पानी के साधनों पर दबंगों के कब्जे से आम लोग परेशान

Submitted by Hindi on Mon, 05/23/2011 - 13:58
Source
जनसत्ता, 23 मई 2011

इन तालाबों का सुध न लेकर मॉडल तालाबों का निर्माण कराकर करोड़ों रुपए फूंके, लेकिन एक भी मॉडल तालाब में पानी नहीं है। तालाबों में भरी गाद जो किसान तालाबों से निकालकर खेतों में डालने की हिम्मत करता है तो सिंचाई विभाग खनन के नाम पर किसानों को जेल पहुंचाने की धमकी देता है।

महोबा, 21 मई। बुंदेलखंड के सभी जिलों में चार दशक पहले 21 हजार तालाब व 60 हजार कुएं थे। आज प्रशासनिक और भू-माफियाओं के गठजोड़ से पिछले एक दशक में करीब 2 हजार तालाबों और 10 हजार से अधिक प्राचीन संस्कृति की जल धरोहरें जमींदोज हो गईं। बुंदेलखंड में आज से नहीं 12 सौ साल पहले चंदेल शासकों ने पूरे क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए विशाल जलाशयों व कुओं का निर्माण कराकर जल संचित करके जल संकट रोका जाता रहा है। परंतु आज इन प्राचीन जल संसाधनों की उपेक्षा कर, मॉडल तालाबों के नाम पर करोड़ों की डकार रहे हैं जिसके कारण समूचे बुंदेलखंड में प्रति वर्ष-भूगर्भ का जल स्तर 50 सेंटीमीटर से 80 सेंटीमीटर तक की गिरावट आ रही है। हैंडपंप ही एक मात्र सहारा बचे हैं जो अधिकांश सूखे पड़े हैं, पानी के लिए मारकाट, दबंगों का हैंडपंपों पर कब्जा, पानी के लिए लगा पहरा, सभी 15 बांधों का पानी डेड-लेबिल को पार कर गया, पीने के पानी को लेकर प्रशासनिक लापरवाही के कारण स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। जिस कारण ग्रामीण क्षेत्रों से तेजी से पलायन भी बढ़ रहा है।

पर्यावरणविद् पुष्पेंद्र भाई कहते हैं कि बुंदेलखंड में तालाब व कूप संस्कृति रही है वर्षा के पानी को संचित कर यहां के जल संकट को रोकने का कार्य चंदेल शासकों ने 1200 वर्ष पूर्व किया था। तालाबों और कुओं के संरक्षण से जल स्तर गिरने की समस्या नहीं होती था। तालाबों-कुओं में पानी भरा रहने के कारण जंगल-पहाड़ों से भी जल स्तर बनाए रखने में मदद करते थे। साथ ही तालाबों-कुओं की खुदाई कराना और संरक्षण धार्मिक परंपराओं से जुड़ा था पिछले दो दशकों से आबादी बढ़ने के कारण तालाब व कुओं की संस्कृति पर ऐसा किया गया, भू-माफियाओं और राजस्व अधिकारियों के गठजोड़ ने तालाबों और कुओं को जमींदोज करके भवन निर्माण कराकर इनका वजूद ही समाप्त कर दिया। उच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी केवल कागजों पर कार्यवाही कर रही है। जो बेमतलब साबित हो रहे हैं।

बुंदेलखंड में पिछले कई वर्षों के सूखे ने किसानों की कमर तोड़ दी है। किसान पूरी तरह से प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर हैं, सरकार ने लघु सिंचाई, वनीकरण भूमि विकास एवं जल संसाधन कई योजनाएं चलाकर करोड़ों रुपयों को फूंकने का कार्य किया, लेकिन किसानों का कोई हित नहीं हुआ। अच्छी खेती की आशा में किसानों ने बैंकों से कर्ज लिया, लेकिन कर्ज-मर्ज के चक्कर में दर्जनों किसानों मे मौत को गले लगाया है। कर्ज में दर्जनों परिवारों के चिराग बुझ गए। महोबा जिले के 90 फीसद किसान कर्ज के शिकार हैं, रकम अदा न होने के कारण किसानों को आरसी जारी, स्थिति बद से बदतर, भारतीय स्टेट बैंक महोबा के प्रबंधक का कहना है कि कर्ज वसूली पर बैंकों के नए निर्देशों में परिवर्तन व्यावसायिक दृष्टिकोण के चलते हुआ है। बैंकों ने किसानों को डिफाल्टर घोषित कर आरसी जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। किसान पृथ्वी सिंह, महेंद्र, गौतम एवं अशोक-राजाराम पाटकार का कहना है कि बुंदेलखंड के किसान बैंकों व बड़े साहूकारों के खौफ के कारण सहमें हैं। किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं को करीब से देखा है, कई बार तो एक वक्त का चूल्हा नहीं जलता है। पिछले कई वर्षों के अकाल के कारण किसान आर्थिक रूप से टूट चुका है। बेटा-बेटियों की शादी व मर्ज के लिए कर्ज लेना मजबूरी हो गई है। खेतों में बीज व मेहनत के बाद परिणाम शून्य सिंचाई संसाधन –ट्यूबवेल-कुआं, खोदने-कृषि यंत्रों का कर्ज मुमकिन नहीं, बैंकों में किसानों के क्रेडिट कार्डों में कमीशन, बिना बिचौलियों के कर्ज नहीं मिलता, इसमें काफी समय व धन कमीशन के रूप में खर्च होता है ऐसे में पलायन के सिवा कोई रास्ता ही नहीं बचता, पल्स पोलियो अभियान में बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में 71 प्रतिशत घरों में ताले लटके मिले। यह आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग के पास मौजूद है।

सांसद विजय बहादुर सिंह ने जनसमस्या निवारण शिविर में ग्राम प्रधानों ने अफसरों से तरजीह न मिलने का रोना रोया, शिकायतें और समस्याओं का निस्तारण आदि के मामलों में प्रशासनिक लापरवाही और ग्राम प्रधानों ने मनरेगा में एसडीएम तथा अन्य योजनाओं के संचालन में अफसरों की मनमानी पर रोक की मांग उठाई।

श्रीनगर के वयोवृद्ध स्वामी प्रसाद पाटकार बताते हैं कि गांवों व शहरों के असरदार लोग जमीन पर कब्जा करने के इरादे से तालाबों को सुखाते हैं, भू-माफियाओं ने कुओं व तालाबों में कचरा भरकर समाप्त करने का कार्य किया है। न भरेगा पानी-न रहेगा तालाब, तालाबों और कुओं की सफाई और गहरे करने का काम ज्यादा खर्चीला नहीं है लेकिन इन तालाबों का सुध न लेकर मॉडल तालाबों का निर्माण कराकर करोड़ों रुपए फूंके, लेकिन एक भी मॉडल तालाब में पानी नहीं है। तालाबों में भरी गाद जो किसान तालाबों से निकालकर खेतों में डालने की हिम्मत करता है तो सिंचाई विभाग खनन के नाम पर किसानों को जेल पहुंचाने की धमकी देता है। और खनन विभाग खुलेआम नदियों-पहाड़ों व जंगलों को समाप्त करने के लिए परमिट जारी कर रहा है। अभी भी वक्त है चेतने की जिसके कारण बुंदेलखंड की तालाब व कूप संस्कृति खतरे में है।

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