आखिर क्या है मानव – खाद्य

Submitted by Hindi on Wed, 06/15/2011 - 10:17
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

जो खाद्य उनकी वन्य स्थिति से हट गए हैं तथा जिन्हें रसायनों की मदद से पूरी तरह कृत्रिम वातावरण में पैदा किया जाता है, वे शरीर की रासायनिक प्रक्रिया को असंतुलित करते हैं। शरीर जितना ज्यादा असंतुलित होता जाता है, अप्राकृतिक खाद्यों की चाह उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाती है।

अभी कुछ दिन पहले किसी टेलिविजन कंपनी से आए एक व्यक्ति ने मुझसे प्राकृतिक खाद्य के जायके के बारे में कुछ कहने को कहा। हम लोगों की बातचीत के दौरान मैंने उससे कहा कि वह बाग में स्वतंत्र विचरण करती हुई मुर्गियों द्वारा दिए गए अंडे तथा पहाड़ी के नीचे कुक्कट-गृहों में पली मुर्गियों के अंडों की तुलना करके देखे। उसने पाया कि उस कुक्कट-गृहों में पली मुर्गियों के अंडों की जर्दी नरम पर पनीली थी तथा उसका रंग बीमार सा पीला था। इसके विपरीत पहाड़ी पर उन्मुक्त रह रही मुर्गियों के अंडों की जर्दी ठोस, चमकीली नारंगी रंग की थी। जब शहर में किसी रेस्त्रां चलाने वाले एक बुजुर्ग ने ये प्राकृतिक अंडे चखे तो उसे कहना पड़ा, ‘यह है असली अंडा।’ पुराने दिनों की तरह, और ऐसा खुश हुआ जैसे उसे कोई खजाना मिल गया हो। उधर ऊपर संतरों के बाग में, मेथी और खरपतवार के बीच कई तरह की सब्जियां उग रही हैं। शलजम, खीरे, कुम्हड़े मटर, गाजर, खाने वाली गुलदावदी, आलू, कई किस्मों की फलियां और जड़ी-बूटियां सब एक-साथ उग रही हैं।

बातचीत इस सवाल की तरफ भी मुड़ी कि अर्ध-जंगली ढंग से उगाई गई सब्जियों का स्वाद और खुशबू घरों या खेतों में रासायनिक उर्वरकों की मदद से उगाई गई सब्जियों से बेहतर है या नहीं। जब हमने दोनों की तुलना की तो दोनों के स्वाद बिल्कुल अलग थे तथा हमने यह भी पाया कि ‘जंगली’ ढंग से उगी सब्जियों का जायका बेहतर था। मैंने उस संवाददाता को बतलाया कि तैयार किए गए खेत में सब्जियां रासायनिक उर्वरकों, नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश देकर उगाई जाती हैं। लेकिन जब सब्जियां जैव-पदार्थों के स्वाभाविक रूप से समृद्ध मिट्टी में प्राकृतिक भू-आवरण के बीच, उगाई जाती हैं तो उन्हें पोषक तत्वों की ज्यादा संतुलित खुराक मिलती है। किस्म-किस्म की खरपतवार तथा घासों का मतलब यह होता है कि सब्जियों को विविध प्रकार के आवश्यक तथा सूक्ष्म पोषक तत्व उपलब्ध हैं। इस तरह की संतुलित मिट्टी में उगने वाले पौधों में कुछ अलग ही स्वाद और खुशबू आ जाती है।

खाने वाली जड़ियों, वन्य सब्जियां और पर्वतों एवं वादियों में उगने वाले पौधों में पोषक तत्वों की मात्रा तो अधिक होती है। वे औषधी के रूप में भी उपयोगी होते हैं। भोजन और दवा कोई दो भिन्न चीजें नहीं होती। वे एक ही शरीर का अगला और पिछला भाग होती हैं। रसायनों द्वारा उगाई गई सब्जियां भोजन के रूप में तो खाई जा सकती हैं, लेकिन दवाओं के रूप में उनका उपयोग नहीं हो सकता। जब आप वसंत ऋतु की सात जड़ियां एकत्र कर खाते हैं तो आपकी प्रकृति में सौम्यता आ जाती है। और जब आप ब्रेकन की फुनगियां, मूली तथा ऑस्मंड का सेवन करते हैं तो आपकी आत्मा शांत हो जाती है। बेचैनी और बेसब्रपन को पूरा करने के लिए मूली सबसे अच्छी होती है। लोग कहते हैं कि यदि बच्चे मूली, चीड़ की कलियां या पेड़ों पर रहने वाले कीड़ें खाएं तो उन्हें चीख-चीख कर रोने के जो दौरे पड़ते हैं वे नहीं पड़ेंगे। पुराने जमाने में तो बच्चों को ये चीजें जबरन खिलाई जाती थीं। जापानी मूली ‘दाईकॉन’ का पूर्वज पौधा ‘नाजूना’ (मूली) ही है तथा ‘नाजूना’ का संबंध ‘नोगोमू’ शब्द से है जिसका मतलब होता है नरम बना हुआ। दाईकान वह जड़ी है जो हमारे स्वभाव में नरमी लाती है।

जंगली खाद्यों में कीटों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। युद्ध-काल में जब मैं परीक्षण केंद्र में काम कर रहा था, तब मुझे यह तय करने का काम सौंपा गया था कि, दक्षिण पूर्व एशिया के किन कीटों को खाया जा सकता है। जब मैंने जांच-पड़ताल की तो यह जानकर मैं चकित रह गया कि लगभग हर कीड़ा खाने योग्य होता है। मसलन, कोई यह सोच भी नहीं सकता कि मक्खियों या जूंओ का भी कोई उपयोग हो सकता है। लेकिन जूंओ को पीसकर जाड़े के अनाज के साथ खाया जाए तो वह मिर्गी का इलाज बन जाता है। तथा मक्खियों से शीत-दंश (फ्रास्ट-बाइट) का इलाज हो जाता है। सभी कीड़ों की तितलियां खाने योग्य होती हैं, बशर्ते वे जिंदा हों। पुराने ग्रंथों को पढ़ते हुए मुझे उनमें ऐसी कहानियां मिलीं, जिनमें मेंगर कीड़ों से बने व्यंजनों तथा रेशम के कीड़ों के नायाब स्वाद का जिक्र है। यहां तक कि पतंगों के परों पर से सफेद पाउडर को झाड़कर अलग कर दिया जाए तो वे भी बड़े स्वादिष्ट लगते हैं। अतः स्वास्थ्य और स्वाद दोनों की दृष्टि से ऐसी कई चीजें, जिन्हें लोग घिनौनी समझते हैं, वास्तव में काफी स्वादिष्ट तथा मानव शरीर के लिए लाभदायक होती हैं।

वे सब्जियां, जिन्होंने अपने जंगली पूर्वजों से अपनी नजदीकी बनाए रखी है, पौष्टिकता और स्वाद की दृष्टि से सबसे अच्छी होती हैं। उदाहरण के लिए, लिलि परिवार (जिसमें नीरा, लहसुन, चीनी-लीक, हरा-प्याज तथा सामान्य प्याज शामिल है) की कई वनस्पतियों को पौष्टिक जड़ी-बूटी तथा टॉनिक के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। लेकिन अधिकांश लोगों को हरे तथा गोल प्याज की घरेलू किस्में ही सबसे स्वादिष्ट लगती हैं। किसी कारणवश आधुनिक लोगों को वही सब्जियां अच्छी लगती हैं, जो अपनी जंगली पूर्वजों से स्वाद के मामले में दूर चली गई हैं। प्राणी खाद्यों के मामले में भी स्वाद पसंदगियां कुछ ऐसी ही हो गई हैं। वन्य पक्षी, शरीर के लिए पालतू बत्तखें या मुर्गियों से ज्यादा मुफीद होते हैं। लेकिन अपने कुदरती घरों से अलग कृत्रिम वातावरण में पाले गए यही पक्षी स्वाद में बेहतर माने जाते हैं, और बाजार में ऊंची कीमतों पर बिकते हैं। बकरी का दूध्, गाय के दूध् की अपेक्षा ज्यादा पौष्टिक होता है। लेकिन ज्यादा मांग गाय के दूध की ही है।

जो खाद्य उनकी वन्य स्थिति से हट गए हैं तथा जिन्हें रसायनों की मदद से पूरी तरह कृत्रिम वातावरण में पैदा किया जाता है, वे शरीर की रासायनिक प्रक्रिया को असंतुलित करते हैं। शरीर जितना ज्यादा असंतुलित होता जाता है, अप्राकृतिक खाद्यों की चाह उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाती है। आगे चलकर यह स्थिति स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बन जाती है। यह कहना कि आदमी क्या खाता है, यह सिर्फ उसकी पसंद का मामला है, बिल्कुल ही गलत धरणा है क्योंकि अप्राकृतिक या अनहोना आहार किसानों और मछुआरों दोनों की मुश्किलें बढ़ाता है। मेरे विचार से तो आदमी की इच्छाएं जितनी ज्यादा होंगी, उन्हें संतुष्ट करने के लिए उतना ही ज्यादा काम करना होगा। ट्यूना या येला-टेल मछलियों को पकड़ने के लिए मछुआरों को जहां समुद्र में बहुत दूर गहरे पानी में जाना पड़ता है, वहीं सारडीन, सी-बीम, फ्लाउंडर या अन्य छोटी मछलियां काफी मात्रा में तटवर्ती समुद्रों में ही मिल जाती हैं। पौष्टिकता के हिसाब से भी खारे पानी की मछलियों की अपेक्षा नदियों और झरनों में पाए जाने वाले घोंघे, क्रे-फिश तथा कई किस्म के केकड़े आदि कहीं ज्यादापौष्टिक होते हैं।

लाल चावल और सब्जियां, शाही खाना भले ही न नजर आते हों, लेकिन पोषक तत्वों के हिसाब से वह बढ़िया आहार है, और वह मनुष्यों को सादगी तथा स्वतंत्रता से जीने योग्य बनाता है। यदि हमारे देश में कभी खाद्य संकट पैदा हुआ तो उसका कारण प्रकृति की उत्पादक शक्ति की अपर्याप्तता न होकर मानव की मनमानी इच्छाएं ही होगा।

इस लिहाज से इसके बाद नंबर आता है उथले समुद्र की मछलियों का तथा सबसे अंत में गहरे, खारे समुद्री पानी की मछलियों का इंसानों के लिए सबसे अच्छा खाद्य वही होता है जो उसके आसपास ही मिलता हो। जिन खाद्यों के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता है वे उसके लिए सबसे कम फायदे मंद होते हैं। यानी जो कुछ आसानी से उपलब्ध है, उसे ही स्वीकार करने से सब कुछ ठीक चलता है। यदि इस गांव में रहने वाले किसान वही भोजन ग्रहण करते हैं जिसे यहां उगाया या एकत्र किया जा सकता है तो कोई गलती हो ही नहीं सकती। अंत में ऊपर पहाड़ी पर झोपड़ियों में रहने वाले युवकों की तरह हर किसी को भूरा चावल, बिना पॉलिश किया जौ, बाजरा तथा कुटकी के साथ मौसमी तथा अर्ध-जंगली पौधे व सब्जियां खाना आसान लगने लगेगा। ऐसा करते हुए हम सबसे अच्छा खाना खाते हैं। उसमें स्वाद भी होता है और वे हमारे शरीर को भी रास आता है।

यदि इन जैसे खेतों में चौथाई एकड़ भूमि पर 5-6 सौ किलो चावल तथा जाड़े का अनाज उगा लिया जाए तो उससे पांच से दस लोगों के परिवार का जीवन-यापन हो सकता है। और इसके लिए उन्हें प्रति दिन औसतन एक घंटे का श्रम करने से ही काम चल जाएगा। लेकिन यदि इन खेतों को चरागाह बना दिया जाए या अनाज मवेशियों को खिला दिया जाए तो प्रति चैथाई एकड़ के सहारे सिर्फ एक ही व्यक्ति रह सकता है। यदि मांस के निर्माण के लिए उस जमीन का उपयोग किया जाता है, जो इंसान के उपभोग के लिए सीधे खाद्य प्रदान कर सकती है, तो वह शाही खाना बनकर विलासिता की चीज बन जाती है। यह चीज स्पष्ट तथा निश्चित रूप से साबित हो गई है। हम में से हर व्यक्ति को इस बात पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि इतनी मेहनत और खर्चे से पैदा किए गए खाद्यों का चटकारा लेकर हम उत्पादकों की मशक्कत कितनी बढ़ा देते हैं।

मांस तथा अन्य आयातित खाद्य विलासिता की चीजें इसलिए हैं कि उनके लिए स्थानीय रूप से पैदा की गई परम्परागत सब्जियों और अनाज के बजाए कहीं बहुत ज्यादा संसाधन और शक्ति खर्च की जाती है। इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि जो लोग अपने आपको सादी स्थानीय खुराक तक सीमित रखते हैं उन्हें उन लोगों की अपेक्षा काम कम करना पड़ता है तथा कम भूमि की जरूरत होती है, जिन्हें विलासिता पूर्ण खाद्य-पदार्थ की ललक होती है। यदि जापान के लोगों ने मांस तथा आयातित खाद्य खाना जारी रखा तो यह तय है कि अगले दस वर्षों के भीतर ही देश में खाद्य संकट पैदा हो जाएगा। तीस साल के बाद देश में उसकी अपरिमित कमी हो जाएगी, पता नहीं कहां से लोगों में यह बेतुका विचार प्रवेश कर गया है कि चावल खाना बंद करके ब्रेड (डबलरोटी) खाना, जापान के लोगों की जीवन शैली में सुधार का प्रतीक है। वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं है। लाल चावल और सब्जियां, शाही खाना भले ही न नजर आते हों, लेकिन पोषक तत्वों के हिसाब से वह बढ़िया आहार है, और वह मनुष्यों को सादगी तथा स्वतंत्रता से जीने योग्य बनाता है। यदि हमारे देश में कभी खाद्य संकट पैदा हुआ तो उसका कारण प्रकृति की उत्पादक शक्ति की अपर्याप्तता न होकर मानव की मनमानी इच्छाएं ही होगा।

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