बीमारी का पानी

Submitted by Hindi on Tue, 05/31/2011 - 17:23
Source
जनसत्ता 12 अप्रैल 2011

अगर किसी व्यक्ति में इस तरह का बैक्टीरिया घर करता है तो न केवल उसका इलाज लगभग नामुमकिन हो सकता है, बल्कि दूसरों में संक्रमित होने पर वह और भी खतरनाक साबित होगा। इसके दुष्प्रभाव से जो दूसरी बीमारियाँ पैदा होती हैं, बाद में उनका इलाज बेहद जटिल हो जाता है।

हाल ही में ब्रितानी शोधकर्ताओं ने जब दिल्ली के पानी में ‘सुपरबग’ नामक जीवाणु होने की बात कही तो सरकार ने उसे सिरे से खारिज करते हुए नागरिकों को इससे बेफिक्ररहने को कहा। लेकिन अब एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘लांसेट’ ने जो कहा है अगर उसमें सच्चाई है तो निश्चय ही यह सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए काफी है।पत्रिका का कहना है कि दिल्ली की जलापूर्ति व्यवस्था में दवा से बेअसर बैक्टीरिया की मौजूदगी की हकीकत को सरकार दबाने में लगी है। गौरतलब है कि ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने अपने एक अध्ययन में कहा था कि दिल्ली के पानी में एनडीएम-1 यानी नई दिल्ली मेटैलो-बीटा-लैक्टामेज नामक सुपरबग या ऐसे जीवाणु हैं जिन पर ज्यादातर एंटीबायोटिक दवाओं का कोई असर नहीं होता।

यह निष्कर्ष कितना प्रामाणिक है, इसकी जांच होनी चाहिए, क्योंकि इसके चलते लोग खौफजदा हैं। सरकार का कहना है कि देश में सुपरबग जैसी कोई समस्या नहीं है। वह हो तो भी कम गंभीर चिंता की बात नहीं है कि दिल्ली में दूषित पेयजल की आपूर्ति की बात कई बार उजागर हुई है। भूजल पीने लायक नहीं रह जाने की घोषणा खुद सरकार करती रही है। पानी में आर्सेनिक और दूसरे बेहद नुकसानदेह रसायनों की मौजूदगी की खबरें पिछले कुछ समय से लगातार आती रही हैं। यमुना का पानी किस हद तक प्रदूषित हो चुका है, इसके बारे में अब शायद किसी को बताने की जरूरत नहीं है। इसलिए सार्वजनिक नलों के साथ-साथ जगह-जगह गंदे पानी के नमूनों में मानव-स्वास्थ्य के लिहाज से खतरनाक जीवाणुओं का पाया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं रह गई है।

एनडीएम-1 जीवाणुओं से युक्त पानी पीने या इसमें पके भोजन को खाने पर शरीर में जिस प्रकृति के जीवाणुओं के जाने की आशंका है, उनमें बहुत-सी दवाओं के प्रतिरोध की ताकत विकसित हो चुकी है। सरकार भले इससे इनकार करे, लेकिन सच्चाई यही है कि नागरिकों को जो पेयजल मुहैया कराया जा रहा है, उसकी सफाई में लापरवाही और प्रदूषित जल का मिश्रण इसके लिए जिम्मेदार है। दरअसल, एनडीएम-1 एक ऐसा जीन है जो अलग-अलग तरह के जीवाणुओं के भीतर आसानी से रह सकता है और ऐसी स्थिति में किसी भी एंटीबायोटिक का कोई असर नहीं होता। जबकि संक्रामक रोगों के इलाज में अगर कोई दूसरी दवा काम नहीं करती तो उसके लिए एंटीबायोटिक का ही सहारा लेना पड़ता है।

जाहिर है, अगर किसी व्यक्ति में इस तरह का बैक्टीरिया घर करता है तो न केवल उसका इलाज लगभग नामुमकिन हो सकता है, बल्कि दूसरों में संक्रमित होने पर वह और भी खतरनाक साबित होगा। दूसरी ओर, समय-समय पर विशेषज्ञों की चेतावनियों के बावजूद झोलाछाप डॉक्टरों से लेकर प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सक तक किसी मामूली बीमारी में भी एंटीबायोटिक लेने की सलाह देने से नहीं हिचकते। इससे प्रतिरोधक-क्षमता घटती जाती है। इसके दुष्प्रभाव से जो दूसरी बीमारियाँ पैदा होती हैं, बाद में उनका इलाज बेहद जटिल हो जाता है। यानी खाने-पीने से लेकर दवाइयां तक अब मनुष्य के भीतर रोग-प्रतिरोध की कुदरती क्षमता में लगातार कमी की वजह बन रही हैं। इसलिए सुपरबग न हो तो भी सरकार अपनी जिम्मेवारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। उसे चाहिए कि वह पहले स्वच्छ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करे। थोड़ी-सी लापरवाही का नतीजा अगली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।

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