बांस रोजगार से स्वावलंबी हुई महिलाएं

Submitted by Hindi on Thu, 06/09/2011 - 12:14
Source
सोपान स्टेप, जून 2011
दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के लवाडीह गांव की बसंती टुडू आज प्रतिमाह दस हजार रुपये कमा रहीं हैं, उनके पति सुभाष हासदा एक सिह्हस्त कारीगर है, उसे मुख्यमंत्री अर्जून मुंडा ने सम्मानित किया है।

झारखंड की आदिवासी महिलाएं अब स्वावलंबी हो रही हैं, बांस के रोजगार से जुड़कर वे अच्छी आमदनी पा रही हैं। रोजगार के अभाव में आदिवासी परिवार सहित पश्चिम बंगाल, असम और पंजाब के खेतों में जाकर काम करती थी। पलायन उनकी मजबूरी बन चुकी थी, लेकिन चार साल से उनका पलायन रुका है, आदिवासी महिला व पुरूष अब बांस के सिह्हस्त कारीगर बनकर अपनी आजीविका कमा रहें हैं। दुमका जिले के शिकारीपाडा प्रखंड के लवाडीह गांव की बसंती टुडू आज प्रतिमाह दस हजार रुपये कमा रही हैं, उनके पति सुभाष हासदा एक सिह्हस्त कारीगर के रूप में जाना जाता है, उसे मुख्यमंत्री अर्जून मुंडा ने सम्मानित किया है। बसंती पहले खदान में पत्थर तोड़ती थी, उसका पति भी उसी काम में लगा था, लेकिन उसे टीबी. की बीमारी हो गई और काम छुट गया। गांव में तभी ई.एस.ए.एफ. नामक संस्था ने उसे बांस के रोजगार के बारे में बताया और उसे प्रशिक्षण के लिए केरल के त्रिचुर भेजा। वहां से लौटकर जब आया तो उसकी जिंदगी ही बदल गई, उसने अपने गांव में ग्रुप का गठन किया और घासीपुर, रामपुर, लखीकुंडी, पिपरा, बरगाछी, केन्दुआ सहित कई गांवों के आदिवासी परिवारों को जोड़ा और अब ये लोग रोजगार के लिए पलायन नहीं करते हैं। उत्पादन केन्द्र के पास ही मजदूरों के बच्चों के लिए बाल शिक्षा केन्द्र खोले गए हैं, जहां इनके बच्चे पढ़ भी रहें हैं। बांस के कारीगर लाल टुडू बताते हैं कि वे एक बांस से वह कई प्रकार के आईटम एक सप्ताह में बना लेता है।

उर्मिला मोहली बताती है कि उनकी हुनर की जब कोई तारीफ करता है तो सुकुन मिलता है। डेनियल मोहली बताता है कि वह मास्टर ट्रेनर सुभाष से बहुत कुछ सीखा है। परिवार चार लोग काम करने वाले हैं। तो उनकी आमदनी ज्यादा है। आज कई आदिवासी परिवार बांस के व्यवसाय से जुड़कर स्वरोजगार पा रहे हैं, इस दिशा में संस्था उनकी मदद कर रहा है। आज शिकारीपाडा प्रखंड में 20 ग्रुप बने हैं, जिस्से दो सौ महिला व पुरूष जुड़े हैं और उनके बनाए हुए सामान महानगरों तक जा रहें हैं। बांस की कला निखर रही है, कारीगरों के द्वारा बनाए गए बॉस के डस्टबीन और लाउंड्रीबीन की माँग विदेशों में हो रही है। बॉस के काम मुख्यतः मोहली जनजाति के द्वारा किया जाता है, जिनकी आबादी 40 लाख से कहीं ज्यादा है। राज्य में 23605 स्कवायर किलोमीटर क्षेत्र में जंगल है, जो 30 प्रतिशत है, जिसमें बॉस 843 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है। राज्य के गिरीडीह, गोडडा, दुमका, पाकुड, साहेबगंज जामताड़ा और बंगाल के मोहम्मदबाजार में ईसाफ के बांस प्रशिक्षण केन्द्र हैं, जहां बांस हैंडिक्राट उत्पादन केन्द्र कार्यरत है। इन केन्द्रों से लगभग दो हजार परिवारों को रोजगार मिल रहा है। स्वरोजगार की दिशा में बांस व्यवसाय से जुड़कर वे कई अनुठी चीज बना रहें हैं, वे हुनरवान हो चुके हैं। वे परिवार सहित अपने घरों में रहकर कमाई कर रहें हैं। उन्हें बिक्री की चिंता नहीं है, वे तो अपना उत्पाद संस्था को देकर अपनी मजदूरी ले लेते हैं।

संस्था इन उत्पादों को झारक्राफ्ट, रांची, फैब, चेन्नई, हिताशी, कोलकाता को बेच रहें हैं। नार्वे में भी बांस के बने उत्पाद की मांग है, वह भी यहीं से जाता है। ईसाफ संस्था के सुधीर बताते हैं कि नाबार्ड के सहयोग से उन्हें स्वाबलंबी बनाया जा रहा है, ईसाफ ने आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाया हैं। उनके उत्पाद चेन्नई, कोलकाता, केरला, रांची, दिल्ली और बेंगलूरू सहित कई जगहों पर जा रहें हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष आठ उत्पादन केन्द्र से 17 लाख रुपये के उत्पाद बिके। चेन्नई स्थित फैब उनका उत्पाद का बड़ा खरीददार है, बांस के उत्पाद ईको फैंडली है, वह प्लास्टिक का विकल्प भी है। संस्था महानगरों में लगनेवाले मेला में भी उत्पाद का प्रदर्शन करता है। संस्था गरीब आदिवासी परिवारों के चेहरे पर जब खुशी देखती है तो लगता है उनका प्रयोग सफल है, क्योंकि उनकी खुशी में मेरा योगदान है और ये बदलाव आना समाज के लिए शुभ संकेत है।

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