प्रकृति की पूजा तो करते हैं पर संरक्षण नहीं

Submitted by Hindi on Mon, 06/13/2011 - 09:44
Source
लाइव हिन्दुस्तान डॉट कॉम, 13 जून 2011

वह अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए मशहूर हैं। कैबिनेट मंत्री का ओहदा होने के बावजूद वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की छवि पर्यावरण कार्यकर्ता जैसी बन गई है। वह शायद पहले ऐसे मंत्री हैं, जिनसे पर्यावरण का सवाल उठाने वाले लोगों, संगठनों और एनजीओ को सबसे ज्यादा उम्मीद है। वह एक साथ जंगलों के सफाये से पैदा हुई समस्या से लेकर उद्योगों के प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिग जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर इन्हीं मुद्दों पर जयराम रमेश से बात की दैनिक हिन्दुस्तान के विशेष संवाददाता मदन जैड़ा ने-
 

विश्व पर्यावरण दिवस की इस बार की थीम ‘जंगल-प्रकृति आपकी सेवा में’ से क्या संदेश दिया जा रहा है?


आमतौर पर यह माना जाता है कि वनों की सुरक्षा करना या उन्हें बढ़ाना सिर्फ राज्य या केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। यह सबकी जिम्मेदारी है। वन हैं, तो हम हैं। पर्यावरण की स्वच्छता वनों पर निर्भर है। वन हमारे जीवन ही नहीं, बल्कि आजीविका के भी साधन हैं। प्रकृति जब सदैव हमारी सेवा में है, तो उसे बचाने की जिम्मेदारी भी हम सबकी है। आज जब हमारी आबादी तेजी से बढ़ रही है, विकास योजनाओं के कारण वनों पर संकट मंडरा रहा है, तो ऐसे में वनों की सुरक्षा में जनता की भागीदारी बढ़ाने पर फोकस रहेगा।

 

 

लेकिन देश में घने जंगल घट रहे हैं और वन विविधता खतरे में पड़ रही है?


प्राकृतिक वनों की भरपाई पेड़ लगाकर नहीं की जा सकती है। इस मुद्दे पर मैं शुरू से ही लड़ाई लड़ रहा हूं। इसलिए मैंने घने वनों में खनन परियोजनाओं को मंजूरी नहीं देने का फैसला किया था। लेकिन हमें कई पक्ष देखने होते हैं और न चाहते हुए भी कई बार मंजूरी देनी पड़ जाती है। इसमें कोई दो राय नहीं की घने वन घट रहे हैं, उनकी भरपाई संभव नहीं है। सिर्फ यही हो सकता है कि घने वनों को कटने से रोका जाए। जो लोग यह कहते हैं कि एक पेड़ के बदले चार पेड़ लगा देंगे, अच्छी बात है, लेकिन इससे घने जंगलों की भरपाई नहीं हो पाती है। यही कारण है कि हमारे देश के 21 फीसदी भू-भाग पर कहने को वन हैं, लेकिन सच्चई यह है कि इसके 40 फीसदी हिस्से पर छितरे वन हैं या यू कहें कि नाममात्र के जंगल हैं।

 

 

 

 

जलवायु परिवर्तन सिर्फ विकसित देशों की समस्या है या हमारे लिए भी इससे खतरा है?


सबसे ज्यादा तो हमें ही है। मेरे विचार से ऐसा कोई देश नहीं है, जिसकी नदियां ग्लेशियरों पर निर्भर हों। ग्लेशियर सूख गए, तो हमारी नदियां सूख जाएंगी। ऐसा कोई देश नहीं है, जिसका समुद्री तट 7,500 किमी लंबा हो और 35 करोड़ लोग वहां रहते हों। यानी समुद्र का जलस्तर बढ़ने से ये लोग प्रभावित होंगे। ऐसा कोई देश नहीं है, जिसकी पूरी कृषि मानसून पर टिकी हो। जलवायु परिवर्तन से मानसून का चक्र बिगड़ा, तो देश में खाद्यान्न संकट होगा। इसलिए जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से हमारा देश सबसे ज्यादा संवेदनशील है।

 

 

 

 

इससे निपटने के लिए क्या हो रहा है?


इसके लिए हम शुरू कर रहे हैं ग्रीन इंडिया मिशन। इसमें अगले दस साल में 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण किया जाएगा। इतने ही मौजूदा छितरे वनों में और पेड़ लगाकर उनकी गुणवत्ता सुधारी जाएगी। साथ ही 30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कृषि वानिकी कार्यक्रम चलाया जाएगा। योजना तैयार है और प्रधानमंत्री की मंजूरी मिल चुकी है। ज्यादा जंगल होंगे, तो वे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों को सोखेंगे और वार्मिग कम होगी।

 

 

 

 

पर्यावरण के मुद्दे पर हमारी छवि खराब है, इस पर क्या किया जा रहा है?


हां, यह कहा जाता है कि भारत में पर्यावरण सुरक्षा के लिए काम नहीं हो रहा है, जबकि हमारी आबादी बढ़ती जा रही है। भारत ही एकमात्र देश है, जहां पेड़-पौधों की पूजा होती है। जंगलों से निकलने वाली नदियों की भी पूजा होती है। और जंगलों में रहने वाले जीवों को भी भगवान के बराबर दर्जा है, क्योंकि हमारे कई देवी-देवता उनमें हैं। पत्थर तक पूजे जाते हैं। फिर भी हम अपने वनों, नदियों, जंगली जानवरों की सुरक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ये बातें बताते हुए मुझे गर्व होता है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे देश में हर व्यक्ति पर्यावरण को प्रदूषित करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है।

 

 

 

 

लेकिन हमारे नीति-निर्माता खुद कितने जागरूक हैं?


होते तो इतनी बड़ी गाड़ियों में न घूमते, जो दोगुना पेट्रोल खाती हैं। जबकि हमारे देश में 80 फीसदी पेट्रोल विदेश से आता है और यह प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है। इंदिरा गांधी के बाद ऐसा कोई राजनेता नहीं है, जो पर्यावरण की अहमियत को समझता हो और व्यक्तिगत जीवन में भी उसे महसूस करता हो। वैसे भी पर्यावरण से जुड़े तमाम कानून इंदिराजी के ही कार्यकाल में बने थे। हां, छोटी गाड़ी के इस्तेमाल के लिए मैं ममता बनर्जी की जरूर सराहना करूंगा।

 

 

 

 

कोपेनहेगन सम्मेलन में भारत ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सजर्न में 20-25 फीसदी की कमी लाने का ऐलान किया था। इस पर क्या हो रहा है?


ग्रीन इंडिया मिशन इसी का हिस्सा है। दूसरा कदम है परमाणु ऊर्जा के विकास का। जो अभी देश में तीन फीसदी और अगले दस सालों में छह फीसदी हो जाएगी। इसके अलावा पूर्ण रूप से स्वच्छ पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ा है। इनके विस्तार के लिए नए कदम उठाए गए हैं। पवन और सौर ऊर्जा की देश में अपार संभावनाएं हैं, क्योंकि हमारे देश में हवा भी खूब चलती है और धूप भी जमकर आती है। कोयले से बिजली बनाने में हम नई तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहे हैं। कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए कम ऊर्जा मानक तय किए हैं। अब वाहनों के लिए भी ऐसे ही मानक अनिवार्य किए जाएंगे। इन प्रयासों से हमारे उत्सर्जन की वृद्धि में गिरावट आएगी।

 

 

 

 

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