नदियों पर संकट

Submitted by Hindi on Mon, 05/23/2011 - 16:13
Source
जनसत्ता रविवारी, 22 मई 2011

उत्तरी चीन की पीली नदी, भारत की गंगा नदी, पश्चिम अफ्रीका की नाइजर, संयुक्त राज्य अमेरिका की कोलोराडो घनी आबादी वाले इलाकों की प्रमुख नदियां हैं, जिनके प्रवाह में गिरावट आई है।

देश में पानी की स्थिति कमोबेश ऐसी हो गई है कि हर साल पानी को लेकर कुछ राज्यों में हाहाकार मच जाता है। कुछ राज्यों के शहरी क्षेत्रों में तो स्थिति खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है। ठंड के एक-दो महीने छोड़ दिए जाएं तो शहरी क्षेत्रों में टैंकरों और सार्वजनिक पानी के नलों के आसपास बर्तनों की भीड़ के बीच अपना नंबर आने की आशा में महिलाओं और बच्चों का मजमा लगना आम हो गया है। पानी को लेकर मारपीट तो आम बात है। लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब एक बाल्टी पानी के लिए आंखों से पानी आ जाए तो बड़ी बात नहीं होगी। जिस तरह से साल-दर-साल पानी की समस्या का सामना हम कर रहे हैं, उससे यह बात निश्चित है कि सब को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे, नहीं तो हर पानी की बूंद पैसा मांगेगी और स्थिति यह भी हो सकती है कि भले ही हमारी जेब में पैसा तो हो लेकिन पीने के लिए पानी नहीं मिलेगा।

देश का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा भू-गर्भ जलसंकट की चपेट में है। देश के कुल 5,723 खंडों में से 839 अत्यधिक भूगर्भ जल के दोहन के कारण निराशाजनक भूकटिबंधों में चले गए हैं। जबकि 226 की स्थिति संकटपूर्ण और 550 अर्ध संकटपूर्ण हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु गंभीर रूप से इस संकट का सामना कर रहे हैं। जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और केरल भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्रों की स्थिति और गंभीर है। दिल्ली के नौ खंडों में से सात भूगर्भ जल के अत्याधिक दोहन के कारण जल स्तर बहुत नीचे चला गया है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी यह समस्या अब सामने आ रही है। आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब की स्थिति भयावह है, जहां 137 खंडों में से 103 में जल स्तर बहुत ही नीचे गिर गया है।

हरियाणा के 113 खंडों में से पचपन की हालत भी निराशाजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के 237 खंडों में से एक सौ चालीस, आंध्रप्रदेश में 219, तमिलनाडु के 385 खंडों में से 142 में जलस्तर काफी नीचे पहुंच गया है। और स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी भूगर्भ जल संकट की समस्या है। उत्तराखंड की स्थिति थोड़ी बेहतर कही जा सकती है। यहां दो खंड निराशाजनक और तीन अर्ध संकटपूर्ण भू-कटिबंधों में हैं। पश्चिम बंगाल में यह समस्या शुरू हुई है। यहां के 269 खंडों में से एक संकटपूर्ण भू-कटिबंधों में हैं। गुजरात के 223 खंडों में से एकत्तिस निराशाजनक भू-कटिबंधों में आ गए हैं, जबकि बारह संकटपूर्ण और उनहत्तर अर्ध संकटपूर्ण भूकटिबंधों में हैं। केरल के 151 खंडों में से पांच निराशाजनक भू-कटिबंधों में है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, उड़ीसा और बिहार में भूगर्भ जल संकट की समस्या नहीं है। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में भी भूगर्भ जल का संकट नहीं है।

वैश्विक स्तर पर हुए एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले कुछ क्षेत्रों में नदियों में पानी कम हो रहा है। अमेरिका के नेशनल सेंटर फार एटमॉस्फेयरिक रिसर्च के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन के मुताबिक कई मामलों में प्रवाह के कम होने की वजह जलवायु परिवर्तन है। 1948 से 2004 के बीच धाराओं के प्रवाह की जांच के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि दुनिया की एक तिहाई बड़ी नदियों के जल प्रवाह में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं।

इस दौरान अगर किसी एक नदी का प्रवाह बढ़ा है तो उसके अनुपात में 2.5 नदियों के प्रवाह में कमी आई है। उत्तरी चीन की पीली नदी, भारत की गंगा नदी, पश्चिम अफ्रीका की नाइजर, संयुक्त राज्य अमेरिका की कोलोराडो बड़ी आबादी वाले इलाकों की प्रमुख नदियां हैं, जिनके प्रवाह में गिरावट आई है। इसके विपरीत आर्कटिक महासागर जैसे कम आबादी वाले इलाकों में अधिक धारा प्रवाह की रिपोर्ट है, जहां बर्फ तेजी से पिघल रही है। संस्था के वैज्ञानिक और प्रमुख लेखक अगुई दाई कहते हैं कि नदियों में प्रवाह के घटने से शुद्ध जल के संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। खासतौर पर उन इलाकों में जहां जनसंख्या बढ़ने के कारण पानी की अधिक मांग है। स्वच्छ जल एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है, लिहाजा इसमें कमी एक बड़ी चिंता का विषय है।

दुनिया का प्रमुख नदियों पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के बारे में वैज्ञानिकों का रुख अस्पष्ट है। प्रमुख नदियों के व्यापक विश्लेषणों से संकेत मिले थे कि वैश्विक धारा प्रवाह में इजाफा हो रहा है। दाई और उसके सह लेखकों ने दुनिया की 925 बड़ी नदियों के प्रवाह का विश्लेषण किया। इस दौरान उन्होंने कंप्यूटर के साथ-साथ धारा प्रवाह की वास्तविक माप का सहारा लिया है।

इस अध्ययन से यह नतीजा निकला है कि 1948 से 2004 के बीच प्रशांत महासागर में गिरने वाले नदियों के जल की वार्षिक मात्रा में छह फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। यह 526 क्यूबिक किलोमीटर मिसीसिपी नदी से हर साल मिलने वाले पानी की मात्रा के बराबर है। हिंद महासागर के वार्षिक निक्षेप में तीन फीसद या 140 क्यूबिक किलोमीटर की गिरावट है।

इसके विपरीत आर्कटिक महासागर के वार्षिक निक्षेप में दस फीसद या 460 क्यूबिक किलोमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। संयुक्त राज्य अमेरिका की कोलंबिया नदी के प्रवाह में 1948-2004 के अध्ययन अवधि के दौरान चौदह फीसद की गिरावट आई। ऐसा मुख्यतः पानी के अत्यधिक उपयोग की वजह से हुआ।

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने भूगर्भ जल के प्रबंधन, विकास और नियंत्रण को लेकर राज्यों की एक आदर्श विधेयक का मसौदा भेजा था। इस आधार पर आंध्र, बिहार, छत्तीसगढ़, चंडीगढ़, दादर-नगर हवेली, गोआ, हिमाचल प्रदेश, केरल लक्ष्यद्वीप, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने कानून भी बनाए हैं। देश में वर्षा जल के संरक्षण और भूगर्भ जल के पुनर्भरण करने की नई तकनीक को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

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