भौगोलीकरण का जवाब : कुटुम्बकम

Submitted by Hindi on Sat, 05/31/2008 - 12:36
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ग्रामस्वराज डॉट वर्डप्रेस डॉट कॉम

भौगोलीकरण का जवाब : कुटुम्बकमतमिलनाडु़ की राजधानी चेन्नई से करीब 40 किलोमीटर दूर बसा गाँव कुटुम्बकम पिछले 15 साल से ग्राम स्वराज के रास्ते पर चल रहा है। 15 साल पहले तक यहाँ हर वो बुराई थी जो देश के किसी भी अन्य गाँव में देखी जा सकती है। शराब पीना, शराब पीकर घर में मारपीट, गाँव में आपस में झगड़े, छुआछूत, गन्दगी आदि आदि।

गाँव में 50 फीसदी आबादी दलितों की है लेकिन जातियों के बँटवारे इतने गहरे थे कि नीची कही जाने वाली जातियों को कुछ रास्तों पर आने, कुओं से पानी लेने आदि तक की अनुमति नहीं थी। और इन सबके चलते एक बर्बाद गाँव। हर तरफ बेरोजगारी और गरीबी की मार। लेकिन आज इस गाँव में आपस के झगड़े लगभग मिट गए हैं।

जातियों की दीवारें अब काफी छोटी हो गई हैं। गाँव में नए बने घरों में अब वही परिवार एकदम पड़ोस में रह रहे हैं जो कल तक नीची और ऊँची जाति के झगड़े में उलझे थे। यहाँ तक कि गाँव में अन्तर-जातीय विवाह भी हुए हैं। शराब पीकर घर में मारपीट करने का चलन अब थम चुका है…

सवाल ये उठता है कि ये हुआ कैसे? प्रथम दृष्टीय इसका श्रेय गाँव के पूर्व सरपंच इलांगो रंगास्वामी को दिया जा सकता है। और यह गलत भी नहीं है। इलांगो एक सफल वैज्ञानिक थे लेकिन 1996 में अच्छी खासी नौकरी छोड़कर अपने गाँव में पंचायत का चुनाव लड़े और जीत भी गए। 15 साल पहले के कुटुम्बकम गाँव का आज के कुटुम्बकम में परिवर्तन यहीं से शुरू होता है।

लेकिन अगर इसे गाँव के एक होनहार नौजवान के व्यक्तित्व का चमत्कार और उसकी ऊँची पढ़ाई लिखाई को इसका आधार मानकर छोड़ दिया जाये तो शायद इलांगो के 15 साल व्यर्थ हो जाएँगे। और देश के हर गाँव में लोग यही दुआ करते रह जाएँगे कि ‘काश! कोई इलांगो जैसा होनहार हमारे गाँव में भी पैदा हो जाये।’ तो कुटुम्बकम में आये बदलाव को हमें किसी व्यक्ति से ऊपर उठकर इस रूप में समझना पड़ेगा कि यहाँ क्या-क्या हुआ और कैसे हुआ?

शुरुआत तो 1996 में इलांगो के सरपंच बनने से हुई। इलांगो एक दलित परिवार से हैं और बचपन में गाँव में झेले भेदभाव ने उनके मन में गहरा असर छोड़ा था। वे अपने गाँव एक सपना लेकर आये थे। लेकिन एक ऐसे गाँव में जहाँ जात-पात, शराब, गरीबी, बेरोजगारी जैसी बीमारियों ने लोगों को हर तरह से तोड़ कर रखा हो, वहाँ लोगों को विकास का सपना दिखाना मुश्किल काम है। फिर भी – इलांगो ने गाँव के ऊपर अपना सपना नहीं लादा।

गाँव वालों के साथ बैठकर चर्चा से शुरुआत की। इलांगो की ताकत थी कि उन्होंने पंचायत चुनाव जीतने के लिये न पैसा खर्च किया था न शराब बांटी थी। धीरे-धीरे लोग ग्राम सभा की बैठकों में आने के लिये प्रेरित हुए।

इलांगो ने गाँव के विकास के लिये एक पंचवर्षीय योजना बनाई और इस पर गाँव में जमकर चर्चा हुई। यह चर्चा एक बैठक तक सीमित नहीं थी बल्कि वार्ड स्तर पर भी इसके लिये बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में आये सुझावों के आधार पर पंचवर्षीय योजना में सुधार किये गए और इस पर काम शुरू हुआ। पंचायत के कामकाज में पूरी पारदर्शिता और हर काम के बारे में खुली बैठकों में चर्चा से लोग पंचायत के कामकाज में दिलचस्पी लेने लगे।
 

इलांगो रंगास्वामी


लोगों के रवैये के समानान्तर चुनौती थी अधिकारियों का रवैया। गाँव के सरकारी कर्मचारियों से लेकर जिले तक के अधिकारियों को गाँव के किसी काम से कमीशन नहीं मिला तो वे कुपित होने लगे। नतीजा था इलांगो को कागजों में घेरने की कोशिश की गई। उन पर पंचायत का काम योजना के हिसाब से न कराने के आरोप लगे। गौरतलब बात यह थी कि इलांगो इन सब मुद्दों पर ग्राम सभा की खुली बैठकों में चर्चा करते थे।

अधिकारियों को रिश्वत न खिलाने का परिणाम यह हुआ कि एक मामले में इलांगो को सस्पेंड कर दिया गया। मामला यह था के गाँव में एक नाली का निर्माण तय हुआ सरकार से इसके लिये 4 लाख 20 हजार रुपए का बजट मिला। गाँव वालों ने पास की एक फैक्ट्री से बचे ग्रेनाईट पत्थरों को इस्तेमाल कर यह काम मात्र 2 लाख 20 हजार रुपए में पूरा कर लिया।

जबकि सरकारी योजना के मुताबिक ये पत्थर पड़ोस के एक स्थान से मँगाए जाने थे। इससे सरकारी पैसा भी बचा और काम भी जल्दी हो गया। लेकिन अधिकारियों ने इसे भ्रष्टाचार माना और इलांगो को सस्पेंड कर दिया। यहाँ पर इलांगो का साथ दिया गाँधी के प्रयोगों ने। उन्होंने इसका शान्ति से विरोध किया। नतीजा मुख्यमंत्री के आदेश पर गाँव में ग्राम सभा की बैठक हुई और यहाँ 2000 लोगों की भीड़ ने इलांगो के पक्ष में वोट दिया। इसके बाद फिर से चुनाव हुए और इलांगो वापस अपने गाँव के सरपंच बन गए।

इस घटना के दौरान आई एकता ने गाँव में जातियों की दीवार को नीचा किया और तब एक और सामाजिक प्रयोग की ज़मीन तैयार हुई। मुख्यमंत्री से मिलकर इलांगो ने गरीब परिवारों के लिये एक ऐसी कॉलोनी बनाने का प्रस्ताव रखा जिसमें एक-एक घर दलित और गैर दलित परिवारों को एक-एक करके दिये जाएँगे। और यह कॉलोनी सफलतापूर्वक बन गई और आज लोग इसमें अभूतपूर्व मेल-मिलाप से रह रहे हैं।

ये मकान बेहद सस्ती तकनीक से, सौर ऊर्जा के उपयोग के हिसाब से बनाए गए हैं। लेकिन गाँव में बदलाव का एक सबसे उदाहरण है शराब की खपत में कमी। लोगों का शराब पीना और फिर पत्नी बच्चों के साथ मारपीट करना आम बात थी और शायद इस बुराई ने इलांगो गाँव लौटने के लिये सबसे ज्यादा प्रेरित किया था।

सरपंच बनने के बाद इलांगो ने इसके लिये पुलिस और मीडिया का सहारा तो लिया ही, नुक्कड़ नाटकों का इस्तेमाल भी किया। चेन्नई के लोयोला कॉलेज के छात्रों की नुक्कड़ नाटक की टीम ने गाँव में शराब के नुकसान पर कई नाटकों का मंचन किया। धीरे-धीरे कई साल की मेहनत से लोगों को लगा के वे गलत कर रहे हैं। और तब यह बुराई छूटी।

इसके अलावा, सड़कों का निर्माण, गरीबों के लिये घर, रोज़गार के अन्य सम्मानित विकल्प आदि ऐसे काम हैं जो अब इलांगो ही नहीं गाँव वालों का सपना बन गया है। और इस पर काम भी हो रहा है। गाँव में 60 फीसदी महिलाएँ पढ़ी-लिखी हैं। सारे बच्चे स्कूल जाते हैं इसलिये बाल-मजदूरी जैसी बुराईयों का खात्मा हुआ है। बीते 15 साल में और भी बहुत से ऐसे काम हैं जिनकी सफलता की सूची बनाई जा सकती है लेकिन अब इस गाँव के लोग इलांगो के साथ मिलकर एक और सपना देख रहे हैं। वह है आर्थिक आत्मनिर्भरता का सपना।

इस सपने का आधार है यह विश्वास कि 10-15 किलोमीटर क्षेत्र के इलाके के गाँवों में उस इलाके के अन्दर रहने वाले तमाम लोगों की जरूरतें पूरी हो सकती हैं। खाने पीने की जरूरतों से लेकर जीने के लिये जरूरी हर आवश्यकता तक। अब इलांगो और उनकी टीम लगी है इस सपने को साकार करने में। आखिर कुटुम्बकम को आत्मनिर्भर और स्वराज में जीता गाँव बनाने के लिये यह एक आवश्यकता जो है।
 

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