिया। मैंने खेतों में से सारा पानी बाहर निकाल दिया और बिना रासायनिक उर्वरकों के काम चलता रहा। थोड़ी सी मुर्गी की खाद ही खेतों में डाल पाया। खेतों में से चार में तो फसल ठीक से बढ़ी, लेकिन पांचवें में मेरे सारे प्रयासों के बावजूद धान के पौधे, खूब घने बढ़े और उन्हें माहू की बीमारी लग गई। जब मैंने खेत के मालिक से इस बारे में पूछताछ की तो उसने बतलाया कि उसने जाड़े के दौरान उस खेत का उपयोग मुर्गी-खाद का ढेर लगाने के रूप में किया।

पुआल, हरी खाद तथा थोड़ी सी कुक्कट खाद का उपयोग करते हुए ही कोई भी काफी अच्छी पैदावार ले सकता है। इसके लिए उसे तैयार की हुई खाद या व्यापारिक उर्वरकों का सहारा नहीं लेना होगा। कई दशकों से मैं आराम से बैठकर जुताई करने और उर्वरकता बढ़ाने के प्राकृतिक तरीकों को देख रहा हूं। और उसे देखते ही सब्जियों, संतरों, चावल (जाड़े के अनाज भी) की जोरदार फसलें कहना चाहिए, धरती की कुदरती उर्वरता के बल पर ही ले रहा हूं।

खरपतवार से कैसे निपटें


खरपतवार से निपटते समय इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को याद रखना उचित होगा। जैसे ही भूमि की जुताई करना बंद कर दिया जाता है, खरपतवार की मात्रा बहुत घट जाएगी। साथ ही किसी खास खेत में खरपतवार की किस्में भी कम हो जाएगी। पिछली फसल को काटने के पूर्व ही यदि नई फसल के बीज बो दिए जायेंगे तो इस फसल के बीज खरपतवार के पहले अंकुरित हो जाएंगे। जाड़े की फसल के बीज चावल कट जाने के बाद ही फूटेंगे, लेकिन तब तक जाड़े की फसल काफी उग आई होगी। गर्मी का खरपतवार जौ और राई की फसलें कटने के बाद अंकुरित हो जाता है, लेकिन उस समय तक चावल की फसल काफी बढ़ चुकी होती होगी। बीजों की बोनी इस ढंग से करें कि दोनों फसलों के बीच के अंतर न रहे। इससे अनाज के बीजों को खरपतवार से पहले ही अंकुरित हो, बढ़ने का मौका मिल जाता है।

यदि आप बिना सोचे-समझे प्रणाली से छेड़-छाड़ करेंगे तो आप भविष्य की किसी अन्य विपदा के बीज बो रहे होंगे। नहीं, मुझे अपने इस ज्ञान से कोई खुशी नहीं होगी कि गोल कृमियों से होनेवाली तात्कालिक हानि को रासायनिक छिड़काव के जरिए कम कर दिया गया है।

फसल के कटने के तुरंत बाद खेतों में पुआल फैला देने से खरपतवार का अंकुरण बीच में ही रुक जाता है। अनाज के साथ ही भूमि आवरण के रूप में सफेद मेथी भी बो देने से खरपतवार को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। खरपतवार की समस्या से निपटने का प्रचलित तरीका मिट्टी को परिष्कृत करने का है, लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो मिट्टी के भीती गहरे बैठे हुए, वे बीज, जो वैसे अंकुरित नहीं हुए होते, सजग होकर अंकुरित हो उठते हैं। साथ ही तेजी से बढ़ने वाली किस्मों का इन परिस्थितियों में बढ़ने का बेहतर मौका मिल जाता है। अतः आप कह सकते हैं कि जो किसान जमीन की जुताई-गहराई करके खरपतवार को काबू में लाने का प्रयत्न करता है, वह वास्तव में अपने दुर्भाग्य से ही बीज बो रहा होता है।

‘नुकसान-देह’ कीट नियंत्रक


मेरे ख्याल में अब भी कुछ लोग ऐसे होंगे जो सोचते हैं कि यदि उन्होंने रसायनों का उपयोग नहीं किया तो उनके फलवृक्ष तथा फसलें, उनके देखते-देखते मुरझा जाएगी। जब कि सच्चाई यह है कि इन रसायनों का ‘उपयोग करके ही’ वे ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर देंगे कि उनके निराधार, भय साकार हो जाएंगे। हाल ही में जापान में लाल देवदार वृक्षों की छाल को घुन लगने से भारी क्षति पहुंची रही है। वन अधिकारी इन्हें काबू में लाने के लिए हेलिकाप्टरों के जरिए दवाओं का छिड़काव कर रहे हैं। मैं यह नहीं कहता कि अल्पविधि के लिए इसका सकारात्मक असर नहीं होगा। मगर मैं जानता हूं कि इस समस्या से निपटने के लिए एक और भी तरीका है।

आधुनिक शोधों के मुताबिक घुन का संक्रमण प्रत्यक्ष न होकर मध्यवर्ती गोल-कृमियों के बाद ही होता है। गोलकृमि तने में पैदा होकर, पोषक तत्वों व पानी के बहाव को रोकते हैं, और उसी से देवदार मुरझा कर सूख जाता है। बेशक, इसका असली कारण अब तक अज्ञात है। गोल कृमियों का पोषण वृक्ष के तने के भीतर लगी फफूंद से होता है। आखिर पेड़ के भीतर यह फफूंद इतनी ज्यादा कैसे फैल गई? क्या इस फफूंद का बढ़ना, गोल कृमियों के वहां आने के बाद शुरू हुआ? या गोल कृमि वहां इसलिए आए कि वहां फफूंद पहले से थी? यानी असली सपाल घूम-फिरकर यहीं आकर ठहरता है कि पहले क्या आया? गोल कृमि या फफूंद?

एक और भी ऐसा सूक्ष्म जीवाणु है, जिसके बारे में हम बहुत कम जानकारी रखते हैं, और जो हमेशा फफूंद के साथ ही आता है, और वह फफूंद के लिए जहर का काम भी करता है। हर कोण से प्रभावों और गलत प्रभावों का अध्ययन करने के बाद निश्चयपूर्वक केवल एक यही बात कही जा सकती है कि देवदार के वृक्ष असाधारण संख्या में सूखते जा रहे हैं।

लोग न तो यह जान सकते हैं कि देवदार की इस बीमारी का असली कारण क्या है, और न उन्हें यह पता है कि उनके ‘इलाज’ के अंतिम परिणाम क्या होंगे। यदि आप बिना सोचे-समझे प्रणाली से छेड़-छाड़ करेंगे तो आप भविष्य की किसी अन्य विपदा के बीज बो रहे होंगे। नहीं, मुझे अपने इस ज्ञान से कोई खुशी नहीं होगी कि गोल कृमियों से होनेवाली तात्कालिक हानि को रासायनिक छिड़काव के जरिए कम कर दिया गया है। इस तरह की समस्याओं को, कृषि रसायनों का उपयोग करते हुए हल करने का यह तरीका बहुत ही अनगढ़ हैं इससे भविष्य में समस्याएं और भी विकट रूप ले लेंगी।

प्राकृतिक कृषि के ये चार सिद्धांत (हल नहीं, जुताई-निंदाई नहीं, कोई रासायनिक उर्वरक या तैयार की हुई खाद नहीं, हल द्वारा या शाकनाशियों द्वारा कोई निंदाई, गुड़ाई नहीं तथा रसायनों पर कोई निर्भरता नहीं।) प्रकृति के आदेशों का पालन करते हैं। तथा प्रकृति के संपदाओं को पूरा करने की राह बतलाते हैं। मेरी सारी अटकलें इसी एक विचारधारा के साथ चलती हैं। अनाज, सब्जियां और संतरे उगाने की मेरी विधि का सार यही है।

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