सांसों में घुलती मौत

Submitted by Hindi on Mon, 05/30/2011 - 10:47
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जनसत्ता रविवारी, 29 मई 2011
देश के कई हिस्सों में बड़ी तादाद में लोग सिलिकोसिस से पीड़ित हैं। पत्थरों की खदानों और कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को यह बीमारी धीरे-धीरे मौत की तरफ ले जाती है। लेकिन इससे बचाव के लिए न तो सरकार ने कोई कदम उठाया है और न ही मालिकों को इसकी चिंता है। इस बीमारी के कारणों और मजदूरों की बेबसी का जिक्र कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले में है उंडली गांव। इस गांव की गलियों में एक खौफ पसरा है। खौफ एक अंजान बीमारी का है। कैलाश की उम्र यों तो बीस साल है, लेकिन वह अपनी उम्र से बहुत ज्यादा दिखाई देता है, किसी बुजुर्ग की तरह। इसी गांव की सन्नो एक-एक दिन करके अपनी मौत का इंतजार कर रही है। वह न ठीक से उठ-बैठ सकती है, न खा-पी सकती है। एक टूटी सी टपरी में खाट पर पड़े-पड़े उसकी जिंदगी दुश्वार हो गई है। एक लाइलाज बीमारी ने पूरे गांव को अपनी चपेट में ले रखा है। गांव वाले उस दिन को कोसते हैं जब काम की तलाश में अनजाने में ही उन्होंने इस बीमारी की तरफ कदम बढ़ा डाले थे। यह बीमारी है सिलिकोसिस, जिसने इस इलाके में अपने पांव पसार रखे हैं।

हाड़तोड़ मेहनत के बाद मजदूरी नहीं मौत मिले तो इसे जिंदगी का अभिशाप ही कहा जा सकता है। सवाल यह भी है कि जिंदगी को दांव पर लगा कर कौन काम करना चाहेगा। लेकिन मजबूरी ऐसी मजदूरी कराने के लिए आमादा है। इसका खमियाजा भी सैकड़ों जानें भुगत चुकी हैं। कुछ को पता है, लेकिन बहुतों को यह तक पता नहीं कि उनका शरीर अचानक ही क्यों निढाल होने लगता है। क्यों एक किलोमीटर की पैदल दूरी कोसों दूर लगने लगती है और आखिर क्यों थोड़ा-सा बोझ अचानक पहाड़-सा लगने लगता है।

पश्चिमी मध्यप्रदेश में यह खूनी इबारत लिख रही है सिलिकोसिस नाम की बीमारी। सिलिकोसिस सिलिका पत्थर से उपजी एक बीमारी है। इस पत्थर का उपयोग मुख्यत: घड़ी के क्वाटर्ज व कांच बनाने और इसके पाउडर का उपयोग साबुन बनाने के काम में लाया जाता है। इस तरह के पत्थर की खदानें गुजरात के खेड़ा और गोधरा जिले में बहुतायत से हैं। जाहिर है पत्थर को काम के लायक बनाने के ज्यादातर कारखाने भी इसी इलाके में हैं।

गोधरा और बालासिमोर जिले में तकरीबन दो सौ से ज्यादा कारखानों में असंगठित क्षेत्र के सैकड़ों लोग काम कर रहे हैं। यहां काम कर रहे मजदूरों में से ज्यादातर का ताल्लुक मध्यप्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर और धार जिले से है। इनमें काम करने वालों को इस बात का इल्म भी नहीं है कि इन कारखानों में काम करने का मतलब मौत को बुलावा देना है। गुजरात के स्थानीय मजदूरों ने इन खदानों में काम करने से मना कर दिया है। इसलिए कारखानों के मालिकों ने अब मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले के झाबुआअलीराजपुर से मजदूरों को बुला कर काम पर रखना शुरू किया है। मालिकों के लिए यह लक्ष्य आसान भी है क्योंकि इस इलाके में गरीबी ने अपनी जड़ें जमा रखी हैं और लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट है। परंपरागत हकों से महरूम होने के बाद कोई काम न मिलने पर यहां से बड़ी संख्या में आदिवासी पलायन कर रहे हैं। यह पलायन पिछले पांच-छह साल से जारी है। इस पलायन की एक भयावह तस्वीर सिलिकोसिस के रूप में सामने आ रही है।

2005 में जब इन तीन जिलों में सूखे की मार पड़ी तो स्थानीय स्तर पर रोजी-रोटी के लाले पड़ गए। रोटी-रोजी की तलाश में ज्यादातर लोगों ने अपना घर-बार छोड़ कर परदेस का का रुख किया। इनमें से कुछ लोग सूरत और वडोडरा की कपड़ा बनाने वाली मिलों में मजदूरी करने लगे तो कुछ ने गुजरात के दूसरे शहरों में अपना डेरा जमाया। इनमें से ही कुछ लोगों ने गोधरा और बालासिमोर जिले के इन खूनी कारखानों में अनजाने ही कदम रखा। लोग गए तो थे मजदूरी की चाह में लेकिन उनहें मालूम नहीं था कि जिस रास्ते पर वे जा रहे हैं वह रास्ता मौत की तरफ जाता है, जिंदगी की तरफ नहीं।

गोधरा में पत्थर को पाउडर में तब्दील कर देने वाले इन कारखानों में बेहद खतरनाक ढंग से काम होता है। मालिकों का दावा है कि कारखाने पूरी तरह मशीनीकृत हैं और यहां बिना मानव श्रम के काम होते हैं। एक कारखाने में केवल दो मजदूरों से काम चल जाता है। लेकिन इन कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की मानें तो स्थिति इसके ठीक उलट है। यहां मजदूरों को एक किस्म के बंधन में रखा जाता है और किसी भी तरह का निरीक्षण होने पर इन्हें पिछले दरवाजे से कुछ समय के लिए खदेड़ दिया जाता है। इन मजदूरों को कारखानों में काम करने के दौरान हफ्ते में सिर्फ एक दिन बाहर जाने की अनुमति मिलती है। अनुमति के बाद भी कंपनी का कोई आदमी इनके साथ लगा जरूर होता है। कहने को तो इन कारखानों के बाहर सूचना पटल पर मास्क पहने जाने की सूचना लगी होती है, लेकिन कारखाने के अंदर इस पर अमल नहीं किया जाता। कारखाने के अंदर नाक पर सामान्य रूमाल बांध कर ही मजदूर काम करते हैं। गोधरा के कारखानों में मजदूर बिना किसी मास्क के काम करते हुए दिखाई देते हैं। न तो चेहरे पर मास्क और न ही हादसों से बचने के लिए दूसरी तरह की सावधानी यहां बरती जाती है। मजदूरों की जान से खिलवाड़ दूसरी कंपनियां भी करती रहती हैं। हालात हर जगह एक जैसे हैं और सुरक्षा इंतजामों से खिलवाड़ करने में कोई किसी से कम नहीं है। यहां काम करने वाले मजदूरों से बात करें तो उन्हें इस बात का जर्रा बराबर आभास नहीं है कि वे तिल-तिल कर मर रहे हैं और उनकी सांसों में धीरे-धीरे मौत घुल रही है। इस कंपनी में काम करने वाले बीस साल के दीवान सिंह ने बताया कि वह हाल ही में इस कंपनी में आया है। गांव में कोई काम नहीं मिला इसलिए उसे यहां आना पड़ा। उसे नहीं पता कि यहां काम करने से कोई बीमारी भी होती है।

जब कभी कोई जांच दल, अधिकारी या मीडिया से जुड़े लोग मजदूरों के हालात को देखने आते हैं तो मजदूरों को या तो छिपा दिया जाता है या पिछले दरवाजे से उन्हें कारखाने से बाहर कर दिया जाता है।

सिर्फ दीवान सिंह ही इस बात से लाइल्म नहीं है कि यहां मजदूरी करने से एक लाइलाजबीमारी सांसों के जरिए उसके फेफड़ों में उतर रही है, दूसरे मजदूरों की स्थिति भी कमबोश ऐसी ही है। तकरीबन चार साल पहले अलीराजपुर, झाबुआ और धार जिले के सैकड़ों मजदूर परिवार सहित इस इलाके में काम करने आए थे। साल-डेढ़ साल पहले जब वे घर लौटे तो एक अनजानी बीमारी को साथ लेकर। गांव में कई लोग एक साथ बीमार हो गए। लगातार कमजोर होते जाना, रह-रह कर खांसी आने की शिकायत ने लोगों को परेशान कर डाला। लोगों ने डॉक्टरों को दिखाया। डॉक्टरों ने समझा कि टीबी है। उन्होंने टीबी का ही लंबे समय तक इलाज किया। लेकिन सारे इलाज धरे रह जाते। बीमारी से छुटकारा तो मिलता, लेकिन मौत के बाद। कई लोगों की मौत के बाद इस रहस्यमयी बीमारी से परदा उठने की कहानी भी काफी डराने वाली है। मोहन का जब अंतिम संस्कार किया गया तो लोगों ने पाया कि मृत शरीर का एक खास हिस्सा आग में भी जल नहीं पा रहा है। लोगों ने जब ऐसे एक-दो लोगों के उस खास हिस्से का निरीक्षण किया तो पाया कि यह फेफड़े में जमा एक किस्म का पाउडर है। इस पाउडर को फैला कर गौर से देखने पर पाया कि यह तो वही पाउडर है जो गोधरा और बालासिमोर जिले के उन कारखानों में दिन-रात उड़ा करता है, तब बात लोगों की समझ में आई और बामारी भी।

इ स इलाके में सिलिकोसिस मामले की पड़ताल करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता जीडी वर्मा बताते हैं कि 2004-05 के बाद जब बाईस गांवों का समुदाय आधारित सर्वे किया गया तो करीब पांच सौ लोग सिलिकोसिस से पीड़ित पाए गए। यह एक बड़ा आंकड़ा था। उसके बाद तो इस पूरे इलाके में एक के बाद एक कई मामले सामने आने लगे। आज हालत यह है कि इन तीनों जिले के नौ प्रखंड सिलिकोसिस से प्रभावित हैं। यह रिपोर्ट किसी गैरसरकारी संस्था के नहीं, बल्कि सरकार की है। सरकार की ओर से लगाए गए कैंपों में ही यह बात सामने आई थी और मरीजों की तादाद का पता भी चला था।

उंडली गांव के बीस साल के युवक कैलाश की आंखें अंदर तक धंस गई हैं, उसके पता की मौत हो चुकी है। बहन बीमार है। उससे बोझ उठाते नहीं बनता। शरीर में दर्द रहता है। रह-रह कर सांस तेज चलने लगती है। गांव में ऐसे कई और युवक हैं जो असमय ही बूढ़े हो गए हैं। उंडली गांव की गामा और उसके पिता बुधा दोनों को ही सिलिकोसिस है। बुधा बताते हैं कि दोनों के इलाज पर ही अब तक अस्सी हजार रुपए खर्च हो चुके हैं। डॉक्टर टीबी समझकर इलाज करते रहे। पर कोई फायदा नहीं हुआ। बीमारी तो कुछ और ही निकली। घर की सब जमा-पूंजी इलाज में ही चली गई। इस बीमारी ने तो हमें बर्बाद ही कर दिया।

हालांकि गांव वाले अब इस बात को समझ चुके हैं और गोधरा के इन कारखानों में जाने से तौबा कर ली है। उंडली गांव की सरपंच शर्मिला और उनके पति केसर सिंह ने तय किया है कि वे गांव से एक भी आदमी को बाहर काम पर नहीं जाने देंगे। इसके लिए उन्होंने रोजगार गारंटी योजना के तहत गांव में ही कई परियोजनाओं पर काम शुरू करवाया है ताकि लोगों को रोजी मिले और वे घरबार छोड़ कर मौत को गले लगाने के लिए बाहर मजदूरी करने न जाएं।

गोधरा से तकरीबन चालीस किलोमीटर दूर बसा है खड़गोधरा। खड़गोधरा खास इसलिए है, क्योंकि यहां सरदार सरोवर बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले लगभग चालीस परिवारों को बसाया गया है। ये सभी मध्यप्रदेश के ककराना गांव में बसते थे। यहां पर गुजरात सरकार ने इनके पुनर्वास का इंतजाम तो कर दिया, लेकिन आजीविका के लिए कोई व्यवस्था नहीं की। खड़गोधरा के देवसिंह कहते हैं कि यहां हमें पांच-छह दिन ही काम मिला।

हमारे साथ के कई लोग यह जानते हुए भी कि काम करने से बीमारी होगी, उन कारखानों में काम करने के लिए मजबूर हैं। खड़गोधरा के स्थानीय निवासी जाबिर खान बताते हैं कि इन कारखानों में गुजरात का कोई भी मजदूर काम करने नहीं जाता, क्योंकि उन्हें पता है कि यहां काम करने का मतलब बीमार होना है। कई साल से बीमारियां देने वाले इन कारखानों की असलियत यहां के मजदूर तो जान गए हैं, लेकिन झाबुआ, अलीराजपुर में भयंकर बेरोजगारी झेल रहे आदिवासी इससे अनजान हैं। बालासिमोर स्थित रॉयल मिनरल्स कारखाने में बच्छया, हेमा, रेशमा, रेलसिंह अपने परिवार के साथ मजदूरी करते मिले। सरदार सरोवर बांध की वजह से इन्हें परिवार सहित उजाड़ डाला गया। कारखाने में काम करते हुए जब इनकी तस्वीरें उतारने की कोशिश की तो प्रबंधन ने ऐसा करने से रोक दिया और मजदूरों को परिसर से बाहर भेज दिया। प्रबंधन का कहना था कि यह तो दिहाड़ी मजदूर हैं, जब हमें पत्थरों से भरी ट्रॉली खाली करवानी होती है, तब इन्हें काम के लिए बुलाया जाता है। कुंडली गांव में लोगों की बताई बातें सच साबित हो रही थीं।सिलिकोसिस प्रभावित मजदूरों ने बताया था कि जब भी कभी कोई जांच दल, अधिकारी या मीडिया वाले मजदूरों के हालात को देखने आते हैं तो मजदूरों को या तो छिपा दिया जाता है या पिछले दरवाजे से उन्हें कारखाने से बाहर कर दिया जाता है। बहरहाल, बेहद असुरक्षित माहौल में काम करने वाले इन मजदूरों को कारखाना प्रबंधन जब अपना कर्मचारी मानने से ही इनकार कर रहा हो तो समझा जा सकता है कि मजदूरों के स्वास्थ्य परीक्षण और श्रमिकों को मिलने वाली दूसरी सुविधाओं की क्या स्थिति होगी।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने गुजरात और मध्यप्रदेश सरकार को बीते साल बारह नवंबर को आदेश देकर कहा था कि सिलिकोसिस से मृत व प्रभावित व्यक्ति और उनके परिवार को मुआवजा दिया जाए और इनका पुनर्वास किया जाए। इस बीमारी से इन गावों में अब तक करीब दो सौ अड़तीस लोगों की मौत हो चुकी है। मरने वालों के वारिस को तीन लाख रुपए के हिसाब से मुआवजा देने का आदेश गुजरात सरकार को दिया गया था। मध्यप्रदेश सरकार को तीन सौ चार पीड़ित परिवार के लिए पुनर्वास योजना प्रस्तुत करने को कहा गया था। इस आदेश का पालन आठ हफ्ते में करना था।

यह निर्णय विभिन्न संस्था व संगठन के सहयोग से शिकायतकर्ता जुवान सिंह की शिकायत और शिल्पी केंद्र द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के संदर्भ में किया गया था। इस रिपोर्ट में इस तथ्य को रेखांकित किया गया था कि अलीराजपुर जिले के बाईस गांव में कुल चार सौ नवासी लोग सिलिकोसिस से पीड़ित हैं। इनमें से करीब डेढ़ सौ लोगों की मौत बाद में हो गई।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने जांच दल गठित कर इसका जायजा लिया। आयोग ने शिकायत को सही पाया। राज्य सरकार ने भी शिकायत के आधार पर कार्रवाई करते हुए मृत दो सौ अड़तीस और तीन सौ चार प्रभावित लोगों की सूची राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को सौंपी। चार साल चली जांच के बाद गुजरात सरकार ने कारखाना मालिकों के खिलाफ फौजदारी मुकदमा दायर किया।

इस रिपोर्ट को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, विभिन्न सरकारी अधिकारी, मंत्री और जन प्रतिनिधियों को सौंपा गया। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने सक्रिय पहल करते हुए संबंधित सरकार व विभाग से जवाब मांगा। आयोग को कई व्यक्तिगत और संस्थागत शिकायत भी दी गई और करीब चार साल तक मामला चला। सर्वोच्च न्यायालय में इसे लेकर जनहित याचिका भी दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस याचिका को गंभीरता से लिया और मृत व प्रभावित लोगों के परिवार वालों को मुआवजा देने और उनके पुनर्वास का आदेश दिया। अदालत ने आयोग को इस संबंध में कार्रवाई करने को भी कहा।

मानव अधिकार आयोग के सदस्य पीसी शर्मा, अधिकारी सीके त्यागी व वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारीख ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्थानीय संस्था व संगठन के लिए चुनौती यह थी कि उनके पास रिकार्ड उपलब्ध नहीं थे जहां इन्होंने काम किया था, क्योंकि अब तक सिर्फ संगठित कामगारों के लिए ही (राज्य बीमा निगम)द्वारा मुआवजा दिया जाता रहा है। यह पहली बार हुआ जब समुदाय आधारित सर्वेक्षण के माध्यम से प्रभावितों की चिकित्सकीय जांच हुई और केंद्रीय श्रम संस्थान ने इस बीमारी की पुष्टि की।

राज्य सरकार को लगातार रिपोर्ट और जमीनी हकीकतों से अवगत कराने के बावजूद कुछ गिने-चुने लोगों को पांच सौ रुपए चिकित्सकीय जांच व दस हजार रुपए राष्ट्रीय परिवार सदस्यता योजना के तहत दिया गया है। सिलिकोसिस प्रभावित परिवारों के जीवन की गाड़ी पटरी से पूरी तरह उतर चुकी है। उनके बच्चों का भविष्य अंधकारमय है। उन्हें बेहतर और निरंतर आजीविका के साथ अपने परिवार को बेहतर और सम्मानजनक जिंदगी के लिए एक बड़ी सहायता की जरूरत है।

हैरत की बात यह है कि गुजरात और मध्यप्रदेश सरकार दोनों ही मुआवजा और पुनर्वास के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करती नजर नहीं आ रही हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अमूल्य निधि बताती हैं कि गुजरात सरकार की ओर से मुआवजे के लिए कोई पहल नहीं हो रही है। मामला दो राज्यों के बीच अटका है, लेकिन लोगों की तकलीफ को समझते हुए उन्हें तुरंत मुआवजा दिए जाने की जरूरत है।

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